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मैं जीना चाहती हूँ

जीने दो मुझे इंसान की तरह  क्योकि  कहते हो अन्नपुर्णा  और नोचते हो बोटी-बोटी  दुर्गा कहकर सर नमाते हो  और दुसरे ही पल  एक राह चलती दुर्गा को  पावँ तले रौंदते हो  महान तो बताते हो  लेकिन इंसान बनकर जीने नहीं देते हो  तुम्हारे हौसलें है बुलंद  क्योकि सदियों से तुमने लूटा है हमारा तन मन  कभी द्रौपदी को छला  तो कभी सीता की ली अग्निपरीक्षा  राधा को तो तुमने कही का ना छोड़ा  जीवन भर प्यासी प्रेयसी बनाकर  दिल उसका तोडा  लेकिन ; फिर से चली चाल,बहलाया ,फुसलाया  कृष्ण से पहले राधा का नाम लगाया  लेकिन सोचा है कभी  अरे! सोलह हजार रानियों में  एक भी राधा का नाम क्यों ना आया  फिर भी तुम देव हो  क्योकि तुम एक मर्द हो  यही तो होता आया है सदियों से  छला गया हमेशा छल-प्रपंच से  ना जाने क्यों  तुम्हारा मन तुम्हे नहीं धिक्कारता  करते हो ऐसे कुकर्म  कि माँ के दूध को भी आती है तुम पर शर्म  नारी हूँ मैं नीर नहीं  कि सिर्फ बहना ही जिसका काम है  मुझे महान मत बनाओ  इज्जत दो अपनी नज़रों में थोड़ी  इंसान हूँ, इंसान की तरह रहने दो  देवी ना बना

चाँद चौथ का

सहेज के रखी , अपनी ब्याह की चुनडी  आज फिर से मैं निकाल लाई  सात फेरों के सातों वचन  याद करने की रुत फिर से आई  तेरे हाथों से सजे मांग मेरी  एक बार फिर , फेरों की वह बात याद आई  ललाट पर कुमकुम , मांग में तारे  जैसे आँगन में मेरे  झूमते हो चाँद-सितारे  मेहंदी से रची हथेली, चूड़ियों से भरी कलाई  माथे पे सजा सिन्दूर , गालों  पे आई ललाई  कर-कर के श्रृंगार मैं मुसकाई  देख के दर्पण , खुद से ही शरमाई  यह जादू है आज के दिन का  सज-सज के सजना के लिए  एक प्रोढ़ा भी दुल्हन सी जगमगाई  यौवना हो या प्रोढ़ा रूप तो आज सबपे है टुटा  करके श्रृंगार देखेगे चाँद से झरता प्यार  यह जादू है आज के दिन का  बिखेरेगा प्यार .....देगा दीदार  झूम के निकलेगा चाँद .......हाँ .................चाँद करवा चौथ का ! करवा चौथ की हार्दिक बधाइयाँ    

सूपर मोम

सूपर मोम.......यह शब्द पिछले कुछ वर्षों से महिलाओं से जुड़े शब्दों में प्रमुख रूप से उभरकर आया शब्द है .आखिर कौन है सुपर मोम ?.......यह माँ का वो आधुनिक रूप है जिसकी कल्पना हमारी दादी-नानी ने तो कदापि नहीं की थी .इस सुपर मोम की जिंदगी सुबह पांच बजे से शुरू होकर रात के ग्यारह बजे भी थमने का नाम नहीं लेती .यह सुपर मोम आधुनिक समाज की वो नारी है जो हर जगह अपनी सक्रीय भूमिका निभाती है , अब उसका कार्यक्षेत्र सिर्फ रसोईघर ही नहीं रहा बल्कि हर क्षेत्र में वह अपनी दमदार दावेदारी रखती है .वह घर की धूरी है , ऑफिस में powerful कॉरपोरेट women है , सिर्फ पति और बच्चों को ही समय नहीं देती , खुद के लिए भी समय निकालती है , पार्लर और स्पा में जाती है ,किट्टी पार्टी एन्जॉय करती है , डिस्को में थिरकती है , रसोईघर में लैपटॉप पर अंगुलियाँ चलाते हुए मिनटों में microwave में खाना बना लेती है बिना धुएँ , चूल्हे और चौके के और भी ना जाने ऐसी कितनी अनगिनत चीजे है जो ये सुपर मोम पलक झपकते ही कर लेती है और सबसे बड़ी बात कि इस सुपर मोम से सब खुश है , पति इसकी कोई बात नहीं काटता, बच्चें mother's day पर कार्ड देत

