शनिवार, 22 दिसंबर 2012

मैं जीना चाहती हूँ

जीने दो मुझे इंसान की तरह 
क्योकि 
कहते हो अन्नपुर्णा 
और नोचते हो बोटी-बोटी 
दुर्गा कहकर सर नमाते हो 
और दुसरे ही पल 
एक राह चलती दुर्गा को 
पावँ तले रौंदते हो 
महान तो बताते हो 
लेकिन इंसान बनकर जीने नहीं देते हो 
तुम्हारे हौसलें है बुलंद 
क्योकि सदियों से तुमने लूटा है हमारा तन मन 
कभी द्रौपदी को छला 
तो कभी सीता की ली अग्निपरीक्षा 
राधा को तो तुमने कही का ना छोड़ा 
जीवन भर प्यासी प्रेयसी बनाकर 
दिल उसका तोडा 
लेकिन ;
फिर से चली चाल,बहलाया ,फुसलाया 
कृष्ण से पहले राधा का नाम लगाया 
लेकिन सोचा है कभी 
अरे! सोलह हजार रानियों में 
एक भी राधा का नाम क्यों ना आया 
फिर भी तुम देव हो 
क्योकि तुम एक मर्द हो 
यही तो होता आया है सदियों से 
छला गया हमेशा छल-प्रपंच से 
ना जाने क्यों 
तुम्हारा मन तुम्हे नहीं धिक्कारता 
करते हो ऐसे कुकर्म 
कि माँ के दूध को भी आती है तुम पर शर्म 
नारी हूँ मैं नीर नहीं 
कि सिर्फ बहना ही जिसका काम है 
मुझे महान मत बनाओ 
इज्जत दो अपनी नज़रों में थोड़ी 
इंसान हूँ, इंसान की तरह रहने दो 
देवी ना बनाओ 
खौलता है खून मेरा,कापतीं है रूह 
तार-तार शरीर से रिसता है खून 
छलनी हुए दिल से छन गई सारी भावनाएं 
मेरे पीर को तुम कभी समझ ना पाए 
लेकिन अब ;
जीना है मुझे बिना किसी सहारे 
उड़ना है आसमां में पंख पसारे 
बहुत देखा तुम मर्दों को 
अब नहीं सहना तुम्हारी शर्तों को 
क्यों वो पहने , जो तुम चाहो 
क्यों उठे ,बैठे और चले तुम्हारे हिसाब से 
और क्यों सहे तुम्हारी बंदिशों को
अब ; 
नहीं चाह तुम्हारे साथ की 
तुम्हारे समकक्ष ही नहीं 
तुम्हारे वजूद और तुम्हारे अक्स से 
ऊपर है मुझे जाना 
जो चाहुगी अब वो है मुझे पाना  
क्योकि ; 
जीना है मुझे एक इंसान की तरह 

शुक्रवार, 2 नवंबर 2012

चाँद चौथ का

सहेज के रखी , अपनी ब्याह की चुनडी 
आज फिर से मैं निकाल लाई 
सात फेरों के सातों वचन 
याद करने की रुत फिर से आई 
तेरे हाथों से सजे मांग मेरी 
एक बार फिर , फेरों की वह बात याद आई 
ललाट पर कुमकुम , मांग में तारे 
जैसे आँगन में मेरे 
झूमते हो चाँद-सितारे 
मेहंदी से रची हथेली, चूड़ियों से भरी कलाई 
माथे पे सजा सिन्दूर , गालों  पे आई ललाई 
कर-कर के श्रृंगार मैं मुसकाई 
देख के दर्पण , खुद से ही शरमाई 
यह जादू है आज के दिन का 
सज-सज के सजना के लिए 
एक प्रोढ़ा भी दुल्हन सी जगमगाई 
यौवना हो या प्रोढ़ा
रूप तो आज सबपे है टुटा 
करके श्रृंगार देखेगे चाँद से झरता प्यार 
यह जादू है आज के दिन का 
बिखेरेगा प्यार .....देगा दीदार 
झूम के निकलेगा चाँद .......हाँ .................चाँद करवा चौथ का !
करवा चौथ की हार्दिक बधाइयाँ 
  

