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आईना

जीवन की राह में चलते हुए
अचानक दिख जाता है एक आईना
एक वजूद के रुप में
असमंजस होता है
हुबहू कोई हम जैसा भी होता है
अजनबी होता है,लेकिन
दिल की गहराइयों में
स्थापित हो जाता है अनायास ही
जूड़ जाता है एक ऐसा रिश्ता
जिसका कोई नाम नहीं
बेनाम सा ये रिश्ता
आत्मा को एक छोर से बाँध देता है
लेकिन फिर भी
छूट जाता है एक दिन वो वजूद
और , उस दिन से हम भूल जाते है
आईना देखना....बस,
ताउम्र उस छोर की गिरफ्त में
खूद को निहारते रहते है ।

टिप्पणियाँ

yashoda Agrawal ने कहा…
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार जून 16, 2019 को साझा की गई है......... एक ही ब्लॉग से...मेरे मन का एक कोना आप भी आइएगा....धन्यवाद!
आत्ममुग्धा ने कहा…
ह्रदयतल से आभार
मन की वीणा ने कहा…
छूट जाता है एक दिन वो वजूद
और , उस दिन से हम भूल जाते है
आईना देखना....बस,
ताउम्र उस छोर की गिरफ्त में
खूद को निहारते रहते है ।

आत्म मुग्ध करती काव्य धारा।
आत्ममुग्धा ने कहा…
सराहना के लिये आभारी हूँ
आत्ममुग्धा ने कहा…
आपका बेहद शुक्रिया यहाँ आकर मेरी लेखनी का मनोबल बढ़ाने के लिये
रेणु ने कहा…
जी आत्ममुग्धा जी -- यदि किसी को ये 'हुबहू ' कोई अपने जैसा मिल जये तो उससे खुशनसीब कौन ? बेनाम रिहते सचमुच आत्मा से बंध सारी उम्र साथ निभाने में सक्षम होते हैं | बहुत ही भावपूर्ण सृजन के लिए आपको हार्दिक शुभकामनाएं और आभार सखी |

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