चुनौतियां

मैं सुनती हूँ
अपने अंदर 
बेचैन कर देने वाली चुनौतियां
जो जीवन की उत्कृष्ट राह की ओर
धकेलती है मुझे
परिचय कराती है
अपने ही एक भिन्न अक्स से
ये चुनौतियां 
मेरी नींदे उड़ा देती है
लेकिन
मुझे पसंद है इनसे जूझना
मै खेलती हूँ 
इनके साथ सीसो वाला गेम
कभी चुनौतियां मुझ पर भारी
तो कभी मैं उन पर भारी
कभी कभी हम दोनो
संतुलन भी बना लेते है
पर मैं
शुक्रगुज़ार हूँ इनकी
इनके बिना मैं 'मैं' नहीं
देखा जाये तो
बिना चुनौती
जीवन भी तो कुछ नहीं 

टिप्पणियां

  1. सादर नमस्कार,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा शुक्रवार (22-05-2020) को
    "धीरे-धीरे हो रहा, जन-जीवन सामान्य।" (चर्चा अंक-3709)
    पर भी होगी। आप भी
    सादर आमंत्रित है ।
    …...
    "मीना भारद्वाज"

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  2. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज गुरुवार 21 मई 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  3. चुनौतियों से ही तो अस्तित्व निखरता है
    वाह!!!
    बहुत सुन्दर...

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  4. बहुत सुंदर अभिव्यक्ति.
    सादर

    जवाब देंहटाएं

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