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फ़रवरी, 2012 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मन उदास है

      आज मन उदास है  सब कुछ मेरे पास है   कोई आरजू ना आस है   जाने क्यों   फिर भी मन उदास है   शायद   रूखे मौसम का तकाजा है   या फिर   बेरुखियों का तमाचा है   भागे मन , दौड़े मन   बंज़र रेगिस्तान में ये कैसी प्यास है    आज मन उदास है    खुशियाँ बिखरी आस-पास   दुखों से मन मेरा अनजान   बाहर है संगीत तो अन्दर निश्वास है   जाने क्यों   आज मन उदास है   रोज सजते सपने जिन आँखों में   आज टकटकी लगी वीरानो में   अपनों का मेला है सपनो का रेलम-पेला है फिर भी मन मेरा अकेला है क्या ये आने वाले वक़्त की कुछ अनहोनी आहट है या फिर मन नहीं , आज का मौसम ही उदास है 

कोई नहीं चाहता

बिना आगाज़ के ही अंजाम चाहते है लोग बिना प्रयास के ही सफलता पा लेना चाहते है लोग जिंदगी की दौड़ में जीत चाहते है लोग लेकिन जीत के लिए मेहनत ...........................................कोई नहीं चाहता दूसरों की खुशियों को छीन लेना चाहते है लोग लेकिन अपनी खुशियों को बांटना ...........................................कोई नहीं चाहता सोने की तरह चमकना चाहते है लोग लेकिन कुंदन की भांति आग में तपना .........................................कोई नहीं चाहता आसमां को बाँहों में लेना चाहते है लोग लेकिन ज़मीं पर पैर जमाना .........................................कोई नहीं चाहता मंजिल तक पहुँच जाना चाहते है लोग लेकिन संघर्षों का मुकाबला .........................................कोई नहीं चाहता सफलता पर बधाइयाँ देते है लोग लेकिन दुःख में सांत्वना देना .........................................कोई नहीं चाहता दूसरों को बात बात पर टोकते है लोग लेकिन अपनी स्वतंत्रता का हनन .........................................कोई नहीं चाहता अपने महलों में घी के दियें जलाते है लोग लेकिन टूटे आशियाँ को

एक और नन्हा सा प्रयास

शगुन के शब्दों ने इस बार मुझे वाकई खुश कर दिया .....सधे हुए शब्दों का सधा हुआ ताल-मेल .....अच्छी शुरुआत कर रही है मेरी बेटी ....मन खुश है    " भूल जाओ बीते पल       लेके आओ नई उमंग        सूर्य फिर से आएगा          लेकर उम्मीद की किरण            तब दिखा दो             तुम अपने रंग "                                          शगुन 

