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संदेश

माँ

संदेह के बादलों से भय की हो रही है बारिश चू रही है छत सील रहा है सब कुछ बन रही है चिन्ता की रेखायें मेरे ललाट के आस पास लेकिन मन के एक कोने में दूर कही सुनहरी धूप खिलने को है जो हटा देगी घने बादलों को रोक देगी बरसते पानी को क्योकि एक नया इंद्रधनुष बनने को है फिर भी ना जाने क्यो अनजाना सा लग रहा है क़यास कभी बिखर तो कभी बंध रही है मेरी आस मन ही नहीं अब तो मेरी चौखट भी रहने लगी है उदास क्योकि पल पल कर रहा है छलनी मुझे मेरी माँ को खोने का अहसास

कैंसर

यह तो जानती थी मैं कि जिन्दगी एक उलझी हुयी पहेली है अक्सर,अपने ख़ाली वक़्त में मैं इसे सुलझाया करती थी लेकिन यह क्रूर और निष्ठुर भी है नहीं था मुझे ये अनुमान हर बार यह एक नया रूप लेकर आती है कभी हँसाती है तो कभी रूलाती है लेकिन बहुत फ़र्क़ है महसुस करने में और इसकी कड़वी सच्चाई को स्वीकार करने में सच कह गये कबीरदास जाके पैर फटी ना बिवाई वो क्या जाने पीर पराई अपनी ही बिवाई से आज आँख मेरी भर आयी जिसने जीवन दिया उसी के जीवन पे आँच है आयी मिठास के ताने बाने से बुनी थी मेरी जिन्दगी कि एक भयावह शब्द का फन्दा एेसा उलझा उधड़ गया मेरा ताना बाना दे गया एक ऐसा दर्द जो अब तक था मुझसे अनजाना हौसलों की धूप में उम्मीदों की छाँव लिये चलती जा रही हुँ मैं कभी देवालयों में तो कभी गूगल की गलियों में तलाश रही हुँ अमृत पान ढ़ुंढ़ रही हुँ तुझे ऐ जिन्दगी कभी मन्नत के धागों में कभी माँ अँजनी के लाल में कभी कृष्ण की मुरली में तो कभी अपने ही दृढ़ विश्वास में क्योकि जिस किसी ने भी हिम्मत हारी तु है उन सब पे भारी अपने इरादों पे मुझे संशय नहीं तेरी परीक्षाओं से भी मुझे भय नहीं जिन...
हर रोज की तरह,आज भी माॅरनिंग वाॅक के बाद ,डेली न्यूज़ सुनते हुए अपने काम निपटा रही थी।यह मेरा रोज का नियम है,न्यूज़ बिना मेरी इजाज़त के मेरे कानों में जाती रहती है क्योंकि ड्राॅईंगरूम में टीवी पर सिर्फ न्यूज़ ही चलती है। मैं बिना डिस्टर्ब हुए अपने कामों में व्यस्त रहती हुँ। हाँ,कुछ ताज़ातरीन ख़बरें ज़रूर मेरी जानकारी में इज़ाफ़ा कर देती है। लेकिन...............आज की ख़बर ने मेरा दिल दहला दिया। मैं पूरी तरह से भावशुन्य हो गयी और अभी तक हुँ। एक पाकिस्तानी नागरिक हाथ में एक कटा हुआ िसर लेकर घुम रहा था,न्यूज़ के मुताबिक़ वे जश्न मना रहे थे। संदेह है कि िसर हमारे वीर जवान हेमराज सिंह का हो सकता है,पिछले वर्ष बिना िसर के जिनका अंतिम संस्कार किया गया था। इस ख़ौफ़नाक और निर्मम करतुत को देखकर ना चुप रहते बन पा रहा है और ना ही बोलते। मैं स्तब्ध हुँ और व्यथित भी कि परिवार वालों पर क्या बीत रही होगी........? क्या हैवानियत से उपर का कोई शब्द है इस करतुत को परिभाषित करने के लिये.............?

