क्या आसान है प्रेम को समझ पाना
शायद नहीं....
पर मुश्किल भी नहीं, लेकिन
इसकी परिभाषा इतनी गहन बना दी गई है कि
साधारण इंसान समझ ही न पाये
असल में प्रेम परिभाषाओं के परे है
बस महसूस कर पाने की अवस्था है
अगर एक बार आपने
चख लिया इसका स्वाद
तो आप जीवन भर के लिये प्रेम को पा लेते है
बस, अनुभूत करने की आपकी क्षमता ऐसी हो
जो आपकी कल्पनाओं से भी बाहर हो
कोई भी युगल
पति-पत्नी हो या प्रेमी-प्रेमिका
धीमे धीमे वक्त के पहियों पर चलते हुए
प्रेम मे रहते हुए
एक न एक दिन
माँ बेटे सा ताना बाना बुन ही लेते है
वे सुलझा लेते है प्रेम की गूढ़ गुत्थियां
और पहूँच जाते है
आध्यात्मिकता के सर्वोच्च पायदान पर
बस इतना ही तो है प्रेम
पर बिना चखे कैसे मानोगे
बिना जीये कैसे जानोगे
प्रेम में खोकर ही तो प्रेम पाओगे
ये वो पक्का रंग है
जो छूटता नहीं है
वो रमता है बस धूनी की तरह
पिता चिनार के पेड़ की तरह होते है, विशाल....निर्भीक....अडिग समय के साथ ढलते हैं , बदलते हैं , गिरते हैं पुनः उठ उठकर जीना सिखाते हैं , न जाने, ख़ुद कितने पतझड़ देखते हैं फिर भी बसंत गोद में गिरा जाते हैं, बताते हैं ,कि पतझड़ को आना होता है सब पत्तों को गिर जाना होता है, सूखा पत्ता गिरेगा ,तभी तो नया पत्ता खिलेगा, समय की गति को तुम मान देना, लेकिन जब बसंत आये तो उसमे भी मत रम जाना क्योकि बसंत भी हमेशा न रहेगा बस यूँ ही पतझड़ और बसंत को जीते हुए, हम सब को सीख देते हुए अडिग रहते हैं हमेशा चिनार और पिता
टिप्पणियाँ
बिना जीये कैसे जानोगे
प्रेम में खोकर ही तो प्रेम पाओगे
ये वो पक्का रंग है ....
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क्या बात है!बहुत ही सुंदर और सार्थक रचना। आपको बधाई। सादर।
राम नवनवमी की हार्दिक शुभकामनाएं 🙏
रामनवमी की हार्दिक शुभकामनाएं🙏
वाह बहुत सुंदर /अनुपम।