सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

हलाहल

उसका घाव नासूर है
जो भरेगा नहीं कभी
उसके गले में हलाहल है
जो नीचे उतरेगा नहीं कभी
उसके ह्रदय में सिर्फ प्रेम है
जो बाहर निकलेगा नहीं कभी 

#क्षणिका

टिप्पणियाँ

जी नमस्ते ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल बुधवार(२१-०७-२०२१) को
'सावन'(चर्चा अंक- ४१३२)
पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
सुन्दर रचना - - नीलकंठ होना आसान नहीं।
Onkar ने कहा…
सुन्दर रचना
Meena sharma ने कहा…
प्रेम भी हलाहल से कोई कम तो नहीं। धारण कर सको तो शिव हो जाओ, ना सँभाल पाओ तो शव हो जाओ।
आत्ममुग्धा ने कहा…
एकदम सच और सटीक बात कही आपने

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

काम ही पूजा है

हर रोज सुबह की सैर मुझे पूरे दिन के लिये शारीरिक मानसिक रूप से तरोताजा करती है। सैर के बाद हम एक भैयाजी के पास गाजर, बीट, हल्दी, आंवला ,अदरक और पोदीने का जूस पीते है, जिसकी मिक्सिंग हमारे अनुसार होती है। हम उनके सबसे पहले वाले ग्राहक होते है , कभी कभी हम इतना जल्दी पहूंच जाते है कि उन्होने सिर्फ अपना सब सामान सैट किया होता है लेकिन जूस तैयार करने में उन्हे पंद्रह मिनिट लग जाते है, जल्दबाजी में नही होती हूँ तो मैं जूस पीकर ही आती हूँ, वैसे आना भी चाहू तो वो आने नहीं देते , दो मिनिट में हो जायेगा कहकर, बहला फुसला कर पिलाकर ही भेजते है। उनकी अफरा तफरी और खुशी दोनो देखने लायक होती है।      आज सुबह भी कुछ ऐसा ही था, हम जल्दी पहूंच गये और उन्होने जस्ट सब सैट ही किया था , मैं भी जल्दबाजी में थी क्योकि घर आकर शगुन का नाश्ता टीफिन दोनों बनाना था। हमने कहां कि आज तो लेट हो जायेगा आपको, हम कल आते है लेकिन भैयाजी कहाँ मानने वाले थे । उन्होने कहा कि नयी मशीन लाये है , आपको आज तो पीकर ही जाना होगा, अभी बनाकर देते है। मुझे सच में देर हो रही थी लेकिन फिर भी उनके आग्रह को मना न कर स...

गर्भगृह

मुझे अंधेरों से डर नहीं लगता मुझे सन्नाटों का भी खौफ़ नहीं उष्णता मुझे तरबतर नहीं करती आपदाओं से मैं घबराती नहीं काल कोठरी सी एक छोटी जगह जहाँ रोशनी की महीन किरण तक नहीं मुझे पर्याप्त है क्योकि मैं उसे समझ लेती हूँ माँ का गर्भगृह जहाँ कुछ समय मुझे रहना है जीवन पाकर बाहर आना है ईश्वर अभी भी रच रहा है मुझे उसकी रचना पर सवाल नहीं संदेह नहीं

पिता और चिनार

पिता चिनार के पेड़ की तरह होते है, विशाल....निर्भीक....अडिग समय के साथ ढलते हैं , बदलते हैं , गिरते हैं  पुनः उठ उठकर जीना सिखाते हैं , न जाने, ख़ुद कितने पतझड़ देखते हैं फिर भी बसंत गोद में गिरा जाते हैं, बताते हैं ,कि पतझड़ को आना होता है सब पत्तों को गिर जाना होता है, सूखा पत्ता गिरेगा ,तभी तो नया पत्ता खिलेगा, समय की गति को तुम मान देना, लेकिन जब बसंत आये  तो उसमे भी मत रम जाना क्योकि बसंत भी हमेशा न रहेगा बस यूँ ही  पतझड़ और बसंत को जीते हुए, हम सब को सीख देते हुए अडिग रहते हैं हमेशा  चिनार और पिता