देह के समीकरण से परे देखना कभी उसे
समूचा ब्रह्मांड समेट के रखती है
खिलखिलाते लबों के पीछे मुस्कुराती सी
जिंद़गानी सहेजे रखती है
देखना कभी नजरे मिलाकर, न जाने कितने
सैलाब समेटकर रखती है
ब्याह की चुनरी की नीचली सतह में, अपना
कुवांरापन छुपाकर रखती है
छूई हुई देह में, संभालकर आज भी
अनछूआ एक मन रखती है
नही बाँटती वो किसी के भी साथ
ये मन और वो अल्हड़ कुवांरापन
सच है कि वर्जिन नहीं होती है, पर
एक वर्जिन आत्मा रखती है
और उस वर्जिनिटी को
भंग करने की इजाजत
वो किसी को नहीं देती है
समझना कभी उसके इस भुगोल को भी
पिता चिनार के पेड़ की तरह होते है, विशाल....निर्भीक....अडिग समय के साथ ढलते हैं , बदलते हैं , गिरते हैं पुनः उठ उठकर जीना सिखाते हैं , न जाने, ख़ुद कितने पतझड़ देखते हैं फिर भी बसंत गोद में गिरा जाते हैं, बताते हैं ,कि पतझड़ को आना होता है सब पत्तों को गिर जाना होता है, सूखा पत्ता गिरेगा ,तभी तो नया पत्ता खिलेगा, समय की गति को तुम मान देना, लेकिन जब बसंत आये तो उसमे भी मत रम जाना क्योकि बसंत भी हमेशा न रहेगा बस यूँ ही पतझड़ और बसंत को जीते हुए, हम सब को सीख देते हुए अडिग रहते हैं हमेशा चिनार और पिता
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