कोरा कागज

कुछ खास नहीं आज लिखने को  तो सोचा  चलो समय के कागज पर  कलम को अपनेआप ही चलने दूं  अपनी ही लेखनी को एक नया आयाम दूँ  दिल और दिमाग  पर छाये शब्दों को  अस्त-व्यस्त ही सही  लेकिन बहने दूं  शायद कविता ना बन पाए  शायद अक्षर मोती से ना  सज पाए  लेकिन  चलने दूं  लेखनी को  अपनी ही रफ़्तार में  लिखने दूं  कुछ शब्द अपनी ही जिंदगी की किताब के  लेकिन ये क्या ? कुछ कडवे पर सच्चे शब्द  उड़ गए वक़्त की आंधी में , किसी पाबंदी में  निकले थे जो दिमाग  के रस्ते से  और कुछ भावुक शब्द  पिघल गए अपनी ही गरमी से  धुल गए आंसुओं से  जो निकले थे सीधे दिल से  और................................ मेरी लेखनी को आयाम नहीं  सिर्फ विराम मिला  और मेरा कागज जो कोरा था  कोरा ही रह गया 

गाँव

लम्बे अंतराल के बाद आज यहाँ आना हुआ है ....पिछले कुछ दिन काफी व्यस्तता वाले रहे ....गया पखवाडा मैंने राजस्थान में बिताया .....हमेशा की तरह लू के थपेड़े लेकिन फिर भी आनंद की अनुभूति.....बहुत सारे मेहमानों की मेहमान-नवाजी का सौभाग्य प्राप्त हुआ और सब सकुशल संपन हुआ....हर बार की तरह इस बार भी मेरी किताब में एक और पृष्ठ जुड़ गया और इस बार इसमें सिर्फ मीठी यादें है  ना पनघट है ना घूँघट है और ना ही बरगद की छावं  फिर भी अच्छा लगता मुझे मेरा गाँव  बढ़ा  रहा हाथ दोस्ती का शहर से  चला जा रहा सड़क की ओर पगडंडी की डगर से  ऐसे ही अपने गाँव में बिता आये कुछ पल फुर्सत के  भागते से लम्हों में कुछ पल सुस्ताई  मशीनी युग में रेंगती सी जिंदगी देख मैं हरषाई  यहाँ तो कहते है  नाइन-महरिन को भी चाची और ताई  बड़ों ने बिछाई बाज़ी ताश के पत्तों की  खुशियों के ओवर में लगे चौक्के-छक्के ठहाको के  यहाँ ; अपनेपन की चारदीवारी में  बंटवारे होते सुख-दुःख के  महफ़िल सजी शामियानों में  जागरण हुआ एकादशी का तारों की छावं में  आधी रात को सोरठ की राग गूंजी मेरे गाँव में  मेहमाननवाज़ी

'सत्यमेव जयते'

