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पलाश

एक पेड़  जब रुबरू होता है पतझड़ से  तो झर देता है अपनी सारी पत्तियों को अपने यौवन को अपनी ऊर्जा को  लेकिन उम्मीद की एक किरण भीतर रखता है  और इसी उम्मीद पर एक नया यौवन नये श्रृंगार.... बल्कि अद्भुत श्रृंगार के साथ पदार्पण करता है ऊर्जा की एक धधकती लौ फूटती है  और तब आगमन होता है शोख चटख रंग के फूल पलाश का  पेड़ अब भी पत्तियों को झर रहा है जितनी पत्तीयां झरती जाती है उतने ही फूल खिलते जाते है  एक दिन ये पेड़  लाल फूलों से लदाफदा होता है  तब हम सब जानते है कि  ये फाग के दिन है बसंत के दिन है  ये फूल उत्सव के प्रतीक है ये सिखाता है उदासी के दिन सदा न रहेंगे  एक धधकती ज्वाला ऊर्जा की आयेगी  उदासी को उत्सव में बदल देखी बस....उम्मीद की लौ कायम रखना 

पलाश

इस बार जब अपने खेत वाले घर में जाना हुआ तो दूर से ही घर के पिछवाड़े एक लाल पेड़ मुझे दिखा और बरबस ही मुझे चिनार याद आ गये ।          मैं नजदीक गयी तो पता लगा कि बसंत आने वाला है....ये पलाश के फूल थे जो पेड़ की शाखाओं पर झूंड में थे । जब मैंने छत पर जाकर देखा तो कई जगह ये पलाश के पेड़ दिखे । पहाड़ों में,जंगलों के बीच ये पेड़ इतने खूबसूरत लग रहे थे कि कल्पना भी नहीं की जा सकती ।        मैंने पलाश के पेड़ों को नजदीक से जाकर देखा, बड़े बड़े तीन पत्तों की जोड़ी वाला ये पेड़ अपनी पत्तियों को गिरा रहा था और जो पत्तियाँ पेड़ों पर थी वो भी सूखी सी, धूल मिट्टी से सनी । यहाँ पर सभी पेड़ ऐसे ही थे ....सब पर धूल जमी हुई थी । मेरे मन ने कहा कि एक बारीश होगी और ये सब नहाये धोये हो जायेंगे। प्रकृति सबका ख्याल रखती है अपने तरीके से ।        हाँ , तो हम वापस आते है पलाश पर.....इन धूल जमी आधी बची सी पत्तियों के बीच ये अलौकिक पुष्प इस तरह खिल रहे दे जैसे कोई दैवीय वृक्ष हो । पत्तों पर जितनी धूल थी वही इसकी मखमली पत्तियों पर कही कोई धूल नहीं बल्कि एकदम ताजगी भरा अहसास । एक ही वृक्ष पर दो विरोधाभास । मेरी उत्सुकता बढ़ गय

भवाई नृत्य शैली

जब आप कोई भी यात्रा करते है तो आपकी जिंदगी की किताब में एक पन्ना अनुभवों का जानकारियों का जुड़ जाता है। इस बार मैं थी रणमहोत्सव में....जहाँ मुझे गुजरात की कोर जानकारी मिली। यहाँ की संस्कृति के परम्परागत वाद्य यंत्रों के बारे में जाना जोकि विलुप्त प्रायः है । रणमहोत्सव जैसे आयोजन शायद इसीलिए किये जाते है कि इन विलुप्त होती गूढ़ कलाओं को जीवित रखा जा सके, कलाकारों को काम मिल सके और पूरा देश इनसे परिचित हो सके। मेरा मानना है कि किसी भी संस्कृति को बचाये रखना बहुत दुभर काम है और अगर कोई कलाकार चार पुश्तों से अपनी कला को संभाल रहे है तो उनके लिये प्रोत्साहन और रोज़गार दोनो जरुरी है।        इसी के चलते मैं रुबरु हुई गुजरात की एक नृत्य शैली से जो राजस्थान से भी जुड़ी हुई है। इस शैली का नाम है 'भवाई' । हमे बताया गया कि इसे करने के 365 तरीके है और हमारे सामने इसकी एक प्रस्तुति होनी थी 'किरवानो भेष' ।      प्रस्तुति शुरु हुई ....सफेद सिल्क में चमचमाती वेशभुषा में एक लोक कलाकार आये और उन्होने घूमते हुए करतब शुरु किये । पहले वे तलवार जैसी किसी चीज को हाथ में घुमाते हुए प्रदर्शन कर रहे

हाशिये पर के लोग

किताब के हरेक पन्ने पर एक हाशिया होता है जिस पर कुछ लिखा नहीं जाता बस खाली छोड़ दिया जाता है बिल्कुल इसी तरह कभी कभी  साथ चलते चलते  किसी को हाशिये पर रख आगे बढ़ जाते है लोग हाशिये पर बैठे ये लोग सब देखते है  सब समझते है कि कैसे वे मुख्य पृष्ठ से  हमेशा धकेले जाते है कभी सम्मान की दुहाई देकर कभी छोटा बताकर कभी बड़ा और समझदार बताकर तो कभी एक तमगा देकर भावनात्मक रुप से छलकर  समेट दिया जाता है उनका वजूद और रख दिया जाता है  हमेशा हाशिये पर ही कभी सोचा है ऐसा क्यो ? वास्तव में .... मुख्य पृष्ठ सदैव डरता है कि  हाशिये पर अकेला खड़ा वो शब्द मुख्य पृष्ठ का शीर्षक न बन जाये 

दीपावली

आज लक्ष्मी पूजन है आपके घर में भी एक स्त्री है  जो प्रतीक है हर देवी का पिछले पंद्रह दिनों से आपके घर को झाड़पौछकर  रसोई में आपके पसंदीदा व्यंजन बनाकर वो भी कर रही है तैयारी  लक्ष्मी पूजन की  पगली....भुल जाती है  वो स्वयं लक्ष्मीस्वरुपा है वो परिवार को शिक्षित करती है साक्षात सरस्वती का रुप है वो लड़ जाती है अपनों के लिये अंधेर रातों को काजल में सजाती वो कालरात्रि है अपने आत्मसम्मान को  जी जान से बचाती वो दुर्गा का हर रुप है  खुशबू बिखेरने इसे परफ्यूम्स की जरुरत नहीं मसालों में महकती  ये आपके घर की अन्नपूर्णा है आप सभी को दीपावली की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏

भरोसा

एक मन कितनी बार भरोसा करेगा ? दूसरी बार... तीसरी बार.... चौथी बार....? पाँचवी बार में वो अभ्यस्त हो जाता है उसे हर बार दरकते भरोसे की  आहट पता लग जाती है वो अब भरोसे की कल्पनाओं से बाहर है मन के शब्दकोष में अब  ये शब्द गुमशुदा है वो असमंजस में है, पीड़ा में है प्रपंचों के जंजाल में खुद को एक सीध में रखते हुए अब वो अक्सर एक सवाल करता है कैसे होगा भरोसा ? क्योकि यहाँ एक दौड़ लगी है हर एक भागा जा रहा है  भरोसा हाथ में लिये जैसे दौड़ते थे हम बचपन में लेमन स्पून दौड़ में  निंबू गिर जाता था  हम खेल के बाहर हो जाते थे  लेकिन.... भरोसा गिरता है  और कोई खेल के बाहर नहीं होता इसलिए किसी को कोई डर नहीं झूठ सच कुछ भी करके  सब भरोसा बनाये हुए है और मन स्तब्ध है