जीवन की राह में चलते हुए
अचानक दिख जाता है एक आईना
एक वजूद के रुप में
असमंजस होता है
हुबहू कोई हम जैसा भी होता है
अजनबी होता है,लेकिन
दिल की गहराइयों में
स्थापित हो जाता है अनायास ही
जूड़ जाता है एक ऐसा रिश्ता
जिसका कोई नाम नहीं
बेनाम सा ये रिश्ता
आत्मा को एक छोर से बाँध देता है
लेकिन फिर भी
छूट जाता है एक दिन वो वजूद
और , उस दिन से हम भूल जाते है
आईना देखना....बस,
ताउम्र उस छोर की गिरफ्त में
खूद को निहारते रहते है ।
पिता चिनार के पेड़ की तरह होते है, विशाल....निर्भीक....अडिग समय के साथ ढलते हैं , बदलते हैं , गिरते हैं पुनः उठ उठकर जीना सिखाते हैं , न जाने, ख़ुद कितने पतझड़ देखते हैं फिर भी बसंत गोद में गिरा जाते हैं, बताते हैं ,कि पतझड़ को आना होता है सब पत्तों को गिर जाना होता है, सूखा पत्ता गिरेगा ,तभी तो नया पत्ता खिलेगा, समय की गति को तुम मान देना, लेकिन जब बसंत आये तो उसमे भी मत रम जाना क्योकि बसंत भी हमेशा न रहेगा बस यूँ ही पतझड़ और बसंत को जीते हुए, हम सब को सीख देते हुए अडिग रहते हैं हमेशा चिनार और पिता
टिप्पणियाँ
और , उस दिन से हम भूल जाते है
आईना देखना....बस,
ताउम्र उस छोर की गिरफ्त में
खूद को निहारते रहते है ।
आत्म मुग्ध करती काव्य धारा।