कल आमिर खान prodction के 'सत्यमेव जयते' का पहला एपिसोड देखा ,देखकर भीग गया मन. पिछले पांच-छ: सालों से टीवी की दुनियां में रिअलिटी शो की झड़ी सी लगी है, उन सबमे से सत्यमेव जयते वाकई कुछ रियल सा लगा. हकीकत,जिसे हम सभी जानते है, उसी के कुछ अनछुए पहलु और मुद्दों को मद्देनज़र करता है यह शो. आमिर खान हमेशा से ही कुछ अलग करते आये है और इस बार वे छोटे परदे पर भी सफल हुए है,वे सही कहते है कि दिल पे लगेगी तभी बात बनेगी.उन्होंने सीधे दिल पे चोट की है इस शो के माध्यम से. रविवार की सुबह जब नाश्ते और खाने की जगह सिर्फ brunch ही होता है, समय निकालना थोडा मुश्किल होता है लेकिन मैंने निकाला और वो भी पूरा एक घंटा. पहले एपिसोड का मुद्दा था 'कन्या भ्रूण हत्या'. शो की शुरुआत में ही आँखे नम होने लगी,लड़की को जन्म देने की वजह से पीड़ा झेल रही महिलाओ से रूबरू करवाया गया,उनकी व्यथा इतनी तीव्र थी कि शब्द लड़खड़ा रहे थे,आँखे ही नहीं गला भी भर रहा था,आमिर की आँखों में भी कुछ पिघलता हुआ सा महसूस हुआ....दर्शक-दीर्घा में बैठे लोग भी निशब्द थे....सबके दिलों पे जो लगी थी,लेकिन शो ख़त्म होते-होते आ

नासूर

बात कुछ दिन पहले की है  चोट लगी थी हाथ पर  हलकी सी चोट थी  इसलिए मैं मौन थी  ना दर्द था, ना दर्द का अहसास  कुछ दिन बाद  फिर चोट लगी  उसी स्थान पर  थोड़े समय दर्द हुआ  मैं मुस्कुराकर रह गई  बात आई-गई हुई  मैं अपने कामो में व्यस्त हुई  अचानक ; एक दिन फिर वही दुखती नस  पुनः दबाव में आई  इस बार हलकी सी आह भी बाहर आई  मैंने भुलाने की कोशिश की  लेकिन इस बार  दर्द कुछ ज्यादा था  शायद मेरी सहनशक्ति की परीक्षा थी  जीवन की प्राथमिकताओ की समीक्षा थी  थोडा समय लगा दर्द भुलाने में  अपनों के घावों को  सहलाते-सहलाते  मरहम लगाते , अपने ही घाव की सुध-बुध ना रही  शायद इसीलिए  कल बिना चोट के ही  दुखने लगा हाथ, नसें बुदबुदाने लगी  रक्त दर्द से उबाल खाने लगा  देखा , तो हाथ में नासूर बन चूका था  चुक गई मैं, भूल गई मैं  चोट पे चोट सहती गई  बेवजह यूं ही बहती गई  पहली चोट पे संभली होती  ना होता नासूर  और ना मिलता दर्द बिना कसूर 

कुछ क्षणिकाए

   जलना  आग में और इर्ष्या में  कारण है विनाश का सर्वनाश का !                                                            चुप्पी   चटकाती है दिल  रिश्ते मरते तिल-तिल  ! सूरज  तुम्हारे नाम का  मेरे ललाट पे सज  मान बढाता तुम्हारा और मेरा भी ! मैं आहत होती हु  अपनों के रूखे व्यवहार से नहीं  बल्कि चाशनी में लिपटी उनकी बातों से !              अपनों का साथ       है खुशियों का तडका         दुखो की दाल में !     धुँआ धुँआ  है जिंदगी  जब जल रहे हो  रिश्ते आस पास 

उषा आगमन

निशा ने पलके झपकाई ,  उषा ने ली अंगडाई चकोर ने गर्दन झुकाई ,  उत्पल मुख मुस्कुराहट आई  आदित्य अंशु ने बिखराई पाँखे चंचल विहगों ने खोली आँखे  पीपल के पत्तो पर पड़े हिमकण रश्मि आभा पा हुए मोती विलक्षण  पुलकित पुलकित हुआ मनु-पुत्र  पाया जब उसने एक और नया विकल्प  आदित्य ने फैलाया अनुपम आलोक  स्वर्णिम स्वर्णिम लगे तब मन्दाकिनी तोय  वाणी ने किया वीणा को झंकृत  तब सरगम से हुई पृथ्वी अलंकृत 

