गुरुवार, 9 अप्रैल 2020

माँ

मैंने तुम्हारा दाह संस्कार नहीं देखा
अंतिम यात्रा भी नहीं देखी
लेकिन मैंने देखा था तुम्हे
अंतिम बार
चिर निद्रा में लीन थी तुम
शांत थी, निश्छल थी
नये कपड़ों से तुम्हारा मोह कभी नहीं रहा
पर उस दिन तुम्हे
नयी चटख लाल चुनरी में सहेजा गया 
सिंदूर ,बिंदी भी कहाँ भाते थे तुम्हे
पर उस दिन 
सिंदूर दमक रहा था मांग में
एक सुरज सुशोभित था तुम्हारे ललाट पर
और तुम मुस्कुरा भी तो रही थी
न जाने क्यो ?
माँ कभी हँसती है ....
अपने बच्चों को रोता देखकर ?
पर तुम तटस्थ बनी रही
एक चुड़ी पहनने वाली तुम
उस दिन कलाई भरकर चुड़िया
तुम्हे पहनायी गयी
जीवन भर तुम्हे जिन सब का मोह नहीं था
तुम्हे विदा किया गया 
उन्ही सब के साथ
सब घटित हो रहा था 
शायद तिथि पुण्यतिथि में तब्दील हो रही थी 
तुम चली गयी
मेरा एक हिस्सा साथ ले गयी
अपने मन के भिक्षु का
एक हिस्सा मुझे दे गयी
बस.....पिछले छ: सालों से
हम यूँ ही साथ है 


साँसें

ध्यान से सुनो
एकदम ध्यान से
चित्त स्थिर करके सुनो
कुछ साँसों की आवाजें है
भीतर जाती हुई
बाहर आती हुई
पिछले कई दिनों से 
मेरे साथ है ये आवाज
लेकिन ये मेरी साँसें तो नहीं है
ये तो लम्बी सी
जीवन भरती साँसें है
ये सुकून वाली साँसें है
ये खुशी वाली साँसें है
जब कही किसी पेड़ पर
कोई पत्ता हिलता है तो
ये साँस अंदर जाती है
जब कही कोई चिड़िया 
चहचहाती है तो
ये साँस बाहर आती है
इस साँस की आवाजाही से
आसमान नीला हो जाता है
पेड़ और लंबे हो जाते है
पत्ता पत्ता सुर्ख हो जाता है
मोर खुश होकर नाचने लगता है
मछलियां उचक कर 
पानी से बाहर झांक जाती है
ये कमाल है इन साँसों का
सुनो तुम.....
हमारी पृथ्वी साँस ले रही है 

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

तुम जीना

मेरे मन की रौनकें तुमसे है
पल में खिलती, पल में मूरझाती है
अडिग रखना विश्वास ईश्वर की तरह
न टूटना कभी न टूटने देना
ये आते जाते समय की मार है
जो निखारेगी तुम्हे, तपायेगी तुम्हे
इनसे पार जाना है...स्थिर रह डटे रहना
मेरी उर्जा से नहीं, 
खूद की उर्जा से जीना तुम
महसूस करोगे तो सामीप्य पाओगे
तुम अकेले नहीं हो,हम साथ है हमेशा
मेरा हाथ तुम्हारे हाथ में नहीं है
इन सबके बीच तुम्हे थमना नहीं है
एक लंबी दूरी तुम्हे तय करनी है
जीवन संभावनाओं का नाम है, बच्चे 
आस्थाओं और भावों के बहाव में 
तुम शिखर पर रहना
संवेदनाओं को मुखर रखना
असंवेदनशीलता मृत्यु समान है
विकट समय इसका परीक्षा काल है
उर्तीण होना तुम और जीना
मुस्कुरा कर जीना