बुधवार, 1 अगस्त 2012

सूपर मोम

सूपर मोम.......यह शब्द पिछले कुछ वर्षों से महिलाओं से जुड़े शब्दों में प्रमुख रूप से उभरकर आया शब्द है .आखिर कौन है सुपर मोम ?.......यह माँ का वो आधुनिक रूप है जिसकी कल्पना हमारी दादी-नानी ने तो कदापि नहीं की थी .इस सुपर मोम की जिंदगी सुबह पांच बजे से शुरू होकर रात के ग्यारह बजे भी थमने का नाम नहीं लेती .यह सुपर मोम आधुनिक समाज की वो नारी है जो हर जगह अपनी सक्रीय भूमिका निभाती है , अब उसका कार्यक्षेत्र सिर्फ रसोईघर ही नहीं रहा बल्कि हर क्षेत्र में वह अपनी दमदार दावेदारी रखती है .वह घर की धूरी है , ऑफिस में powerful कॉरपोरेट women है , सिर्फ पति और बच्चों को ही समय नहीं देती , खुद के लिए भी समय निकालती है , पार्लर और स्पा में जाती है ,किट्टी पार्टी एन्जॉय करती है , डिस्को में थिरकती है , रसोईघर में लैपटॉप पर अंगुलियाँ चलाते हुए मिनटों में microwave में खाना बना लेती है बिना धुएँ , चूल्हे और चौके के और भी ना जाने ऐसी कितनी अनगिनत चीजे है जो ये सुपर मोम पलक झपकते ही कर लेती है और सबसे बड़ी बात कि इस सुपर मोम से सब खुश है , पति इसकी कोई बात नहीं काटता, बच्चें mother's day पर कार्ड देते है और बेस्ट सुपर मोम से नवाजते है
                                                       अब हम थोडा।........नहीं ...थोडा ज्यादा पीछे चलते है , चलते है दादी-नानी के ज़माने में . वे सुबह पांच बजे उठती थी और रात के नौ-दस बजे तक चक्करघिन्नी सी घुमती रहती थी . पति के साथ कंधा मिलाना तो दूर दिन के उजाले में रूबरू बात करना तक नसीब नहीं होता था,धूआँ ,चूल्हा-चौका ही उनकी जिंदगी थी , बच्चों की तरफ से उन्हें कोई उपाधि नहीं दी जाती थी , श्रृंगार के नाम पर नई  साड़ी और मेहँदी ही काफी थी , उनके जीवन का एक ही ध्येय था अपने घर को संजो के रखना ................आश्चर्य है कि यही ध्येय हमारी सुपर मोम का भी है ......तो क्या साड़ी से जींस तक के सफ़र में कुछ भी नहीं बदला ?
       हमारी दादी-नानी घूँघट में सिसकती भी थी तो किसी को आहट  ना होती थी ऐसे में समाजसुधारकों ने आवाज़ उठाई
               'अबला जीवन हाय!तेरी यही कहानी
              आँचल में है दूध आँखों में पानी '
   ऐसी बातों को सुन हमारी माँ बदली , हम भी बदले और माँ,माँ से सुपर मोम बन गई
      .............................लेकिन ना जाने क्यों ,मुझे कभी-कभी लगता है कि हमारी सुपर मोम को छला जा रहा है , आगे बढती हुई नारी को सुपर मोम का तगमा देना पुरुष प्रधान समाज की चालाकी तो नहीं ?
   वो दादी-नानी के जैसे ही चक्करघिन्नी हो गई है.वो माँ घूँघट में पिसती थी और आज की माँ सुपर मोम की आड़ में , उसे थकने थमने का समय नहीं क्योकि वो सुपर मोम है, वो बीमार नहीं हो सकती क्योकि उसपर कई जिम्मेदारियों का बोझ है , वो multivitamins लेती है क्योकि उसके खाना खाने का कोई वक़्त नहीं , बच्चे को जन्म देने के तीसरे ही दिन वो ड्यूटी ज्वाइन कर लेती है क्योकि वो सुपर मोम है . 35 की परिपक्व उम्र में जब वो माँ बनकर बच्चे को जन्म देती है , तो रात में बच्चे की किलकारियाँ उसके मातृत्व सुख को नहीं बढाती बल्कि नींद की भरपूर कमी उसकी चिडचिडाहट जरुर बढ़ा  देती है ......एकल परिवारों की यह अकेली नारी फिर भी नहीं थकती और लगातार आगे बढती जा रही है .....ऐसी सुपर मोम को मेरा सलाम
     फिर भी इतना जरुर कहूँगी
       सुपर मोम क्या यही है तेरी कहानी
     कहाँ है आँचल का दूध
        और कहाँ गई तेरी आँखों की रवानी  

गुरुवार, 5 जुलाई 2012

कोरा कागज

कुछ खास नहीं
आज लिखने को 
तो सोचा 
चलो समय के कागज पर 
कलम को अपनेआप ही चलने दूं 
अपनी ही लेखनी को एक नया आयाम दूँ 
दिल और दिमाग  पर छाये शब्दों को 
अस्त-व्यस्त ही सही 
लेकिन बहने दूं 
शायद कविता ना बन पाए 
शायद अक्षर मोती से ना  सज पाए 
लेकिन 
चलने दूं 
लेखनी को 
अपनी ही रफ़्तार में 
लिखने दूं 
कुछ शब्द अपनी ही जिंदगी की किताब के 
लेकिन ये क्या ?
कुछ कडवे पर सच्चे शब्द 
उड़ गए वक़्त की आंधी में , किसी पाबंदी में 
निकले थे जो दिमाग  के रस्ते से 
और कुछ भावुक शब्द 
पिघल गए अपनी ही गरमी से 
धुल गए आंसुओं से 
जो निकले थे सीधे दिल से 
और................................
मेरी लेखनी को आयाम नहीं 
सिर्फ विराम मिला 
और मेरा कागज जो कोरा था 
कोरा ही रह गया 

मंगलवार, 5 जून 2012

गाँव

लम्बे अंतराल के बाद आज यहाँ आना हुआ है ....पिछले कुछ दिन काफी व्यस्तता वाले रहे ....गया पखवाडा मैंने राजस्थान में बिताया .....हमेशा की तरह लू के थपेड़े लेकिन फिर भी आनंद की अनुभूति.....बहुत सारे मेहमानों की मेहमान-नवाजी का सौभाग्य प्राप्त हुआ और सब सकुशल संपन हुआ....हर बार की तरह इस बार भी मेरी किताब में एक और पृष्ठ जुड़ गया और इस बार इसमें सिर्फ मीठी यादें है 