परीक्षा बनाम अग्निपरीक्षा

परीक्षा भवन में आज गहरा सन्नाटा था रह रह कर मेरा दिल घबरा रहा था  सुबह की घटनाओ को याद कर  ना जाने क्यों आँखे भी फटी सी रह गई , जहा थी वही अचल सी मैं रह गई  धडकनों की आवाज़ लगने लगी ऐसे  नगाड़ो पर पड़ रहे हो हथोड़े जैसे  एक सौ साठ प्रति मिनिट हो रही थी ह्रदय गति  कुछ उपाय समझ ना आया , घूम गई मेरी मति  कांप गई मैं पूरी की पूरी , हाथ पावँ थरथराने लगे  सुबह के दृश्य चलचित्र की भांति मेरे सामने आने लगे  सुबह सुबह गधा भी आज बांयें से गुजरा था  निगोड़ी काली  बिल्ली ने भी रास्ता मेरे काटा था  राशिफल भी कुछ अच्छा ना था , अनिष्ट के घटित होने का उसमे पक्का वादा था  लेकिन फिर भी मै बड़ी बहादुरी से चली आई थी परीक्षा देने  लेकिन अब ; परीक्षा भवन के सन्नाटे से मेरा दिल घबरा रहा था  अनिष्ट के घटित होने का ख्याल दिल में बार बार आ रहा था  परचा मिलने में समय था अभी बाकी  कि तभी मुझे याद आया , अरे ! आज सुबह तो आँख भी मेरी फड़की थी  कोसने लगी मैं खुद को , किस बुरी घडी में मैंने घर से निकलने की  ठानी थी  खैर , घडी ने साढे सात बजाए पर्चे बांटने को सर परीक्षा भवन

माँ हूँ तुम्हारी

एक कविता मेरे बेटे के नाम उसके जन्मदिन पर             चाहती हूँ मैं  कि मेरी खुशियाँ तुम्हे लग जाये  और , तुम्हारे दुखों को मैं अपना लू  आँख में आये आंसू तुम्हारे  तो अपनी पलकों में सहेज लू  कही मिले ना आसरा तुझे  तो अपने आँचल में समेट लू  हंसो जब तुम  तो तुम्हारी मुस्कुराहट को गले लगा लू  जब ख़ुशी से चमके तुम्हारी आँखे  तो उसे अपनी कामयाबी बना लू  गलत राह भी ग़र चलो तुम  तो वो राह भी तुम्हे चुनने ना दूँ  क्योकि ; माँ हूँ तुम्हारी  चाहती हूँ तुम्हे परिपूर्ण देखना 

माँ मुझे जन्म दो

माँ मुझे मत मारो मैं तुम्हारा ही एक हिस्सा हु  तुम्हारी कोख में पल रहा  एक अधूरा ख्वाब हु मैं  जिसे देख रही हो तुम पिछले तीन महीनों से तुम चाहती हो वो कलाई  जिस पर दीदी राखी बांधे वो ललाट जिस पर दूज का टिका सजे  और अब  तुम्हारा मन विचलित है  क्योकि तुम्हे मेरी पहचान हो गई है  जब से तुम्हे मेरे बारे में पता चला है  तुमने तैयारियां शुरू कर दी  मुझे मार डालने की  लेकिन माँ  मेरा क्या कुसूर ? तुम कहती हो  पापा को वारिस चाहिए  दादी को वंश बढ़ाना है  लेकिन माँ  ये तो बहाना है  क्योकि प्रश्नचिन्ह तो तुम्हारे ही मन में है  तुम खुद नहीं चाहती कि मैं जन्म लू माँ मुझे याद है  जब तुम्हे पहली बार मेरा अहसास हुआ  तुम बहुत खुश थी  और मैं भी  मैं जल्द से जल्द इस दुनियां में आना चाहती थी  तुम्हारी गोद में समा जाना चाहती थी  तुम्हारी मधुर आवाज़  कोमल स्पंदन सब कुछ मुझे आनंदित कर देता था  लेकिन धीरे-धीरे  तुम्हारे ख्याल ख्वाब मुझे समझ आने लगे  मैं नन्ही जान  डर गई  क्या होगा ? जब तुम्हे मेरे अस्तित्व का पता चलेगा  माँ, मेरा द