शनिवार, 28 मार्च 2020

प्रार्थनाएं

इन दिनों टीवी पर दिखाये जा रहे और व्हाट्सएप पर वायरल हो रहे विडियों को देख रही हूँ, जिनमें एक जन सैलाब उमड़ता दिखाया जा रहा है। इस जन सैलाब में कुछ छोटे बच्चें है जो खेलते कुदते चले जा रहे है , कुछ इतने छोटे है जो किलक रहे है अपनी माँओं की गोद में, कुछ नवविवाहित से पति पत्नी है जो नयी दुनिया बसाने शायद शहर आये थे,अब सब समेट फिर से गाँव जा रहे है, कुछ अधेड़ से है जो बूरी तरह से ध्वंस दिख रहे है और भागे जा रहे है भरे पूरे परिवार को लेकर, कुछ नौजवान से है जिनके सिर पर बोझे है, कंधों पर भी सामान है, निराश से है। ये सारा जन सैलाब आज उसी पगडण्डी की ओर जा रहा है जिस पगडण्डी से होते हुए ये इस शहर वाली सड़क पर आ गये थे। एक विडियों में इन लोगों से पुछा गया कि पैदल कब तक चलोगे तो वे कहते है कि गूगल मैप बता रहा है कि छ: दिन में अपने गाँव पहूँच जायेंगे । मुझे उसका जवाब निशब्द कर गया...न जाने इन्हे कितने कितने किलोमीटर तक जाना है, साथ में बुजुर्ग है, महिलाएं है, बच्चें है । 
     लॉकडाउन के इस वक्त में इतनी भीड़ देखकर हम सभी अपने घरों में बैठे लोग चिंतित है कि ऐसे हम कैसे कोरोना को भगा पायेंगे , लॉकडाउन कैसे सफल होगा....ये लोग समझते क्यो नहीं ?  
     ये गाँवों का वो तबका है जो शहरों में हमारे लिये काम करने आया है, ये मजदूर है जो हमे कमाकर देते है , इनके पास घर नहीं होते , साइट पर बने झोपड़ौ में रहते है या फिर किराये के कमरे में। रोज कमाते है रोज खाते है । ये कोरोना को नहीं जानते, इस सुक्ष्मजीवी का तो इन्हे खौफ नहीं। इन्हे डर है अपनी पेट की आग का जिसे शांत करने का जरिया अब इनके पास नहीं रहा। हम अपने घरों में दुबके बैठे है लेकिन इनके पास कोई घर नहीं, न रात की रोटी है न दिन की दाल , हालात ये है कि धरती की जमीन और आकाश की चादर भी नहीं ओढ़ सकते.....कहते है कि एक विषाणु ने इनके फुटपाथों पर कब्जा कर लिया है । ये जा नहीं रहे, धकेले गये है । जाना इनकी मजबूरी है, यहाँ रहेंगे तो खायेंगे क्या?  
     एक और वायरल विडियों देखा, जिसमें पुलिसकर्मीयों द्वारा इन पर अत्याचार किया जा रहा है। इस विडियों में कुछ नवयुवक है जिनके कंधों पर बैग है, शायद गाँव की ओर जा रहे है लेकिन पुलिसकर्मी इन्हे रोक लेते है क्योकि ये कानून का उल्लंघन कर रहे है और सजा के तौर पर उन्हे बैठकर कूदते हुए चलाया जाता है, कंधों पर टंगे बोझ के साथ । वो विडियों देखकर आत्मा रो पड़ी, मन द्रवित होकर विवश हो गया। हम लॉकडाउन है मानवजाति बचाने लेकिन मनुष्यता भी खो रहे है ऐसा करके कही न कही। 
    आसान होता है घर में रहकर बेघर लोगो को गलत ठहराना। ये लोग इनोसेंट है, न इनके पास पर्याप्त जानकारी है न मुलभुत साधन। ये नहीं जानते कोरोना की भयावहता। इनसे अधिक जाहिल है वो लोग जो 22 मार्च को जनता कर्फ्यू को तोड़ते हुए सड़कों पर देशभक्ति दिखाने निकल आये। 
        आज हालांकि सरकार ने इनके लिये बसों की व्यवस्था कर दी है। बस, डर है कि इन अनभिज्ञ लोगों की अनभिज्ञता का फायदा वो सुक्ष्मजीवी न उठाये। अगर इनमे से एक भी संक्रमित हो गया तो गाँव के गाँव तबाह हो जायेंगे पर यहाँ भी उम्मीद की किरण ये है कि ये तबका फुटपाथों पर रहकर, गंदगियों में पलकर बड़ा हुआ है, इनका इम्यून सिस्टम हर आघात सहकर मजबूत हुआ है.....ईश्वर करे इस जनसैलाब में एक भी व्यक्ति को ये संक्रमण न हो। 
जितनी प्रार्थनाएं मैं अपने यूएस में रह रहे बेटे के लिये कर रही हूँ....उतनी ही प्रार्थनाएं मेरी इनके लिये है। बस, ये लोग सुरक्षित अपने घरों तक पहूँच जाये। आप नहीं जानते ऐसे समय में घर से दूर रहना क्या होता है ? बस, प्रार्थना कीजिए इनके लिये भी....प्लीज 🙏

