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सूरज और मैं

पूरे दिन का थका-मांदा ढलता सा सूरज कल रात; मेरे आंगन के एक कोने में आ छुपा रात के साये से घबराया सिमट रहा था मेरे ही आँचल में मैंने कहा,चलो बतियाए थोड़ा देख के स्नेह मेरा उसने भी मौन तोड़ा उसे सहमा सा देखा तो खुद पे हुआ गुमां और कह बैठी सूरज से कि तुझमे हैं ज्वाला इतनी तो लौ मुझमे भी कम नहीं तेरे जितना तेज ना सही लेकिन; मैं भी किसी से कम नहीं जिस सृष्टी को देते हो तुम उजाला सोचो जरा कौन है उसे जन्म देने वाला तुम तो रात के सायों में खो जाते हो सितारों के आगोश में सो जाते हो लेकिन मैं........ खुद ही सितारों की चूनर बन जाती हूँ और तुम जैसों को अपने आँचल मे सहलाती हूँ मेरी बातें सुन,सूरज मुस्कुराया और बोला हँस कर तु तो है वो नन्हा सा दिया जिसकी लौ पे सबने अभिमान किया मेरी ज्वाला किसी से सही ना जाए लेकिन तेरी लौ सबको पास बुलाए तुने पूछा........क्या हूँ मैं ? मैं तो बस तेरे माथे पे सजा सिंगार हूँ......... ऐसा कह चला गया वो नन्हा सा सहमा सा सूरज आसमां को सिंदूरी करने अपनी किरणों को मेरे आँगन मे छोड़.......... Proud to be a woman

मैं जीना चाहती हूँ

जीने दो मुझे इंसान की तरह  क्योकि  कहते हो अन्नपुर्णा  और नोचते हो बोटी-बोटी  दुर्गा कहकर सर नमाते हो  और दुसरे ही पल  एक राह चलती दुर्गा को  पावँ तले रौंदते हो  महान तो बताते हो  लेकिन इंसान बनकर जीने नहीं देते हो  तुम्हारे हौसलें है बुलंद  क्योकि सदियों से तुमने लूटा है हमारा तन मन  कभी द्रौपदी को छला  तो कभी सीता की ली अग्निपरीक्षा  राधा को तो तुमने कही का ना छोड़ा  जीवन भर प्यासी प्रेयसी बनाकर  दिल उसका तोडा  लेकिन ; फिर से चली चाल,बहलाया ,फुसलाया  कृष्ण से पहले राधा का नाम लगाया  लेकिन सोचा है कभी  अरे! सोलह हजार रानियों में  एक भी राधा का नाम क्यों ना आया  फिर भी तुम देव हो  क्योकि तुम एक मर्द हो  यही तो होता आया है सदियों से  छला गया हमेशा छल-प्रपंच से  ना जाने क्यों  तुम्हारा मन तुम्हे नहीं धिक्कारता  करते हो ऐसे कुकर्म  कि माँ के दूध को भी आती है तुम पर शर्म  नारी हूँ म...

चाँद चौथ का

सहेज के रखी , अपनी ब्याह की चुनडी  आज फिर से मैं निकाल लाई  सात फेरों के सातों वचन  याद करने की रुत फिर से आई  तेरे हाथों से सजे मांग मेरी  एक बार फिर , फेरों की वह बात याद आई  ललाट पर कुमकुम , मांग में तारे  जैसे आँगन में मेरे  झूमते हो चाँद-सितारे  मेहंदी से रची हथेली, चूड़ियों से भरी कलाई  माथे पे सजा सिन्दूर , गालों  पे आई ललाई  कर-कर के श्रृंगार मैं मुसकाई  देख के दर्पण , खुद से ही शरमाई  यह जादू है आज के दिन का  सज-सज के सजना के लिए  एक प्रोढ़ा भी दुल्हन सी जगमगाई  यौवना हो या प्रोढ़ा रूप तो आज सबपे है टुटा  करके श्रृंगार देखेगे चाँद से झरता प्यार  यह जादू है आज के दिन का  बिखेरेगा प्यार .....देगा दीदार  झूम के निकलेगा चाँद .......हाँ .................चाँद करवा चौथ का ! करवा चौथ की हार्दिक बधाइयाँ    

सूपर मोम

सूपर मोम.......यह शब्द पिछले कुछ वर्षों से महिलाओं से जुड़े शब्दों में प्रमुख रूप से उभरकर आया शब्द है .आखिर कौन है सुपर मोम ?.......यह माँ का वो आधुनिक रूप है जिसकी कल्पना हमारी दादी-नानी ने तो कदापि नहीं की थी .इस सुपर मोम की जिंदगी सुबह पांच बजे से शुरू होकर रात के ग्यारह बजे भी थमने का नाम नहीं लेती .यह सुपर मोम आधुनिक समाज की वो नारी है जो हर जगह अपनी सक्रीय भूमिका निभाती है , अब उसका कार्यक्षेत्र सिर्फ रसोईघर ही नहीं रहा बल्कि हर क्षेत्र में वह अपनी दमदार दावेदारी रखती है .वह घर की धूरी है , ऑफिस में powerful कॉरपोरेट women है , सिर्फ पति और बच्चों को ही समय नहीं देती , खुद के लिए भी समय निकालती है , पार्लर और स्पा में जाती है ,किट्टी पार्टी एन्जॉय करती है , डिस्को में थिरकती है , रसोईघर में लैपटॉप पर अंगुलियाँ चलाते हुए मिनटों में microwave में खाना बना लेती है बिना धुएँ , चूल्हे और चौके के और भी ना जाने ऐसी कितनी अनगिनत चीजे है जो ये सुपर मोम पलक झपकते ही कर लेती है और सबसे बड़ी बात कि इस सुपर मोम से सब खुश है , पति इसकी कोई बात नहीं काटता, बच्चें mother's day पर कार्...

