सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पोस्ट

प्रदर्शित

पेंटिंग के पीछे की कहानी - 2

अब शुरु हुआ एक सपने पर काम....एक ऐसा सपना जो शायद गैरजरुरी सा था । जिसके पूरे होने न होने से कोई बड़ा फर्क न पड़ने वाला था,लेकिन मन बड़ा उत्साहित था भीतर से । ऐसा भी नहीं था कि ये बनाना आसान था लेकिन हाँ इतना मुश्किल भी न था। मुझे खुद पर यकीन था कि भले अच्छा न बने पर बिगड़ेगा नहीं।        बस...शुरुआत हो गयी , रंगों का समायोजन पहले से ही दिमाग में था। बुद्ध को उकेरने किसी रिफ्रैंस इमेज की भी जरुरत नहीं थी, उनकी छवि भी दिमाग में थी।          जब पहली बार पेंसिल से बनाया, तब समझ में ही नहीं आया कि आँखे छोटी बड़ी है ....नाक की लंबाई कम है , होठ बीचोबीच नहीं है। सबसे बेकार बात यह थी कि मैं पोट्रेट को दूर से नहीं देख सकती थी क्योकि यह सीढियों की दीवार थी। नजदीक से कुछ भी पता नहीं लग रहा था और थोड़ा साइड से देखने पर ऐंगल ही अलग हो जाता था। अजीब कश्मकश थी....इसे सही तरीके से पूरा कैसे करूँ, लेकिन इसके पहले मैंने एक बात सीखी कि ज्यादा नजदीक से आप किसी को भी परख नहीं सकते, थोड़ा दूर जायेंगे तो हर चीज साफ नजर आने लगती है, वो कहते है न कि अपने घर की छत से आप अपना घर नहीं देख सकते। अपना घर देखने के लिये आपक…

हाल ही की पोस्ट

पेंटिंग के पीछे की कहानी - 1

देवीस्वरूपा

मन:स्थिति

उत्थान

अव्यवस्था

चुनौतियां

पानी के बुलबुलें

फ्रीडा

वो लड़की

गांठें