बेल

क़रीबन हफ़्ताभर पहले रसोईघर की खिड़की में रखे अपने पौधों को पानी देते समय मैंने देखा कि एक नन्हा सा अनजाना बीज गमले के एक कोने से अंकुरित हो रहा है।दुसरे दिन मैंने देखा कि वह बड़ी तेज़ी से बढ़ रहा है,कौतूहलवश मैं रोज पानी देती रही और हफ़्ते भर में एक बल खाती इठलाती बेल मेरी नजरों के सामने थी,जो मेरी रसोईघर की खिड़की से लगकर ऊपर की ओर बढ़े जा रही थी। हांलाकि अभी तक मुझे यह समझ नहीं आया कि यह बेल है किस चीज़ की,फिर भी इसकी बल खाती अदाओं ने मुझे अपनी ओर खींच रखा है। हफ़्ताभर से ना जाने कितने सबक़ यह मुझे सिखा रही है,बस उन्हीं बातों को यहाँ बाँटना चाहती हुँ। सबसे पहले जब यह अंकुरित हुआ था तो मुझे आश्चर्य हुआ कि बिना कोई बीज डाले यह कैसे फुटा,शायद पहले का कोई बीज था जो मिट्टी में गहरा दबा था,लेकिन जैसे ही उसे मिट्टी पानी की नमी मिली वो लहरा उठा।बिल्कुल इसी तरह हम सब के अंदर भी ना जाने कितनी अच्छाइयाँ दबी पड़ी है जो अनुकूल वातावरण मिलते ही निकल आती है।अपने बच्चों के व्यक्तित्व को निखारने के लिये हमे उन्हें उचित खाद पानी देना चाहिये ताकि उनकी प्रतिभा निखर सके। जिस तेज़ी से यह बेल बढ़ रही थ...

नया साल

जीवन का एक और वर्ष ले रहा है विदा अब कहना है निराशा को अलविदा कुछ यादें छलकी सी कुछ यादें धुमिल सी कुछ खुशियों भरी ओस की बुंदों सी कल से बन जायेगी धरोहर बीते हुए साल की नये सपनों के संग शुरुआत होगी नये साल की कल का सुरज मिटा देगा कोहरा आसां हो जायेगी मुश्किल राह की रात गयी सो बात गयी जगी है ललक अब कुछ पाने की हम बढ़े,सब बढ़े और बड़ी हो सोच सबकी ना कुछ तेरा ना मेरा ये जीवन तो है नियामत ख़ुदा की बस.... खुश रहे सब चाह बढ़ जाये जीने की

हवा

मेरी चुप्पी को घमंड मेरे शब्दों को प्रचंड बतियाते नयनों को उदंड और मधुरता को मनगढ़ंत समझते है लोग लेकिन दोष लोगों का नहीं कमबख़्त ..... हमारी राह से गुजरने वाली हवा की फ़ितरत ही कुछ ऐसी है ।

करवां चौथ

ऐ चाँद,आज तु भी जरा इठलाना पूरो शबाब से आसमां में उतरना खुशियों के छलकाना जा़म क्योकि आज की ये खुबसुरत शाम तेरे और मेरे प्रिय के नाम ऐ चाँद, देख जरा नीचे सज धज के खड़ी सुहागिनें कर रही तेरा इंतजार,करके सोलह श्रृंगार बादलों की ओट से तु झांकना लगी है टकटकी,जो झलक तेरी दिखी खिल जायेगे सबके चेहरे,चलेगा तेरा जादु क्या प्रोढ़ा,क्या यौवना और क्या नववधु ऐ चाँद,तु साक्षी बनेगा प्यार का देखेगा आस्था की रात में घुलता ऐतबार आज तो यार से भी पहले होगा तेरा दीदार लेकिन सुन जरा, भले ही धरती पे ना उतर लेकिन आसमां में जल्दी तु आना मैं भी हुँ प्यासी तेरे दीदार की जल्दी तु आना होगा प्यार का समर्पण करके तुझको जल अर्पण करवां चौथ की हार्दिक बधाईयाँ