आज होली है

आज होली है सब रंगे एक ही रंग में नकाब पे चढ़ गया एक और नकाब पहले ही ना पहचाने जाते थे अब तो पहचानना और मुश्किल हो गया नकाबपोशों की इस दुनियां में चलो चलते है चुराते है कुछ रंग खुशियों के और सजाते है जिंदगी का इन्द्रधनुष जला देते है होली उन कडवी यादों की जो गाती है दास्ताँ बेरंग से ज़ज्बातों की चलो , चुराते है कुछ रंग क्योकि , आज होली है रंगों से भरी पिचकारी है हर रंग में रंगी दुनिया सारी है आज होली है 

मन उदास है

      आज मन उदास है  सब कुछ मेरे पास है   कोई आरजू ना आस है   जाने क्यों   फिर भी मन उदास है   शायद   रूखे मौसम का तकाजा है   या फिर   बेरुखियों का तमाचा है   भागे मन , दौड़े मन   बंज़र रेगिस्तान में ये कैसी प्यास है    आज मन उदास है    खुशियाँ बिखरी आस-पास   दुखों से मन मेरा अनजान   बाहर है संगीत तो अन्दर निश्वास है   जाने क्यों   आज मन उदास है   रोज सजते सपने जिन आँखों में   आज टकटकी लगी वीरानो में   अपनों का मेला है सपनो का रेलम-पेला है फिर भी मन मेरा अकेला है क्या ये आने वाले वक़्त की कुछ अनहोनी आहट है या फिर मन नहीं , आज का मौसम ही उदास है 

कोई नहीं चाहता

बिना आगाज़ के ही अंजाम चाहते है लोग बिना प्रयास के ही सफलता पा लेना चाहते है लोग जिंदगी की दौड़ में जीत चाहते है लोग लेकिन जीत के लिए मेहनत ...........................................कोई नहीं चाहता दूसरों की खुशियों को छीन लेना चाहते है लोग लेकिन अपनी खुशियों को बांटना ...........................................कोई नहीं चाहता सोने की तरह चमकना चाहते है लोग लेकिन कुंदन की भांति आग में तपना .........................................कोई नहीं चाहता आसमां को बाँहों में लेना चाहते है लोग लेकिन ज़मीं पर पैर जमाना .........................................कोई नहीं चाहता मंजिल तक पहुँच जाना चाहते है लोग लेकिन संघर्षों का मुकाबला .........................................कोई नहीं चाहता सफलता पर बधाइयाँ देते है लोग लेकिन दुःख में सांत्वना देना .........................................कोई नहीं चाहता दूसरों को बात बात पर टोकते है लोग लेकिन अपनी स्वतंत्रता का हनन .........................................कोई नहीं चाहता अपने महलों में घी के दियें जलाते है लोग लेकिन टूटे आशियाँ को

एक और नन्हा सा प्रयास

शगुन के शब्दों ने इस बार मुझे वाकई खुश कर दिया .....सधे हुए शब्दों का सधा हुआ ताल-मेल .....अच्छी शुरुआत कर रही है मेरी बेटी ....मन खुश है    " भूल जाओ बीते पल       लेके आओ नई उमंग        सूर्य फिर से आएगा          लेकर उम्मीद की किरण            तब दिखा दो             तुम अपने रंग "                                          शगुन 

