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पृथ्वी

आहिस्ता आहिस्ता 
मैं सिसकती रही
तुम्हारे अहंकार के बोझ को
ढ़ोती रही
तुम्हारी मनमर्जियों तले 
घुटती रही
अपना सब तुम पर लुटाती रही
तुम्हारा पेट पालती रही
तुम्हे हर कदम संभालती रही
पर तुम
न जाने किस मद में रहे
किस उन्माद में रहे
शुक्रगुजार होना तो दूर
तुम तो अपनी आँखे तरेरते रहे
लेकिन अब वक्त आ गया
बहुत पोषित किया तुम्हे
अब खूद को बचाना है 
हम दोनो अब ऋणी नहीं
तुम खूद को बचाओ
मैं खूद को बचाती हूँ
मैं पृथ्वी हूँ
तुम्हारी संवेदनाओं असंवेदनाओ से आहत
अब मैं अपनी धूरी पर 
खूद में केंद्रित हूँ
हाँ.....अब मैं ध्यान में हूँ 
जो बिगाड़ा तुमने
उसके परिष्कार में हूँ 

टिप्पणियाँ

Kamini Sinha ने कहा…
हम दोनो अब ऋणी नहीं
तुम खूद को बचाओ
मैं खूद को बचाती हूँ
मैं पृथ्वी हूँ
तुम्हारी संवेदनाओं असंवेदनाओ से आहत
अब मैं अपनी धूरी पर
खूद में केंद्रित हूँ
हाँ.....अब मैं ध्यान में हूँ
जो बिगाड़ा तुमने
उसके परिष्कार में हूँ

बिलकुल सत्य वचन ,जो कर्मा किया वो अब भुगत रहे हैं और भुगतेंगे भी ,धरती माँ खुद ही खुद का शुद्धिकरण कर रही हैं। सार्थक सृजन ,सादर नमस्कार आपको
पृथ्वी दिवस को सार्थक करती सुन्दर पोस्ट।
आपकी इस प्रस्तुति का लिंक चर्चा मंच पर चर्चा - 3680 में दिया जाएगा। आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी।

धन्यवाद

दिलबागसिंह विर्क
आत्ममुग्धा ने कहा…
हम सब अपने कर्मों का फल ही भोगते है....बहुत आभार आपका