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पापी पेट

उसे डर नहीं उस 
सुक्ष्मजीवी का
जिससे डरकर पूरी दुनिया
चार दीवारी में कैद है
उसे नहीं पता कि संक्रमण कैसे होता है
उसकी आँखें चिंताग्रस्त है
होठ सूख गये है
चेहरा जैसे सुखाग्रस्त क्षेत्र हो
उसके मासूम बच्चे 
अब भी खिलखिलाते है
लेकिन
उसके कान जैसे बहरे हो गये हो
वो बेबस इतना है कि
बगावत नहीं कर सकता
वो समाज का वो तबका है
जो इन दिनों 
अपने आधार को लेकर असमंजस में है
वो मजदूर वर्ग है
जो मातम में है
उसे फिक्र है
अपनी नवविवाहिता की 
जिसे कितने सपने दिखाकर 
वो अपने साथ लाया था
उसे फिक्र है 
अपने बच्चे की ,
जिसका मुडंन होना अभी बाकी है
उसे फिक्र है अपनी माँ की
जो घर में उसकी चिंता में बीमार है
उसे फिक्र है अपने पिता की
जिन्हे वो जिम्मेदारी से मुक्त कर आया था
उसे फिक्र है पापी पेट की
जो तीनों वक्त खाना मांगता है
उसे वक्त नहीं है 
उस सुक्ष्मजीवी के बारे में सोचने का
उसे वक्त नहीं है राजनीति करने का
उसे वक्त नहीं है 
बेघर रहकर इंतजार करने का
ना उसे भूत का ख्याल है
ना भविष्य से कोई आशा
उसे इतना पता है 
कुछ बड़ी अनहोनी हो सकती है
उसके पहले वो अपनों के पास
जाना चाहता है
वो बताना चाहता है 
सभी घरों में रहने वालों को
कि उसका भी एक घर है 
जहाँ वो लौटना चाहता है
उसे तो यह भी नहीं पता
कि उसका यह पलायन 
उसके लिये भी खतरा है
वो मरने से भी नहीं डरता
बस,वो अपने घर लौटना चाहता है


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