ना पनघट है ना घूँघट है और ना ही बरगद की छावं 
फिर भी अच्छा लगता मुझे मेरा गाँव 
बढ़ा  रहा हाथ दोस्ती का शहर से 
चला जा रहा सड़क की ओर पगडंडी की डगर से 
ऐसे ही अपने गाँव में बिता आये कुछ पल फुर्सत के 
भागते से लम्हों में कुछ पल सुस्ताई 
मशीनी युग में रेंगती सी जिंदगी देख मैं हरषाई 
यहाँ तो कहते है 
नाइन-महरिन को भी चाची और ताई 
बड़ों ने बिछाई बाज़ी ताश के पत्तों की 
खुशियों के ओवर में लगे चौक्के-छक्के ठहाको के 
यहाँ ;
अपनेपन की चारदीवारी में 
बंटवारे होते सुख-दुःख के 
महफ़िल सजी शामियानों में 
जागरण हुआ एकादशी का तारों की छावं में 
आधी रात को सोरठ की राग गूंजी मेरे गाँव में 
मेहमाननवाज़ी में ज्यादा वक्त ना मिला 
लेकिन फिर भी लगा 
जैसे बिखरी है खुशियाँ मेरे ही पास में 
याद हमेशा रहेगा 
छत पे बिस्तर का बिछाना 
तारों की छावं तले  सोकर उन्हें निहारना 
हिरनी सा दौड़ता मन , कुंचाले भरता इधर-उधर 
ढूंढ लाता था चंचल मन खुशियाँ जो बिखरी थी इधर-उधर 
याद रहेगा 
मोर की पिहू-पिहू से आँख का खुलना 
और घर के पिछवाड़े मोरनी को नाचते देखना 
सुबह-सुबह जल्दी से सूरज का उगना 
भरी दोपहरी में बत्ती का जाना 
अच्छा लगता था उसमे शरबत का भाना 
तपे जेठ में भी सुख था वहा 
ऐसा मंगल-शहनाई सा गाँव का घर 
जहा पसरे थे पल, चैन-शांति वाले 
मिठास घोलते थे भरे दही के प्याले 
बैचैन होकर लोग करते थे गर्मी की बाते 
लेकिन मुझे तो 
अच्छे लगते थे वो लम्बे से दिन और छोटी सी राते 
खरबूजे,तरबूज,ककड़ी और आम का खाना 
याद रहेगा वो पल गाँव का 
कोल्ड ड्रिंक , कॉफ़ी के कड़वेपन के बीच 
महक उठा स्वाद छाछ का ................................................:)

रविवार, 6 मई 2012

'सत्यमेव जयते'



कल आमिर खान prodction के 'सत्यमेव जयते' का पहला एपिसोड देखा ,देखकर भीग गया मन. पिछले पांच-छ: सालों से टीवी की दुनियां में रिअलिटी शो की झड़ी सी लगी है, उन सबमे से सत्यमेव जयते वाकई कुछ रियल सा लगा. हकीकत,जिसे हम सभी जानते है, उसी के कुछ अनछुए पहलु और मुद्दों को मद्देनज़र करता है यह शो.
आमिर खान हमेशा से ही कुछ अलग करते आये है और इस बार वे छोटे परदे पर भी सफल हुए है,वे सही कहते है कि दिल पे लगेगी तभी बात बनेगी.उन्होंने सीधे दिल पे चोट की है इस शो के माध्यम से. रविवार की सुबह जब नाश्ते और खाने की जगह सिर्फ brunch ही होता है, समय निकालना थोडा मुश्किल होता है लेकिन मैंने निकाला और वो भी पूरा एक घंटा.
पहले एपिसोड का मुद्दा था 'कन्या भ्रूण हत्या'. शो की शुरुआत में ही आँखे नम होने लगी,लड़की को जन्म देने की वजह से पीड़ा झेल रही महिलाओ से रूबरू करवाया गया,उनकी व्यथा इतनी तीव्र थी कि शब्द लड़खड़ा रहे थे,आँखे ही नहीं गला भी भर रहा था,आमिर की आँखों में भी कुछ पिघलता हुआ सा महसूस हुआ....दर्शक-दीर्घा में बैठे लोग भी निशब्द थे....सबके दिलों पे जो लगी थी,लेकिन शो ख़त्म होते-होते आमिर खान ने लोगो में एक जज्बा सा पैदा कर दिया कि हमे ही कुछ करना होगा क्योकि उनके शब्दों में हम ही तो है जादू कि छड़ी.
आमतौर पर सब यही सोचते है कि कन्या भ्रूण हत्या वो गरीब महिलाए करवाती है जो बेटी के विवाह का बोझ वहन नहीं कर पाती,या फिर वो महिलाए जो शिक्षित नहीं है,या फिर वो रुढ़िवादी महिलाए जिन्हें परिवार का वंश चलाने के लिए वारिस चाहिए,लेकिन इस शो ने हमारी सोच बदल दी हमे पता चला कि कन्या भ्रूण हत्या सिर्फ और सिर्फ संकीर्ण मानसिकता वाले लोग ही करवाते है फिर भले ही वे उच्च शिक्षित हो,उच्च वर्गीय हो या आधुनिक हो. बल्कि एक और सच सामने आया कि अशिक्षित और निम्न वर्ग को तो कोई चिंता ही नहीं है कि भ्रूण लड़के का है या लड़की का. आमिर के साथ मेरा भी सलाम उस भारती को जो अपनी गोद में अपनी नन्ही सी बेटी को उठाये मुस्कुरा कर कह रही है कि जो भगवान् देगा ख़ुशी से लेंगे.एक डॉक्टर ने भी कहा कि आदिवासी लोग कभी नहीं पूछते कि गर्भ में पल रहे बच्चे का सेक्स क्या है बल्कि जन्मोत्सव मनाते है चाहे लड़का पैदा हो या लड़की
हमने हमेशा विज्ञान का अधिकतर गलत उपयोग ही किया है.भूर्ण गिरना उन परिस्थितियों में सही है जब बच्चे का शारीरिक विकास सही नहीं हो रहा हो,उसके शरीर में कोई त्रुटी हो ,इन विषम परिस्थितियों में बच्चे को इस दुनिया में ना लाने का फैसला माँ-बाप और बच्चे दोनों के लिए जायज होता है,लेकिन भ्रूण लड़की है,सिर्फ इसीलिए उसे इस दुनिया में आ आने देना एक जघन्य अपराध है और मुझे आश्चर्य है कि शायद ६०%मामलों में माँ की सहमती भी होती है.आमिर के शो पर आई महिलाओं ने विद्रोह किया और अपनी बेटियों को जन्म दिया,मैं नतमस्तक हु उन माओं के आगे.
कुल मिलाकर परिस्थितिया यही दिखाती है कि वंश चलाना लोगो कि प्राथमिकता है इसलिए उन्हें बेटा चाहिए,लेकिन इसके अलावा कही कुछ और भी है जो लोगो को शायद इस राह पर लेकर जा रहा है.
थोड़े दिन पहले एक खबर पढ़ी थी जिसमे एक वहशी पिता ने अपनी ही नाबालिग बेटी से कई महीनों तक बलात्कार किया और बेटी ,पिता के इस घिनौने कार्य से अपने ही पिता की संतान की माँ बन गई .....मेरी रूह काँप गई यह पढ़कर और ना जाने क्यों मैं यह सोच बैठी कि काश वो बेटी पैदा ही नहीं हुई होती.पुरे दिन मेरे दिमाक में यही प्रश्न कौंधता रहा कि दोनों बच्चियों का क्या कसूर? पिता के नाम पर दरिन्दे ने इंसानियत का ही क़त्ल कर दिया.नवजात बच्ची किस रूप में आई,किन रिश्तों को लेकर आई उसकी तो पूरी जिंदगी ही प्रश्न चिन्ह बन गई
शायद मेरी सोच गलत हो , शायद आप लोग मुझसे सहमत ना हो लेकिन जब बेटियों की सुरक्षा की कोई गारंटी ना हो तभी कोई माँ साथ देती है एक डॉक्टर का, पती का और सास का अपना बच्चा गिराने के लिए.जब तक समाज में ऐसे दरिन्दे घूम रहे है हमारी माँ ही नहीं बल्कि कन्या भ्रूण भी डर रहा है इस दुनिया में दस्तक देने को.............नन्ही कलियों को लाने से पहले हमे हमारी बगिया को महकाना पड़ेगा क्योकि
" बरबाद गुलिस्ता करने को
एक ही उल्लू काफी था


