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                   शुभ प्रभात 

बिटिया की जिद के चलते घर में फिर से एक नन्हे से जीव का प्रवेश हुआ है और पिछले दो दिनों से घर की धुरी मैं नहीं बल्कि कछुआ प्रजाति का यह नन्हा सा जीव बना हुआ है .इसे देखते ही सबसे पहले बचपन की वो कहानी याद आती है जिसे हमने ना जाने कितनी बार वार्षिक परीक्षा की उत्तर-पुस्तिका में लिखा था .......बचपन की वो बार-बार दोहराई हुई कहानी आज भी शायद हम सबके स्मृति-पटल पर अक्षरश: अंकित है. लेकिन आज भी इस कछुए को देखकर यही लगता है कि क्या वाकई इस धीमी चाल के कछुए ने फुर्तीले खरगोश को हरा दिया था या फिर ये हमारे पूर्वजो द्वारा गढ़ी गई एक कहानी मात्र है, बालमन को प्रेरित करने की.......हम तो इस कहानी से प्रेरणा ले लिया करते थे ,लेकिन आज मन में एक सवाल उठता है ,क्या आज की पीढ़ी के बच्चे ऐसी कहानियों से प्रेरित होते है ?
                      खैर.........................बेटी (शगुन) बहुत खुश है ,कभी उसे खाना देती है, कभी नहलाती है,दिन में दो बार उसका पानी बदलती है, कभी हथेली पर लेकर उसे सहलाती है और जब वो उसे फर्श पर छोड़ती है तो ये नन्हा जीव घबरा कर अपने-आप को खोल में समेट लेता है और जब उसे यह निश्चित हो जाता है कि आस-पास कोई नहीं है तो सिर और पैर खोल से बाहर निकाल कर धीमे-धीमे चलने लगता है .......इसे ऐसे चलता देखकर मुझे कबीर की ये पंक्तियाँ बरबस ही याद आ जाती है 
                              " धीरे धीरे रे मना ,धीरे सब कुछ होय
                                माली सींचे सौ घड़ा ऋतू आये फल होय "
      ....................बात सिर्फ धीरे-धीरे चलने की नहीं है ,बात है गतिशीलता की ,गंतव्य स्थान तक पहुँचने की.


     सच, यह नन्हा जीव मुझे कितना कुछ सिखा  रहा है,शायद इसीलिए लोग पालतू पशु-पक्षी रखते है ताकि उनसे कुछ सीख सके......जब वह अपने खोल में घुसता है तो लगता है कि जिंदगी का पाठ पढ़ा रहा है कि जब तुम्हारे आस-पास के वातावरण में नकारात्मक उर्जा का प्रभाव हो तो अपने-आप को समेट लेना चाहिए ताकि नकारात्मकता हमें नुकसान नहीं पहुंचा सके और जैसे ही मौका मिले,सकारात्मक माहौल मिले हमे आगे बढ़ना चाहिए ,धीरे ही सही लेकिन कदम बढ़ाना चाहिए .
                                

टिप्पणियाँ

बेनामी ने कहा…
खरगोश का संगीत राग रागेश्री पर आधारित है
जो कि खमाज थाट का सांध्यकालीन राग
है, स्वरों में कोमल निशाद और
बाकी स्वर शुद्ध लगते हैं,
पंचम इसमें वर्जित है,
पर हमने इसमें अंत में पंचम का प्रयोग भी किया है, जिससे इसमें
राग बागेश्री भी झलकता है.

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हमारी फिल्म का संगीत वेद नायेर
ने दिया है... वेद जी को अपने संगीत कि प्रेरणा जंगल में चिड़ियों
कि चहचाहट से मिलती है.

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