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माँ

मैंने तुम्हारा दाह संस्कार नहीं देखा
अंतिम यात्रा भी नहीं देखी
लेकिन मैंने देखा था तुम्हे
अंतिम बार
चिर निद्रा में लीन थी तुम
शांत थी, निश्छल थी
नये कपड़ों से तुम्हारा मोह कभी नहीं रहा
पर उस दिन तुम्हे
नयी चटख लाल चुनरी में सहेजा गया 
सिंदूर ,बिंदी भी कहाँ भाते थे तुम्हे
पर उस दिन 
सिंदूर दमक रहा था मांग में
एक सुरज सुशोभित था तुम्हारे ललाट पर
और तुम मुस्कुरा भी तो रही थी
न जाने क्यो ?
माँ कभी हँसती है ....
अपने बच्चों को रोता देखकर ?
पर तुम तटस्थ बनी रही
एक चुड़ी पहनने वाली तुम
उस दिन कलाई भरकर चुड़िया
तुम्हे पहनायी गयी
जीवन भर तुम्हे जिन सब का मोह नहीं था
तुम्हे विदा किया गया 
उन्ही सब के साथ
सब घटित हो रहा था 
शायद तिथि पुण्यतिथि में तब्दील हो रही थी 
तुम चली गयी
मेरा एक हिस्सा साथ ले गयी
अपने मन के भिक्षु का
एक हिस्सा मुझे दे गयी
बस.....पिछले छ: सालों से
हम यूँ ही साथ है 


टिप्पणियाँ

Rohitas Ghorela ने कहा…
मार्मिक।
माँ की कमी तब महसूस होती है जब वो ना हो। क्योंकि जब वो होती है तो वो ये कमी महसूस होने नहीं देती।
नई रचना - एक भी दुकां नहीं थोड़े से कर्जे के लिए 

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उम्मीद

लाख उजड़ा हो चमन एक कली को तुम्हारा इंतजार होगा खो जायेगी जब सब राहे उम्मीद की किरण से सजा एक रास्ता तुम्हे तकेगा तुम्हे पता भी न होगा  अंधेरों के बीच  कब कैसे  एक नया चिराग रोशन होगा सूख जाये चाहे कितना मन का उपवन एक कोना हमेशा बसंत होगा 

मन का पौधा

मन एक छोटे से पौधें की तरह होता है वो उंमुक्तता से झुमता है बशर्ते कि उसे संयमित अनुपात में वो सब मिले जो जरुरी है  उसके विकास के लिये जड़े फैलाने से कही ज्यादा जरुरी है उसका हर पल खिलना, मुस्कुराना मेरे घर में ऐसा ही एक पौधा है जो बिल्कुल मन जैसा है मुट्ठी भर मिट्टी में भी खुद को सशक्त रखता है उसकी जड़े फैली नहीं है नाजुक होते हुए भी मजबूत है उसके आस पास खुशियों के दो चार अंकुरण और भी है ये मन का पौधा है इसके फैलाव  इसकी जड़ों से इसे मत आंको क्योकि मैंने देखा है बरगदों को धराशायी होते हुए  जड़ों से उखड़ते हुए 

सीख जीवन की

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