अब हाल-ए-गुलिस्तां क्या होगा
हर शाख पे उल्लू बैठा है "

सोमवार, 23 अप्रैल 2012

नासूर

बात कुछ दिन पहले की है 
चोट लगी थी हाथ पर 
हलकी सी चोट थी 
इसलिए मैं मौन थी 
ना दर्द था, ना दर्द का अहसास 
कुछ दिन बाद 
फिर चोट लगी 
उसी स्थान पर 
थोड़े समय दर्द हुआ 
मैं मुस्कुराकर रह गई 
बात आई-गई हुई 
मैं अपने कामो में व्यस्त हुई 
अचानक ;

एक दिन फिर वही दुखती नस 
पुनः दबाव में आई 
इस बार हलकी सी आह भी बाहर आई 
मैंने भुलाने की कोशिश की 
लेकिन इस बार 
दर्द कुछ ज्यादा था 
शायद मेरी सहनशक्ति की परीक्षा थी 
जीवन की प्राथमिकताओ की समीक्षा थी 
थोडा समय लगा दर्द भुलाने में 
अपनों के घावों को 
सहलाते-सहलाते 
मरहम लगाते , अपने ही घाव की सुध-बुध ना रही 
शायद इसीलिए 
कल बिना चोट के ही 
दुखने लगा हाथ, नसें बुदबुदाने लगी 
रक्त दर्द से उबाल खाने लगा 
देखा , तो हाथ में नासूर बन चूका था 
चुक गई मैं, भूल गई मैं 
चोट पे चोट सहती गई 
बेवजह यूं ही बहती गई 
पहली चोट पे संभली होती 
ना होता नासूर 
और ना मिलता दर्द बिना कसूर 

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

कुछ क्षणिकाए

 
 जलना 
आग में और इर्ष्या में 
कारण है विनाश का सर्वनाश का !
                 


                                    
    चुप्पी
 चटकाती है दिल 
रिश्ते मरते तिल-तिल  !




सूरज 
तुम्हारे नाम का 
मेरे ललाट पे सज 
मान बढाता तुम्हारा और मेरा भी !









मैं आहत होती हु 
अपनों के रूखे व्यवहार से नहीं 
बल्कि चाशनी में लिपटी उनकी बातों से !







   
         अपनों का साथ 
     है खुशियों का तडका
        दुखो की दाल में !

   




धुँआ धुँआ 
है जिंदगी 
जब जल रहे हो 
रिश्ते आस पास 

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

उषा आगमन

निशा ने पलके झपकाई ,
 उषा ने ली अंगडाई
चकोर ने गर्दन झुकाई ,
 उत्पल मुख मुस्कुराहट आई 
आदित्य अंशु ने बिखराई पाँखे
चंचल विहगों ने खोली आँखे 
पीपल के पत्तो पर पड़े हिमकण
रश्मि आभा पा हुए मोती विलक्षण 
पुलकित पुलकित हुआ मनु-पुत्र 
पाया जब उसने एक और नया विकल्प 
आदित्य ने फैलाया अनुपम आलोक 
स्वर्णिम स्वर्णिम लगे तब मन्दाकिनी तोय 
वाणी ने किया वीणा को झंकृत
 तब सरगम से हुई पृथ्वी अलंकृत 

