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अध्यात्म

तुम देह को भोग कर आना
अपना सारा इश्क़ करके आना
जब बातों से जी भर जाये
तब आना
तुम तब आना
जब सूरज अस्त होते होते
थोड़ा सा बचा हो
सिंदूरी आसमाँ रात की अगवाई में सजा हो
पंछी अपने घरों को लौट रहे हो
तुम भी लौटना वैसे ही
लेकिन पूरी तरह रिक्त होकर आना
तभी तो भर पाओगे मुझको खुद में
मुझे तुम्हारा इंतजार रहेगा
अंतिम सूरज के अंतिम टुकड़े तक
तुम अपनी धूरी पर घुमना
मैं घुमता रहूँगा अपनी पर
और एक वक्त आयेगा
तब कंपन होगा, स्पंदन होगा
छू जायेंगे एक दूजे को फिर से हम
लेकिन बस....
कोई इच्छा शेष मत लाना
तुम जी भर के जीकर आना
सिर्फ मुझसे एकाकार होने आना 

टिप्पणियाँ

Prachi Digital Publication ने कहा…
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yashoda Agrawal ने कहा…
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार जून 16, 2019 को साझा की गई है......... एक ही ब्लॉग से...मेरे मन का एक कोना परआप भी आइएगा....धन्यवाद!
आत्ममुग्धा ने कहा…
आपके आभार को व्यक्त करने मेरे पास शब्द नहीं यशोदाजी 🙏
मन की वीणा ने कहा…
असाधारण अनुपम।

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