नफ़रत से भरे
तुम्हारे कड़वे शब्दों
को कुरेद कर
स्नेह से सींच
अमृत समझ
धारण कर लिया
सदा सदा के लिये
उगलो तो ज़हर
निगलो तो ज़हर
इसलिये सजा लिया
बिल्कुल नीलकंठ की तरह
अपने कंठ में
अब ये नीली सी आभा
मेरे कंठ की
मुझे अंधेरों से डर नहीं लगता मुझे सन्नाटों का भी खौफ़ नहीं उष्णता मुझे तरबतर नहीं करती आपदाओं से मैं घबराती नहीं काल कोठरी सी एक छोटी जगह जहाँ रोशनी की महीन किरण तक नहीं मुझे पर्याप्त है क्योकि मैं उसे समझ लेती हूँ माँ का गर्भगृह जहाँ कुछ समय मुझे रहना है जीवन पाकर बाहर आना है ईश्वर अभी भी रच रहा है मुझे उसकी रचना पर सवाल नहीं संदेह नहीं
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