क्या है आज़ादी

वो तो नन्हे की आँख का तारा है जो हम सब को बेहद प्यारा है वो तो है एक मीठी सी शहजादी जिसे कहते है हम आज़ादी कई जंजीरों ने इसे जकड़ा है तो कही आडम्बरों ने इसे पकड़ा है यूँ तो आज़ाद है हम लेकिन अपने ही बनाये बन्धनों में घूमते है सभी बस पिंजरे में नहीं है लेकिन बेड़ियों में बंधे है सभी आज़ाद दिखने की होड़ में खो बैठे आज़ादी ना जाने जिंदगी के किस मोड़ में आँखे बन गई सूखा तालाब पथरीली हो गई गालों की ज़मीं होठ सूख कर मुरझा गए खो गई सबकी हसीं क्या यही है आज़ादी मायने नहीं समझे आज़ादी के दायरे बढा दिए बरबादी के  आज़ादी से आसमां में उड़ने की चाह  चल पड़े सफलता की वो अनजानी राह  ज़मीं भी छूटी आसमां भी छूटा  पंख तो मिले पर पावँ कटा आये  भुला बैठे नियामत खुदा की  जरुरत थी तो बस थोडा सा मुस्कुराने की  लेकिन हम फंस गए अपनी ही बनाई परिभाषाओ में  कभी ढूंढते शब्दकोष में  तो कभी संविधान की धाराओ में  अब समझ पाई हु आज़ादी के सही मायने  ग़र मिल जाए वो निश्छल हंसी  तो तालाब भर जायेगे समंदर की तरह  पथरीली ज़मीं हरी हो जाएगी  गुलाब की पंखुड़ी  फ़ैल जायेगी दोनों गालो तक 
बात दो-चार दिन पहले की है ,सुबह जब नारियल के तेल की शीशी को हथेली पर उंडेला तो उसमे से तेल नहीं निकला ,मुझे आश्चर्य हुआ कि अभी हफ्ते भर पहले तो ख़रीदा ही था ,इतनी जल्दी ख़त्म कैसे हुआ ? लेकिन शीशी खाली नहीं थी ....थोडा दबाया तो कुछ निकलता हुआ सा महसूस हुआ ........'ये तो तेल ही है जो ठण्ड कि वजह से जम गया था .मेरा आश्चर्य अब एक सुखद अहसास में बदल गया क्योकि मुंबई के मौसम में और वो भी फरवरी के महीने में तेल का जमना आम बात नहीं है               पुरे साल भर एक ही जैसे मौसम की मार सहने वाले हम मुम्बईकर तरसते है ऐसे मौसम को ...........इस बार की गुलाबी ठंड वाकई मौसमी मज़ा दे रही है .सुबह की धुप कुछ ज्यादा ही प्यारी लगने लगी है और जब सुबह की यह धुप मेरी खिड़की से लटकी कांच की लटकनो पर पड़ती है तो लगता है कि कई नन्हे सूरज मानो जैसे मेरी खिड़की पर आ गए हो , जब उनकी चमक परावर्तित होकर मेरे आँगन में बिखरती है तो उन पर चलने का मिठास मैं बयाँ नहीं कर सकती        यहाँ ठिठुरन तो नहीं है लेकिन सिहरन जरुर है ,दांत तो नहीं बजते लेकिन कानो से ठंडी हवा का प्रवाह चाय की चुस्की मारने को उकसा
कल शाम का खुशगवार मौसम न जाने क्यों बहुत कुछ लिखने को प्रेरित कर रहा था .हाथ में लेखनी को पकड़ा ही था कि मेरी १२ वर्षीया बेटी ने कहा  'मम्मा मैं भी कुछ लिखू ' मैं मुस्कुरा दी और लिखने में व्यस्त हो गई ,तभी उसने कुछ दो-चार लाइने लिख कर पकड़ा दी ,उसकी टूटी-फूटी हिंदी ,साथ में मुम्बईया भाषा का तड़का और उसकी मन:स्थिति ....सब था इन लाइनों में  प्रस्तुत कर रही हूँ उसके प्रथम प्रयास को प्रोत्साहन के लिए आपके समक्ष  कितनी करती किताबे बोर  स्कूल ले जाती मैं बस्ते का बोझ  आती जब किताबे आँखों के सामने  क्यों सो जाते हम बच्चे लोग  पर क्या करे ..................... पढना ही पड़ता हर रोज कभी हिंदी की मात्राओं में खोती  तो कभी  गणित के फार्मूलों में उलझती  उफ़ ये मराठी  मेरे सर के ऊपर से चली जाती  विज्ञान के चमत्कार तो समझ ही ना पाती  सच,कितना करती मुझे बोर ये किताबे 

पथिक

पथिक तू चलता चल अपनी मंजिल की तरफ कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र फूलों के ख्वाबों को छोड़ काँटों की राह पकड़ संघर्षों से जूझता तू बढ़ता चल अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र राह में मिलेंगे बहुत से हमसफ़र इस कारवें में भीड़ का हिस्सा बनना मत न करना कोई शिकवा-शिकायत बस चुपचाप , अपने बुलंद इरादों के साथ भीड़ को चीर के बढ़ता चल अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र तनिक सी कामयाबी के जाम पीकर उसके सुरूर में ना खोना क्योकि ; हो सकती है यह तुफां के पहले की ख़ामोशी या फिर ; किसी मृग-मरीचिका की मदहोशी इसलिए ; छलकते टकराते जाम को छोड़ आने वाले तुफां के लिए खुदी को बुलंद कर , खुद को तैयार कर तू चल अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ पथिक तू बढ़ता चल कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र