सोमवार, 12 मार्च 2012

परीक्षा बनाम अग्निपरीक्षा

परीक्षा भवन में आज गहरा सन्नाटा था
रह रह कर मेरा दिल घबरा रहा था 
सुबह की घटनाओ को याद कर 
ना जाने क्यों आँखे भी फटी सी रह गई , जहा थी वही अचल सी मैं रह गई 
धडकनों की आवाज़ लगने लगी ऐसे 
नगाड़ो पर पड़ रहे हो हथोड़े जैसे 
एक सौ साठ प्रति मिनिट हो रही थी ह्रदय गति 
कुछ उपाय समझ ना आया , घूम गई मेरी मति 
कांप गई मैं पूरी की पूरी , हाथ पावँ थरथराने लगे 
सुबह के दृश्य चलचित्र की भांति मेरे सामने आने लगे 
सुबह सुबह गधा भी आज बांयें से गुजरा था 
निगोड़ी काली  बिल्ली ने भी रास्ता मेरे काटा था 
राशिफल भी कुछ अच्छा ना था , अनिष्ट के घटित होने का उसमे पक्का वादा था 
लेकिन फिर भी मै बड़ी बहादुरी से चली आई थी परीक्षा देने 
लेकिन अब ;
परीक्षा भवन के सन्नाटे से मेरा दिल घबरा रहा था 
अनिष्ट के घटित होने का ख्याल दिल में बार बार आ रहा था 
परचा मिलने में समय था अभी बाकी 
कि तभी मुझे याद आया , अरे !
आज सुबह तो आँख भी मेरी फड़की थी 
कोसने लगी मैं खुद को , किस बुरी घडी में मैंने घर से निकलने की  ठानी थी 
खैर , घडी ने साढे सात बजाए
पर्चे बांटने को सर परीक्षा भवन में आये 
मैं तेरहवे नंबर पर बैठी थी 
मन ही मन हनुमान चालीसा पढ़ रही थी 
कि अचानक ;
मेरी नजर मेरी बैंच पर लिखे अक्षर पर पड़ी 
मेरा मन जार जार रोने लगा 
बैंच पर लिखा था मेरा नंबर १३ 
शुभ अशुभ की दृष्टी से यह नंबर होता है अशुभ बड़ा 
इतना तो मुझे भी था पता 
आखिरकार सर मेरे करीब आये 
और ; मुझे परचा दिया 
माँ सरस्वती के स्मरण के साथ मैंने परचा देखा 
कि तभी ; 
परीक्षा भवन में हलचल हुई , सरसराहट हुई 
                       कोहराम मचा , कोलाहल हुआ 
प्रिन्सिपल रूम में आई 
पुछ्तात पर पता चला कि 
तेहरवे नंबर पर जो छात्रा बैठी थी 
परचा देखते ही बेहोश हो गई 

रविवार, 11 मार्च 2012

माँ हूँ तुम्हारी

एक कविता मेरे बेटे के नाम उसके जन्मदिन पर 
           चाहती हूँ मैं 
कि मेरी खुशियाँ तुम्हे लग जाये 
और , तुम्हारे दुखों को मैं अपना लू 
आँख में आये आंसू तुम्हारे 
तो अपनी पलकों में सहेज लू 
कही मिले ना आसरा तुझे 
तो अपने आँचल में समेट लू 
हंसो जब तुम 
तो तुम्हारी मुस्कुराहट को गले लगा लू 
जब ख़ुशी से चमके तुम्हारी आँखे 
तो उसे अपनी कामयाबी बना लू 
गलत राह भी ग़र चलो तुम 
तो वो राह भी तुम्हे चुनने ना दूँ 
क्योकि ;
माँ हूँ तुम्हारी 
चाहती हूँ तुम्हे परिपूर्ण देखना 

बुधवार, 7 मार्च 2012

माँ मुझे जन्म दो

माँ मुझे मत मारो
मैं तुम्हारा ही एक हिस्सा हु 
तुम्हारी कोख में पल रहा 
एक अधूरा ख्वाब हु मैं 
जिसे देख रही हो तुम पिछले तीन महीनों से
तुम चाहती हो वो कलाई 
जिस पर दीदी राखी बांधे
वो ललाट जिस पर दूज का टिका सजे 
और अब 
तुम्हारा मन विचलित है 
क्योकि तुम्हे मेरी पहचान हो गई है 
जब से तुम्हे मेरे बारे में पता चला है 
तुमने तैयारियां शुरू कर दी 
मुझे मार डालने की 
लेकिन माँ 
मेरा क्या कुसूर ?
तुम कहती हो 
पापा को वारिस चाहिए 
दादी को वंश बढ़ाना है 
लेकिन माँ 
ये तो बहाना है 
क्योकि प्रश्नचिन्ह तो तुम्हारे ही मन में है 
तुम खुद नहीं चाहती कि
मैं जन्म लू
माँ मुझे याद है 
जब तुम्हे पहली बार मेरा अहसास हुआ 
तुम बहुत खुश थी 
और मैं भी 
मैं जल्द से जल्द इस दुनियां में आना चाहती थी 
तुम्हारी गोद में समा जाना चाहती थी 
तुम्हारी मधुर आवाज़ 
कोमल स्पंदन
सब कुछ मुझे आनंदित कर देता था 
लेकिन धीरे-धीरे 
तुम्हारे ख्याल ख्वाब मुझे समझ आने लगे 
मैं नन्ही जान 
डर गई 
क्या होगा ?
जब तुम्हे मेरे अस्तित्व का पता चलेगा 
माँ, मेरा दम घुटने लगा तुम्हारे पेट में 
फंस गई मैं गर्भनाल की लपेट में 
अब तो मेरा दिल भी धड़कने लगा है 
मेरे नन्हे हाथ पावं आकार लेने लगे है 
माँ , मुझे आने दो 
मेरे रूप को देखकर तुम सब भूल जाओगी
मैं बेटा नहीं , तुम्हारा अभिमान बनुगी 
तुम विद्रोह करो माँ 
दादी से,पापा से,समाज से 
माँ तुम भी तो औरत हो 
फिर क्यों मुझे मारना चाहती हो 
क्यों शर्मिंदा करती हो 
अपनी ही कोख को 
लेकिन माँ 
अब मैंने भी फैसला कर लिया 
मैं कोई अभिशाप नहीं हु 
आउंगी तो सम्मान के साथ 
और जाउंगी तो अपनी मर्जी से 
तुम विद्रोह करो या ना करो 
लेकिन 
मैं करती हु विद्रोह 
तुम मुझे क्या गिराओगी 
मैं खुद जा रही हु तुम्हारी कोख छोड़कर 
मैं जा रही हु माँ 
हमेशा हमेशा के लिए ...........................................