अमृता और इमरोज़

ऐसा नहीं है कि वो कही गयी बातों को सच मान बैठती है, खासतौर पर प्रशंसा में कही गयी बातें। वो जमीनी हकिकत को जानती है लेकिन उसकी कल्पनाओं का संसार इतना बड़ा है कि वो एक बात कि उंगली थाम न जाने कहाँ कहाँ विचरण कर आती है। वो सच झूठ की कसौटी में नहीं उलझती, कहे गये शब्दों में भी नहीं उलझती और ना ही किसी शब्द पर आँख मूंदकर विश्वास करती है। उसकी अपनी कसौटियां है, इसीलिये वो आत्ममुग्धा है । वो नहीं जानती कि ये घमंड है या ऐसा कुछ जो किसी का नूर बन जाता है लेकिन कोई है जो इसे घमंड बताता है। वो हर शब्द से अर्थ निकालती है....गहन विश्लेषण करती है। उसकी कल्पनाओं का यह संसार कलात्मकता का एक मेला है जिसे रचती है वो अपने ही रंगों, अर्थों और बातों से। अपनी ही बातें उसे कभी कभी आत्मज्ञान की तरह लगती है। उसकी अपनी अनुभूतियाँ उसे विभोर करती है। वो हर बात में अनुभूति को जीती है।
       आज जब किसी ने कहा कि "तुम अमृता भी हो और इमरोज भी" तो वो मुस्कुरा उठी, क्योकि वो कभी कभी खूद को ही कहती रही है कि "मैं इमरोज़ बनना पसंद करूँगी"।
उसे इमरोज़ बहुत पसंद है। हजारों कारण है उसके पास उसको पसंद करने के । आज की ये बात नदी में फेंके गये पत्थर की तरह है जो खूद तो डूब गया पर नदी को गोल घेरों में केंद्रित कर गया ।
अब वो एक अलग ही मायाजाल में है जिसे बस दूर से देखती है...न फंसने को लेकर आश्वस्त  है। 
बस....उसका कल्पनाजगत यूँ ही थोड़ी इतना अलौकिक है , जीयी गयी हर एक छोटी बात को बहुत खूबसूरत से एक  लिहाफ में तह करके रखी है उसने। उसके पास अपनी ही एक दूनिया है,इस दुनिया से अलग। 

मंगलवार, 24 मार्च 2020

इक्कीस दिन

मैं आभारी हूँ आपकी
आभारी हूँ आपके लिये निर्णयों की
आप पर विश्वास हमेशा से रहा है
अब ये अधिक सुदृढ़ हुआ है
असंभव सा जो दिखता था
आपने उसे संभव कर दिखाया
दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र
इतना बड़ा जन सैलाब
उसे थामना
उसे समेटना
कतई आसान न था
बल्कि सोचना भी मुश्किल था
आपने बड़ी सूझबूझ से 
इक्कीस दिनों का चैलेंज सामने रखा
न जाने ये 21 दिन 
कितने भारतीयों की आदत बदल देगा
कहते है ना कि
एक नयी आदत परिपक्व होने में
21 दिन लेती है 
तो आप लहर लाये है बदलाव की
देश को बचाने के ये इक्कीस दिन
वाकई इतिहास में लिखे जायेंगे 
आपके इस फैसले से
आपके व्यक्तित्व की दृढ़ता परिलक्षित होती है
नमन है, नतमस्तक है पूरा देश
आपके आगे
इस वैश्विक महामारी के संकटकाल में
आपका यूँ निर्णय लेना 
एक बहुत बड़ी बात है
पूरे  देश को लॉकडाउन करना
ऐतिहासिक है
सही वक्त पर सही निर्णय 
मैं दिल से आभारी हूँ
पुरा देश आभारी है 
आपकी जनता आपके साथ है
विकसीत देशों के पास 
बेहतरीन चिकित्सीय टीम और संसाधन है
लेकिन हमारे पास आप है 
शुक्रिया आपका 
आपके भाषण के बाद
मैंने अपने बेटे को यूएस में फोन लगाया
जहाँ उसने भी आपको लाईव देखा 
मैंने गर्व से कहा....मोदी है 
वो मुस्कुरा कर बोला...मुमकिन है 

