कोई कह रहा युद्ध ही विकल्प
तो कोई शांति अख्तियार करने बोल रहा
कोई 370 की बात कर रहा
तो कोई सियासी रोटी सेंक रहा
न जाने क्यो भाव भी उठ रहे
हवा देखकर ??
नहीं पता..क्या सही,क्या गलत
लेकिन एक माँ की आँखों में
आक्रोश क्या गलत है ?
सही है रंग बिरंगी चूड़ियों का टूटना ?
सही है बच्चों का बिलखना ?
सही है किसी का जीवन भर इंतजार?
सही है जवानों का बेमौत मारा जाना ?
पता नहीं.....
बद से बदतर है हम
एक दुसरे के भावों को ही गलत ठहरा रहे
दुखी सब है.....पर उसमे भी गहराई तलाश रहे
मैं बस इतना जानती
सबसे गहरा दुख उसका
जिसने खोया अपना......
उसमे विकल्प मत तलाशो
उसके लिये तो सब गलत ही गलत है
पिता चिनार के पेड़ की तरह होते है, विशाल....निर्भीक....अडिग समय के साथ ढलते हैं , बदलते हैं , गिरते हैं पुनः उठ उठकर जीना सिखाते हैं , न जाने, ख़ुद कितने पतझड़ देखते हैं फिर भी बसंत गोद में गिरा जाते हैं, बताते हैं ,कि पतझड़ को आना होता है सब पत्तों को गिर जाना होता है, सूखा पत्ता गिरेगा ,तभी तो नया पत्ता खिलेगा, समय की गति को तुम मान देना, लेकिन जब बसंत आये तो उसमे भी मत रम जाना क्योकि बसंत भी हमेशा न रहेगा बस यूँ ही पतझड़ और बसंत को जीते हुए, हम सब को सीख देते हुए अडिग रहते हैं हमेशा चिनार और पिता
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