मंगलवार, 6 मार्च 2012

आज होली है

आज होली है
सब रंगे एक ही रंग में
नकाब पे चढ़ गया एक और नकाब
पहले ही ना पहचाने जाते थे
अब तो पहचानना और मुश्किल हो गया
नकाबपोशों की इस दुनियां में
चलो चलते है
चुराते है कुछ रंग खुशियों के
और
सजाते है जिंदगी का इन्द्रधनुष
जला देते है होली
उन कडवी यादों की
जो गाती है दास्ताँ बेरंग से ज़ज्बातों की
चलो , चुराते है कुछ रंग
क्योकि , आज होली है
रंगों से भरी पिचकारी है
हर रंग में रंगी दुनिया सारी है
आज होली है 

शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

मन उदास है

  आज मन उदास है
  सब कुछ मेरे पास है
  कोई आरजू ना आस है
  जाने क्यों
  फिर भी मन उदास है
  शायद
  रूखे मौसम का तकाजा है
  या फिर
  बेरुखियों का तमाचा है
  भागे मन , दौड़े मन
  बंज़र रेगिस्तान में ये कैसी प्यास है 
  आज मन उदास है 
  खुशियाँ बिखरी आस-पास
  दुखों से मन मेरा अनजान
  बाहर है संगीत तो अन्दर निश्वास है
  जाने क्यों
  आज मन उदास है
  रोज सजते सपने जिन आँखों में
  आज टकटकी लगी वीरानो में
  अपनों का मेला है
सपनो का रेलम-पेला है
फिर भी मन मेरा अकेला है
क्या ये आने वाले वक़्त की
कुछ अनहोनी आहट है
या फिर
मन नहीं ,
आज का मौसम ही उदास है 

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

कोई नहीं चाहता

बिना आगाज़ के ही अंजाम चाहते है लोग
बिना प्रयास के ही सफलता पा लेना चाहते है लोग
जिंदगी की दौड़ में जीत चाहते है लोग
लेकिन जीत के लिए मेहनत
...........................................कोई नहीं चाहता
दूसरों की खुशियों को छीन लेना चाहते है लोग
लेकिन अपनी खुशियों को बांटना
...........................................कोई नहीं चाहता
सोने की तरह चमकना चाहते है लोग
लेकिन कुंदन की भांति आग में तपना
.........................................कोई नहीं चाहता
आसमां को बाँहों में लेना चाहते है लोग
लेकिन ज़मीं पर पैर जमाना
.........................................कोई नहीं चाहता
मंजिल तक पहुँच जाना चाहते है लोग
लेकिन संघर्षों का मुकाबला
.........................................कोई नहीं चाहता
सफलता पर बधाइयाँ देते है लोग
लेकिन दुःख में सांत्वना देना
.........................................कोई नहीं चाहता
दूसरों को बात बात पर टोकते है लोग
लेकिन अपनी स्वतंत्रता का हनन
.........................................कोई नहीं चाहता
अपने महलों में घी के दियें जलाते है लोग
लेकिन टूटे आशियाँ को तिनके देना
.........................................कोई नहीं चाहता
दूसरों पर कटाक्ष करते है लोग
लेकिन अपने गिरेबाँ में देखना
.........................................कोई नहीं चाहता
चाँद तारों को छूना चाहते है लोग
लेकिन परिस्थितियों से समझोते 
..........................................कोई नहीं चाहता 

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

एक और नन्हा सा प्रयास

शगुन के शब्दों ने इस बार मुझे वाकई खुश कर दिया .....सधे हुए शब्दों का सधा हुआ ताल-मेल .....अच्छी शुरुआत कर रही है मेरी बेटी ....मन खुश है 

  " भूल जाओ बीते पल 
     लेके आओ नई उमंग 
      सूर्य फिर से आएगा 
        लेकर उम्मीद की किरण 
          तब दिखा दो 
           तुम अपने रंग "
                                         शगुन 

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

क्या है आज़ादी

वो तो नन्हे की आँख का तारा है
जो हम सब को बेहद प्यारा है
वो तो है एक मीठी सी शहजादी
जिसे कहते है हम आज़ादी
कई जंजीरों ने इसे जकड़ा है
तो कही
आडम्बरों ने इसे पकड़ा है
यूँ तो आज़ाद है हम
लेकिन अपने ही बनाये बन्धनों में घूमते है सभी
बस पिंजरे में नहीं है
लेकिन बेड़ियों में बंधे है सभी
आज़ाद दिखने की होड़ में
खो बैठे आज़ादी
ना जाने जिंदगी के किस मोड़ में
आँखे बन गई सूखा तालाब
पथरीली हो गई गालों की ज़मीं
होठ सूख कर मुरझा गए
खो गई सबकी हसीं
क्या यही है आज़ादी
मायने नहीं समझे आज़ादी के
दायरे बढा दिए बरबादी के 
आज़ादी से आसमां में उड़ने की चाह 
चल पड़े सफलता की वो अनजानी राह 
ज़मीं भी छूटी आसमां भी छूटा 
पंख तो मिले पर पावँ कटा आये 
भुला बैठे नियामत खुदा की 
जरुरत थी तो बस थोडा सा मुस्कुराने की 
लेकिन हम फंस गए अपनी ही बनाई परिभाषाओ में 
कभी ढूंढते शब्दकोष में 
तो कभी संविधान की धाराओ में 
अब समझ पाई हु आज़ादी के सही मायने 
ग़र मिल जाए वो निश्छल हंसी 
तो तालाब भर जायेगे समंदर की तरह 
पथरीली ज़मीं हरी हो जाएगी 
गुलाब की पंखुड़ी 
फ़ैल जायेगी दोनों गालो तक 
बेल की तरह इठलाती 
हाँ ,यही तो है आज़ादी 