रविवार, 22 मार्च 2020

बस दो हफ्ते

महामारी के मायने हम सभी समझते है तथाकथित समझदार लोग जो है हम। पिछले कुछ दिनों से स्कुल ,कॉलेज, मॉल, थियेटर सब बंद है । इस बंद के क्या मायने है....यही कि हम लोग एक साथ एक जगह भीड़ के रुप में इकठ्ठा न हो, फिर भी हममे से ही कुछ लोग इकठ्ठे हो रहे है। कभी थोड़ी देर टहलने के बहाने, वर्कआउट के बहाने, राशन लाने के बहाने। बड़े बजूर्गों का घर में दम घूट रहा है । बाहर हैंगआउट कर चिल्ल करने वाली नयी पीढ़ी हाथ में सैनिटाईजर लगा कर इसे हल्के में ले रही है । 
     हमारे प्रधानमंत्री मोदीजी ने जनता कर्फ्यू का आवहान किया जिसे शत प्रतिशत सफलता मिल रही है और लोग पूरे मनोयोग से साथ दे रहे है और इंतजार कर रहे है पाँच बजे का ।
निसंदेह मैं भी कर रही हूँ.....मैंने जब विडियों में इटलीवासीयों का यह जज्बा देखा तो उस वक्त भी विभोरता में मेरी आँखे नम पड़ गयी थी। आज शाम जब हम उन विभोर क्षणों को साथ मिलकर जीयेंगे तो वो अलग ही आनंददायक अनुभूति होगी। एक सकारात्मकता पूरे ब्रह्मांड में छा जायेगी । इस सकारात्मकता को हमे कम से कम दो हफ्तों तक बनाये रखना है । हमे उत्सव नहीं मनाना है....ना ही हमे जंग जीतने वाली फीलिंग की जरुरत है....हमे जरुरत है हमारे संयम, सावधानी और सतर्कता की । हम सब जानते है कि सिर्फ करतल ध्वनि से आकाश गुंजायमान कर हम ये लड़ाई नहीं जीत सकते, बल्कि ये करतल ध्वनि तो शंखनाद है, बिगुल है उस लड़ाई का ...जो हमे अगले दो हफ्तों तक लड़नी है, इसलिए सिर्फ ताली बजाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री मत कीजिये.....ये जीत नहीं है ,ये शुरुआत है। विभोरता में आकर इसे जीत न मान ले । हमारे देश का नेतृत्व सबसे सुयोग्य हाथों में है, प्रशासन जितना कर सकता है उससे कही अधिक कर रहा है....इसलिये अनुरोध है अब सतर्क नहीं, थोड़े सख्त भी बन जाईये । दुसरे लोग न सुने पर अपने परिवार को अपनी बात मानने पर मजबूर करे, प्यार से समझाये न समझे तो सख्त बने। सिर्फ दो हफ्तों की बात है....इन दो हफ्तों में दुनिया इधर की उधर न होगी पर हम भीड़ न बने तो कोरोना से लड़ने में सफल जरुर हो जायेंगे।
      मुम्बई की लाईफ लाईन कही जाने वाली लोकल ट्रेन भी बंद है....यह वाकई ऐतिहासिक है क्योकि आज से पहले ऐसा कभी नहीं हुआ। जो बसें, ट्रेन कभी ढ़ंग से साफ नहीं हुई होंगी आज उन्हे पूरा सैनिटाईज किया जा रहा है । क्या आपको नहीं लगता ये सब युद्ध स्तर की तैयारियां है ....हाथ जोड़ गुजारिश है इन सब को व्यर्थ न जाने दे। 
      कोरोना के क्या आंकड़े है और चीन इटली की क्या हालत है ये हम सब को पता है....निसंदेह ये डराने वाली बात है...पर अगर खौफ खाकर भी हम अंदर बने रहते है तो हम समझदार है। कृपया इस महामारी की भयावहता को समझे। चलो मान लिया इम्युनिटी आपकी अच्छी है आपको कुछ नहीं होगा, पर बाहर निकलकर हम कोरोना के कैरियर बन सकते है, ये हमे तकलीफ नहीं देगा पर हम इसको फैलाने में सहायक हो जायेंगे। हमे सिर्फ हमारे परिवार के साथ हमारे घरों में बैठना है, वो भी दो हफ्ते ...बस। उसके बाद स्थिति नियंत्रण में आ जायेगी। आप स्वछंद घूम सकेंगे। आप सोचिये उन माता पिता के बारें में जिनके बच्चें महामारी त्रस्त देशों में नौकरी कर रहे है या अपने परिवार के साथ वहाँ है या जिनके बच्चे वहाँ पढ़ रहे है । उनकी मनोदशा कैसी होगी ? न जाने कब से कितने दिनों से वो लोग अपने घरों में बंद है अपने परिवार से कोसो दूर । हम अपने देश में है ...पर्याप्त खाना पीना हमारे पास है, बस...दो हफ्ते खूद से, अपने परिवार से जुड़ जाईये । 
बिल गैट्स को जानते है ना आप सब , वो साल में दो बार एक एक हफ्ते जंगल में एक छोटे से कोटेज में गुजार कर आते थे और वे उसे 'थिंक वीक' बोलते थे तो बस कुछ इसी स्टाईल से आप भी अपने दो हफ्तों को कुछ नया सा नाम दे सकते है, क्योकि बिल गेट्स से व्यस्त व्यक्तित्व तो आप हो नहीं सकते तो चिल्ल करके घर पर बैठे ।  
     हमारे तो भगवान जगन्नाथ भी 15 दिन का एकांत वास लेते है साल में एक बार । मान्यता है कि वो बीमार होते है और ठीक होने की इस अवधि तक मंदिर बंद रहता है....कहानी बहुत वायरल हो रखी है, शायद आप सबने पढ़ी भी होगी। इसे बताने का औचित्य सिर्फ यही है कि प्रयास, सावधानी, सतर्कता या सख्ती सब हमे रखनी होगी । 
     आप रखेंगे न ?