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भरोसा

एक मन कितनी बार भरोसा करेगा ? दूसरी बार... तीसरी बार.... चौथी बार....? पाँचवी बार में वो अभ्यस्त हो जाता है उसे हर बार दरकते भरोसे की  आहट पता लग जाती है वो अब भरोसे की कल्पनाओं से बाहर है मन के शब्दकोष में अब  ये शब्द गुमशुदा है वो असमंजस में है, पीड़ा में है प्रपंचों के जंजाल में खुद को एक सीध में रखते हुए अब वो अक्सर एक सवाल करता है कैसे होगा भरोसा ? क्योकि यहाँ एक दौड़ लगी है हर एक भागा जा रहा है  भरोसा हाथ में लिये जैसे दौड़ते थे हम बचपन में लेमन स्पून दौड़ में  निंबू गिर जाता था  हम खेल के बाहर हो जाते थे  लेकिन.... भरोसा गिरता है  और कोई खेल के बाहर नहीं होता इसलिए किसी को कोई डर नहीं झूठ सच कुछ भी करके  सब भरोसा बनाये हुए है और मन स्तब्ध है

बप्पा तुम्हे विदा

कुछ दिनों के तुम मेहमान बनकर आये दुखों को पार लगाने आये ढ़ोल नगाड़ों पर तुम नाचते आये पलक पांवड़ो पर बिछकर आये तुम आये खुशियों को साथ लेकर तुम आये उस उत्सव की तरह जिसके साथ साथ सब हर्ष आता इसीलिए तो कहते रिद्धि सिद्धि सुख संपत्ति के तुम दाता आज अंतिम दर्शन का दिन आया विर्सजन करते मन अकुलाया  लेकिन जाओगे तभी तो आओगे  आने जाने के इस जीवन में  विसर्जित होकर भी ह्रदय में रह जाओगे अगले बरस तक राह तकेगी आँखे तब तक तुम्हे विदा करते उड़ते अबीर गुलाल  और मेघ गर्जना के साथ बप्पा तुम्हे विदा 

एक संवाद

आज एक संवाद सुना ।  दो स्त्रियां.....जिनमे से एक बिल्कुल सधे शब्दों में कुछ पूछती है और दूसरी कभी खिलखिलाकर तो कभी रोतलू सी उनका जबाब देती है और कभी असमंजस में कहती है कि ' पता नहीं ' ।        संवाद था सुदीप्ति और अनुराधा के बीच । सुदीप्ति को मैं इंस्टाग्राम पर उनकी साड़ियों की वजह से जानती थी और हमेशा पढ़ती भी थी। अनुराधा को उसकी पहली किताब 'आजादी मेरा ब्रांड' के वक्त से जानती हूँ । तीखे नैन नक्श वाली निश्छल सी लड़की ,जो यकीनन वही है जो वो दिखती है और  खूबसूरत इतनी कि कोई भी मुग्ध हो जाये ।       संवाद एक बार शुरू हुआ तो पता ही न लगा कि कब समय गुजर गया।  दोनो ही नदियों की तरह.....सुदीप्ति जहाँ शांत बहाव वाली मन को सुकून देने वाली नदी तो वहीं अनुराधा ,चंचल हिलोरे लेती कलकल बहती नदी, जो अपनी बौछारों से आपको भिगो दे ।       सुदीप्ति जिस तरह से प्रश्न पूछती है ....उनकी आवाज का गांभीर्य और ठहराव उस प्रश्न को बातचीत बना देता है और यह वाकई एक कला है।  सामने वाला आपका दोस्त है, आपकी व्यक्तिगत जानपहचान है लेकिन एक सार्वजनिक मंच पर उस निजता को बनाये रखते हुए एक प्रवाहमयी संवाद को स