क्या है आज़ादी

वो तो नन्हे की आँख का तारा है जो हम सब को बेहद प्यारा है वो तो है एक मीठी सी शहजादी जिसे कहते है हम आज़ादी कई जंजीरों ने इसे जकड़ा है तो कही आडम्बरों ने इसे पकड़ा है यूँ तो आज़ाद है हम लेकिन अपने ही बनाये बन्धनों में घूमते है सभी बस पिंजरे में नहीं है लेकिन बेड़ियों में बंधे है सभी आज़ाद दिखने की होड़ में खो बैठे आज़ादी ना जाने जिंदगी के किस मोड़ में आँखे बन गई सूखा तालाब पथरीली हो गई गालों की ज़मीं होठ सूख कर मुरझा गए खो गई सबकी हसीं क्या यही है आज़ादी मायने नहीं समझे आज़ादी के दायरे बढा दिए बरबादी के  आज़ादी से आसमां में उड़ने की चाह  चल पड़े सफलता की वो अनजानी राह  ज़मीं भी छूटी आसमां भी छूटा  पंख तो मिले पर पावँ कटा आये  भुला बैठे नियामत खुदा की  जरुरत थी तो बस थोडा सा मुस्कुराने की  लेकिन हम फंस गए अपनी ही बनाई परिभाषाओ में  कभी ढूंढते शब्दकोष में  तो कभी संविधान की धाराओ में  अब समझ पाई हु आज़ादी के सही मायने  ग़र मिल जाए वो निश्छल हंसी  तो तालाब भर जायेगे समंदर की तरह  पथरीली ज़मीं हरी हो जाएगी  गुलाब की पंखुड़ी  फ़ैल जायेगी दोनों गालो तक 
बात दो-चार दिन पहले की है ,सुबह जब नारियल के तेल की शीशी को हथेली पर उंडेला तो उसमे से तेल नहीं निकला ,मुझे आश्चर्य हुआ कि अभी हफ्ते भर पहले तो ख़रीदा ही था ,इतनी जल्दी ख़त्म कैसे हुआ ? लेकिन शीशी खाली नहीं थी ....थोडा दबाया तो कुछ निकलता हुआ सा महसूस हुआ ........'ये तो तेल ही है जो ठण्ड कि वजह से जम गया था .मेरा आश्चर्य अब एक सुखद अहसास में बदल गया क्योकि मुंबई के मौसम में और वो भी फरवरी के महीने में तेल का जमना आम बात नहीं है               पुरे साल भर एक ही जैसे मौसम की मार सहने वाले हम मुम्बईकर तरसते है ऐसे मौसम को ...........इस बार की गुलाबी ठंड वाकई मौसमी मज़ा दे रही है .सुबह की धुप कुछ ज्यादा ही प्यारी लगने लगी है और जब सुबह की यह धुप मेरी खिड़की से लटकी कांच की लटकनो पर पड़ती है तो लगता है कि कई नन्हे सूरज मानो जैसे मेरी खिड़की पर आ गए हो , जब उनकी चमक परावर्तित होकर मेरे आँगन में बिखरती है तो उन पर चलने का मिठास मैं बयाँ नहीं कर सकती        यहाँ ठिठुरन तो नहीं है लेकिन सिहरन जरुर है ,दांत तो नहीं बजते लेकिन कानो से ठंडी हवा का प्रवाह चाय की चुस्की मारने को उकसा
कल शाम का खुशगवार मौसम न जाने क्यों बहुत कुछ लिखने को प्रेरित कर रहा था .हाथ में लेखनी को पकड़ा ही था कि मेरी १२ वर्षीया बेटी ने कहा  'मम्मा मैं भी कुछ लिखू ' मैं मुस्कुरा दी और लिखने में व्यस्त हो गई ,तभी उसने कुछ दो-चार लाइने लिख कर पकड़ा दी ,उसकी टूटी-फूटी हिंदी ,साथ में मुम्बईया भाषा का तड़का और उसकी मन:स्थिति ....सब था इन लाइनों में  प्रस्तुत कर रही हूँ उसके प्रथम प्रयास को प्रोत्साहन के लिए आपके समक्ष  कितनी करती किताबे बोर  स्कूल ले जाती मैं बस्ते का बोझ  आती जब किताबे आँखों के सामने  क्यों सो जाते हम बच्चे लोग  पर क्या करे ..................... पढना ही पड़ता हर रोज कभी हिंदी की मात्राओं में खोती  तो कभी  गणित के फार्मूलों में उलझती  उफ़ ये मराठी  मेरे सर के ऊपर से चली जाती  विज्ञान के चमत्कार तो समझ ही ना पाती  सच,कितना करती मुझे बोर ये किताबे 