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

बात दो-चार दिन पहले की है ,सुबह जब नारियल के तेल की शीशी को हथेली पर उंडेला तो उसमे से तेल नहीं निकला ,मुझे आश्चर्य हुआ कि अभी हफ्ते भर पहले तो ख़रीदा ही था ,इतनी जल्दी ख़त्म कैसे हुआ ? लेकिन शीशी खाली नहीं थी ....थोडा दबाया तो कुछ निकलता हुआ सा महसूस हुआ ........'ये तो तेल ही है जो ठण्ड कि वजह से जम गया था .मेरा आश्चर्य अब एक सुखद अहसास में बदल गया क्योकि मुंबई के मौसम में और वो भी फरवरी के महीने में तेल का जमना आम बात नहीं है
              पुरे साल भर एक ही जैसे मौसम की मार सहने वाले हम मुम्बईकर तरसते है ऐसे मौसम को ...........इस बार की गुलाबी ठंड वाकई मौसमी मज़ा दे रही है .सुबह की धुप कुछ ज्यादा ही प्यारी लगने लगी है और जब सुबह की यह धुप मेरी खिड़की से लटकी कांच की लटकनो पर पड़ती है तो लगता है कि कई नन्हे सूरज मानो जैसे मेरी खिड़की पर आ गए हो , जब उनकी चमक परावर्तित होकर मेरे आँगन में बिखरती है तो उन पर चलने का मिठास मैं बयाँ नहीं कर सकती
       यहाँ ठिठुरन तो नहीं है लेकिन सिहरन जरुर है ,दांत तो नहीं बजते लेकिन कानो से ठंडी हवा का प्रवाह चाय की चुस्की मारने को उकसाता है ,हाथो में दस्ताने तो नहीं है लेकिन मैंने पावों में मौजे जरुर पहन लिए है ,रजाई ना सही लेकिन कम्बल की गर्माहट अब हमें भी सुहाती है ,बच्चे मुहं से भाप तो नहीं निकालते जैसा कि हम अपने बचपन में अकसर किया करते थे, हाँ लेकिन सुबह की पाली के स्कूली  बच्चे मैरून रंग की स्वेटर में जरुर दिखने लगे है ,अल-सुबह की नींद में सपने ज्यादा आने लगे है ,हाथ अलाव तो नहीं सेंक रहे लेकिन हाथों में किसी अपने का गर्माहट भरा हाथ सुहाने लगा है चाय की चुस्कियां मीठी ज्यादा लगने लगी है ,पकोड़ों ओर तरह-तरह के पराठों की महक पुरे घर में फैलने लगी है ,स्नानघर की खिड़की से आने वाली ठंडी हवा की सिरहन ने पुरे स्नानघर पर अपना कब्ज़ा जमा रखा है और स्वय को मेरे घर का सबसे ठंडा क्षेत्र घोषित कर रहा है .......स्नानघर की यह ठिठुरन मुझे लगातार मेरे मायके की याद दिला रही है ,घर के सबसे नन्हे जीव को भी मेरी बेटी  छोटे से रुमाल में ढक कर सुला रही है .......ऐसे ही ना जाने कितने अनगिनत अहसास है जो जी रहे है हम इन दो-चार दिनों की गुलाबी ठण्ड में ............
        कल से पारा उछल के सीधे चार डिग्री ऊपर  आ गया और मौसम में मुम्बैया असर दिखने लगा .....कही मेरी यादें भी मौसम की तरह लुप्त ना हो  जाए ..................

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

कल शाम का खुशगवार मौसम न जाने क्यों बहुत कुछ लिखने को प्रेरित कर रहा था .हाथ में लेखनी को पकड़ा ही था कि मेरी १२ वर्षीया बेटी ने कहा  'मम्मा मैं भी कुछ लिखू '
मैं मुस्कुरा दी और लिखने में व्यस्त हो गई ,तभी उसने कुछ दो-चार लाइने लिख कर पकड़ा दी ,उसकी टूटी-फूटी हिंदी ,साथ में मुम्बईया भाषा का तड़का और उसकी मन:स्थिति ....सब था इन लाइनों में 
प्रस्तुत कर रही हूँ उसके प्रथम प्रयास को प्रोत्साहन के लिए आपके समक्ष 

कितनी करती किताबे बोर 
स्कूल ले जाती मैं बस्ते का बोझ 
आती जब किताबे आँखों के सामने 
क्यों सो जाते हम बच्चे लोग 
पर क्या करे .....................
पढना ही पड़ता हर रोज
कभी हिंदी की मात्राओं में खोती 
तो कभी 
गणित के फार्मूलों में उलझती 
उफ़ ये मराठी 
मेरे सर के ऊपर से चली जाती 
विज्ञान के चमत्कार तो समझ ही ना पाती 
सच,कितना करती मुझे बोर ये किताबे 

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

पथिक

पथिक तू चलता चल अपनी मंजिल की तरफ
कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र
फूलों के ख्वाबों को छोड़
काँटों की राह पकड़
संघर्षों से जूझता तू बढ़ता चल
अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ
कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र
राह में मिलेंगे बहुत से हमसफ़र
इस कारवें में भीड़ का हिस्सा बनना मत
न करना कोई शिकवा-शिकायत
बस चुपचाप , अपने बुलंद इरादों के साथ
भीड़ को चीर के बढ़ता चल
अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ
कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र
तनिक सी कामयाबी के जाम पीकर
उसके सुरूर में ना खोना
क्योकि ;
हो सकती है यह तुफां के पहले की ख़ामोशी
या फिर ;
किसी मृग-मरीचिका की मदहोशी
इसलिए ;
छलकते टकराते जाम को छोड़
आने वाले तुफां के लिए
खुदी को बुलंद कर , खुद को तैयार कर
तू चल अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ
पथिक तू बढ़ता चल
कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र 