मन

कभी कभी मन डुबा सा रहता है कभी हिलोरे लेता  किसी पल सहम जाता  तो कभी कमल सा खिल जाता  कभी खारा हो जाता समंदर सा तो कभी नदी की मिठास सा कभी घनीभूत होता विचारों से तो कभी सांय सांय करता खाली अट्टालिका की तरह  कभी ध्वज सा लहराता किसी शिखर पर कभी जमीदोंज होता कोई कोना कभी शांत होता मंदिर के गर्भगृह सा तो कभी शोर मचाता सुनामी सा कभी कलकल बहता झरने सा तो कभी सब कुछ लीलता तुफान सा कभी परिचित सा तो कभी अजनबी अनजान सा मन है......... विरोधाभास के बीच  कहाँ खुद को जानने देता #आत्ममुग्धा

जीवन उत्सव

क्यो इंतजार करते हम खुशियों का क्यो तकते राह उत्सवों की क्यो साल भर बैठ  इंतजार करते जन्मदिन का क्यो नहीं मनाते हम हर एक दिन को क्यो नहीं सुबह मनाते क्यो शामें उदास सी गुजार देते क्यो नहीं रात के अंधेरों को हम  रोशनाई से भरते कभी अलसुबह उठकर सुबह का उत्सव मनाना देखना कि कैसे  आसमान सज उठता है  चहकने लगते है पक्षी खिल उठता है डाल का हर पत्ता अगुवाई होती है सुरज की  वंदन होता है उसके प्रखर तेज का तुम उस तेज को मनाना सीखो कभी शाम भी मनाओ ढ़लते सुरज को देखो  उसके अदब को देखो शाम-ए-जश्न के लिये खुद विदा कह जाता है गोधूलि की धूल को देखो घर लौटते पंछियों को देखो ऊपर आसमान में  विलीन होती सिंदुरी धारियों को देखो आरती के समय ह्रदय में उठते कंपन को देखो देखो .....हर रोज शाम यूँ ही सजती है अब....रात के अंधेरों को मनाओ ये रातें तुम्हारे लिये ख्वाब लेकर आती है इन्हे परेशान होकर मत जिओ सुकून से रातें रोशन करो बोलते झिंगुरों के बीच तुम जरा चाँद से बाते करो उसकी कलाओं को निहारो  सोचो जरा..... सदियों से ये चाँद हर रात को उत्सव की तरह मनाता है तुम भी उत्सव मनाना सीखो कभी समंदर की आती जाती लहर को देखो कभी

सखा

भारतीय पुराणों की अद्भुत घटनाओं में से एक है कृष्ण सुदामा मिलन । यूँ तो कृष्ण की लीलाओं का कोई छोर नहीं पर ये विलक्षण लीला तो विभोर कर देती है।          सुदामा, जो कि कृष्ण के बाल सखा है और दीनहीन गरीब ब्राह्मण है । दोनों सखाओं का बचपन छूटा और साथ भी छूटा। कृष्ण द्वारका आ गये और वही के होकर रह गये। अपनी दरिद्रता से दुखी सुदामा अपने सखा कृष्ण जोकि अब राजा है, से मिलने द्वारका आते है । कृष्ण को जब सुदामा के आने का संदेश मिलता है तो कृष्ण नंगे पावं दौड़े आते है और अपने बालसखा को देखकर विभोर हो उठते है। वे सुदामा को अपने साथ महल में लेकर आते है ,अपने सिंहासन पर उन्हे बैठाते है और उनके लहुलुहान पावों को अपने हाथों से धोते है।        महल में सब लोग सन्न है, रुक्मिणी अचंभित है, स्वयं सुदामा स्तब्ध है । 36 करोड़ देवी देवता मंत्रमुग्ध है इस कृष्णलीला पर। कैसी होगी वह घड़ी जब एक दरिद्र  ब्राह्मण सिहांसन पर विराजमान है और स्वयं द्वारकाधीश उनके चरणों में बैठकर उनके चरण पखार रहे है । जिसने भी यह दृश्य देखा, ठगा सा रह गया और अश्रु झड़ी से सराबोर हो गया। द्वारकाधीश की प्रेमपगी आँखे अनवरत बह रही है , वे ए