पथिक

पथिक तू चलता चल अपनी मंजिल की तरफ कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र फूलों के ख्वाबों को छोड़ काँटों की राह पकड़ संघर्षों से जूझता तू बढ़ता चल अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र राह में मिलेंगे बहुत से हमसफ़र इस कारवें में भीड़ का हिस्सा बनना मत न करना कोई शिकवा-शिकायत बस चुपचाप , अपने बुलंद इरादों के साथ भीड़ को चीर के बढ़ता चल अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र तनिक सी कामयाबी के जाम पीकर उसके सुरूर में ना खोना क्योकि ; हो सकती है यह तुफां के पहले की ख़ामोशी या फिर ; किसी मृग-मरीचिका की मदहोशी इसलिए ; छलकते टकराते जाम को छोड़ आने वाले तुफां के लिए खुदी को बुलंद कर , खुद को तैयार कर तू चल अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ पथिक तू बढ़ता चल कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र 
                   शुभ प्रभात  बिटिया की जिद के चलते घर में फिर से एक नन्हे से जीव का प्रवेश हुआ है और पिछले दो दिनों से घर की धुरी मैं नहीं बल्कि कछुआ प्रजाति का यह नन्हा सा जीव बना हुआ है .इसे देखते ही सबसे पहले बचपन की वो कहानी याद आती है जिसे हमने ना जाने कितनी बार वार्षिक परीक्षा की उत्तर-पुस्तिका में लिखा था .......बचपन की वो बार-बार दोहराई हुई कहानी आज भी शायद हम सबके स्मृति-पटल पर अक्षरश: अंकित है. लेकिन आज भी इस कछुए को देखकर यही लगता है कि क्या वाकई इस धीमी चाल के कछुए ने फुर्तीले खरगोश को हरा दिया था या फिर ये हमारे पूर्वजो द्वारा गढ़ी गई एक कहानी मात्र है, बालमन को प्रेरित करने की.......हम तो इस कहानी से प्रेरणा ले लिया करते थे ,लेकिन आज मन में एक सवाल उठता है ,क्या आज की पीढ़ी के बच्चे ऐसी कहानियों से प्रेरित होते है ?                       खैर.........................बेटी (शगुन) बहुत खुश है ,कभी उसे खाना देती है, कभी नहलाती है,दिन में दो बार उसका पानी बदलती है, कभी हथेली पर लेकर उसे सहलाती है और जब वो उसे फर्श पर छोड़ती है तो ये नन्हा जीव घबरा कर अपने-आप को खोल मे

मन की थाह

मन की थाह  मन करता है कि आसमां को माप लु  समुंद्र की गहराइयों को छू लु  चाँद की चांदनी को समेट लु  सितारों को अपनी चुनरी में सजा लु  छू लु किसी के अंतर्मन को  और वेदना को कम कर जाऊ  किसी के मन की तपिश को  मेरे मन की शीतलता सुकून दे जाए  और भी ना जाने  क्या-क्या चाहता है मन मेरा  बस कोई तो एक हो  जो मेरे भी मन की थाह ले सके 
पिछला पखवाडा बहुत व्यस्तता वाला रहा .....सूर्य देव के मकर राशी में प्रवेश के साथ ही मल-मास समाप्त हो गया और शुभ कार्यों का शुभारम्भ हो गया ........मकर सक्रांति का त्यौहार , माहि चौथ का व्रत , घर के प्रांगण में माता की चौकी और दैनिक जीवन में घटने वाली छोटी-छोटी घटनाएँ जो मन-मस्तिष्क पर अमिट प्रभाव छोड़ देती है ........इन्ही सब के बीच नए साल का पहला महिना विदा लेने को है और विदाई के साथ मेरी झोली में डाल जायेगा खट्टी-मीठी यादों की सौगात ......और हर बार की तरह मैं मीठी यादों को सहेज लूँगी अपनी ही यादों के बगीचे में और खट्टी यादों की पोटली बना फ़ेंक दूंगी पास के तालाब में ...........                             यादों के गलियारों से निलकते हुए           अतीत के झरोखों से झाकते हुए           कभी-कभी जी लेती हु मैं भी          वो पल ,          जिन्हें सहेजा है मैंने अपनी ही यादों के पिछवाड़े में          जहा आज भी सांसे भरती है खुशियाँ          महसूस करती हु उन सांसों की गर्माहट          आज भी         एक ही क्षण में ,अपनी पूरी आत्मीयता से         जी लेती हु वो पल          और जी क