कोरा कागज

कुछ खास नहीं आज लिखने को  तो सोचा  चलो समय के कागज पर  कलम को अपनेआप ही चलने दूं  अपनी ही लेखनी को एक नया आयाम दूँ  दिल और दिमाग  पर छाये शब्दों को  अस्त-व्यस्त ही सही  लेकिन बहने दूं  शायद कविता ना बन पाए  शायद अक्षर मोती से ना  सज पाए  लेकिन  चलने दूं  लेखनी को  अपनी ही रफ़्तार में  लिखने दूं  कुछ शब्द अपनी ही जिंदगी की किताब के  लेकिन ये क्या ? कुछ कडवे पर सच्चे शब्द  उड़ गए वक़्त की आंधी में , किसी पाबंदी में  निकले थे जो दिमाग  के रस्ते से  और कुछ भावुक शब्द  पिघल गए अपनी ही गरमी से  धुल गए आंसुओं से  जो निकले थे सीधे दिल से  और................................ मेरी लेखनी को आयाम नहीं  सिर्फ विराम मिला  और मेरा कागज जो कोरा था  कोरा ही रह गया 

गाँव

लम्बे अंतराल के बाद आज यहाँ आना हुआ है ....पिछले कुछ दिन काफी व्यस्तता वाले रहे ....गया पखवाडा मैंने राजस्थान में बिताया .....हमेशा की तरह लू के थपेड़े लेकिन फिर भी आनंद की अनुभूति.....बहुत सारे मेहमानों की मेहमान-नवाजी का सौभाग्य प्राप्त हुआ और सब सकुशल संपन हुआ....हर बार की तरह इस बार भी मेरी किताब में एक और पृष्ठ जुड़ गया और इस बार इसमें सिर्फ मीठी यादें है  ना पनघट है ना घूँघट है और ना ही बरगद की छावं  फिर भी अच्छा लगता मुझे मेरा गाँव  बढ़ा  रहा हाथ दोस्ती का शहर से  चला जा रहा सड़क की ओर पगडंडी की डगर से  ऐसे ही अपने गाँव में बिता आये कुछ पल फुर्सत के  भागते से लम्हों में कुछ पल सुस्ताई  मशीनी युग में रेंगती सी जिंदगी देख मैं हरषाई  यहाँ तो कहते है  नाइन-महरिन को भी चाची और ताई  बड़ों ने बिछाई बाज़ी ताश के पत्तों की  खुशियों के ओवर में लगे चौक्के-छक्के ठहाको के  यहाँ ; अपनेपन की चारदीवारी में  बंटवारे होते सुख-दुःख के  महफ़िल सजी शामियानों में  जागरण हुआ एकादशी...

'सत्यमेव जयते'

कल आमिर खान prodction के 'सत्यमेव जयते' का पहला एपिसोड देखा ,देखकर भीग गया मन. पिछले पांच-छ: सालों से टीवी की दुनियां में रिअलिटी शो की झड़ी सी लगी है, उन सबमे से सत्यमेव जयते वाकई कुछ रियल सा लगा. हकीकत,जिसे हम सभी जानते है, उसी के कुछ अनछुए पहलु और मुद्दों को मद्देनज़र करता है यह शो. आमिर खान हमेशा से ही कुछ अलग करते आये है और इस बार वे छोटे परदे पर भी सफल हुए है,वे सही कहते है कि दिल पे लगेगी तभी बात बनेगी.उन्होंने सीधे दिल पे चोट की है इस शो के माध्यम से. रविवार की सुबह जब नाश्ते और खाने की जगह सिर्फ brunch ही होता है, समय निकालना थोडा मुश्किल होता है लेकिन मैंने निकाला और वो भी पूरा एक घंटा. पहले एपिसोड का मुद्दा था 'कन्या भ्रूण हत्या'. शो की शुरुआत में ही आँखे नम होने लगी,लड़की को जन्म देने की वजह से पीड़ा झेल रही महिलाओ से रूबरू करवाया गया,उनकी व्यथा इतनी तीव्र थी कि शब्द लड़खड़ा रहे थे,आँखे ही नहीं गला भी भर रहा था,आमिर की आँखों में भी कुछ पिघलता हुआ सा महसूस हुआ....दर्शक-दीर्घा में बैठे लोग भी निशब्द थे....सबके दिलों पे जो लगी थी,लेकिन शो ख़त्म होते-होते आ...