रविवार, 29 जनवरी 2012

                   शुभ प्रभात 

बिटिया की जिद के चलते घर में फिर से एक नन्हे से जीव का प्रवेश हुआ है और पिछले दो दिनों से घर की धुरी मैं नहीं बल्कि कछुआ प्रजाति का यह नन्हा सा जीव बना हुआ है .इसे देखते ही सबसे पहले बचपन की वो कहानी याद आती है जिसे हमने ना जाने कितनी बार वार्षिक परीक्षा की उत्तर-पुस्तिका में लिखा था .......बचपन की वो बार-बार दोहराई हुई कहानी आज भी शायद हम सबके स्मृति-पटल पर अक्षरश: अंकित है. लेकिन आज भी इस कछुए को देखकर यही लगता है कि क्या वाकई इस धीमी चाल के कछुए ने फुर्तीले खरगोश को हरा दिया था या फिर ये हमारे पूर्वजो द्वारा गढ़ी गई एक कहानी मात्र है, बालमन को प्रेरित करने की.......हम तो इस कहानी से प्रेरणा ले लिया करते थे ,लेकिन आज मन में एक सवाल उठता है ,क्या आज की पीढ़ी के बच्चे ऐसी कहानियों से प्रेरित होते है ?
                      खैर.........................बेटी (शगुन) बहुत खुश है ,कभी उसे खाना देती है, कभी नहलाती है,दिन में दो बार उसका पानी बदलती है, कभी हथेली पर लेकर उसे सहलाती है और जब वो उसे फर्श पर छोड़ती है तो ये नन्हा जीव घबरा कर अपने-आप को खोल में समेट लेता है और जब उसे यह निश्चित हो जाता है कि आस-पास कोई नहीं है तो सिर और पैर खोल से बाहर निकाल कर धीमे-धीमे चलने लगता है .......इसे ऐसे चलता देखकर मुझे कबीर की ये पंक्तियाँ बरबस ही याद आ जाती है 
                              " धीरे धीरे रे मना ,धीरे सब कुछ होय
                                माली सींचे सौ घड़ा ऋतू आये फल होय "
      ....................बात सिर्फ धीरे-धीरे चलने की नहीं है ,बात है गतिशीलता की ,गंतव्य स्थान तक पहुँचने की.


     सच, यह नन्हा जीव मुझे कितना कुछ सिखा  रहा है,शायद इसीलिए लोग पालतू पशु-पक्षी रखते है ताकि उनसे कुछ सीख सके......जब वह अपने खोल में घुसता है तो लगता है कि जिंदगी का पाठ पढ़ा रहा है कि जब तुम्हारे आस-पास के वातावरण में नकारात्मक उर्जा का प्रभाव हो तो अपने-आप को समेट लेना चाहिए ताकि नकारात्मकता हमें नुकसान नहीं पहुंचा सके और जैसे ही मौका मिले,सकारात्मक माहौल मिले हमे आगे बढ़ना चाहिए ,धीरे ही सही लेकिन कदम बढ़ाना चाहिए .
                                

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

मन की थाह

मन की थाह 

मन करता है कि
आसमां को माप लु 
समुंद्र की गहराइयों को छू लु 
चाँद की चांदनी को समेट लु 
सितारों को अपनी चुनरी में सजा लु 
छू लु किसी के अंतर्मन को 
और वेदना को कम कर जाऊ 
किसी के मन की तपिश को 
मेरे मन की शीतलता सुकून दे जाए 
और भी ना जाने 
क्या-क्या चाहता है मन मेरा 
बस कोई तो एक हो 
जो मेरे भी मन की थाह ले सके 

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

पिछला पखवाडा बहुत व्यस्तता वाला रहा .....सूर्य देव के मकर राशी में प्रवेश के साथ ही मल-मास समाप्त हो गया और शुभ कार्यों का शुभारम्भ हो गया ........मकर सक्रांति का त्यौहार , माहि चौथ का व्रत , घर के प्रांगण में माता की चौकी और दैनिक जीवन में घटने वाली छोटी-छोटी घटनाएँ जो मन-मस्तिष्क पर अमिट प्रभाव छोड़ देती है ........इन्ही सब के बीच नए साल का पहला महिना विदा लेने को है और विदाई के साथ मेरी झोली में डाल जायेगा खट्टी-मीठी यादों की सौगात ......और हर बार की तरह मैं मीठी यादों को सहेज लूँगी अपनी ही यादों के बगीचे में और खट्टी यादों की पोटली बना फ़ेंक दूंगी पास के तालाब में ...........
                 
          यादों के गलियारों से निलकते हुए
          अतीत के झरोखों से झाकते हुए
          कभी-कभी जी लेती हु मैं भी
         वो पल ,
         जिन्हें सहेजा है मैंने अपनी ही यादों के पिछवाड़े में
         जहा आज भी सांसे भरती है खुशियाँ
         महसूस करती हु उन सांसों की गर्माहट
         आज भी
        एक ही क्षण में ,अपनी पूरी आत्मीयता से
        जी लेती हु वो पल
         और जी के उन पलो को
        तृप्त हो जाता मन
        न करता कोई गिला-शिकवा
       बस,मैं और मेरे ये पल
        जीती हु इन्हें हर दिन हर पल
         नहीं चाहती कि खो जाए ये
        इसीलिए छोड़ा है इन्हें
        खुशियाँ बिखरने को, पल्लवित होने को
        अपनी ही यादों के पिछवाड़े में .