गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

नानी बाई को मायरो

' नानी बाई को मायरो ' राजस्थान की भोत ही प्रसिद घटना म स एक है.जूनागढ़ क नरसी भक्त की लाडली और बीरा ब्रह्मानंद की ' नानकी ' की कहाणी ह या.नरसी जी खूब धूमधाम स घणो दायजो देक आपरी चिड्कली न परणाई. पर, दिनमान कै बेरो के लिख राखी थी,नरसिजी आपकी ५६ करोड़ की संपदा दान देकै मोड़ा होगा. बठिण नानीबाई क गोद म कुलदिपिका आई.सासरा हारला न या बात चोखी कोणी लागी और बे नानीबाई न सतावै लागा.आश्रम म नर्सिजी को बेटो अकाल क चालता काल को ग्रास बनगो.नानीबाई बीरां क खातर राखी ली थी पर या बात सुणकर बाई को कालेजो फाटन लागगो......पर विधि क विधान क आगै कोई की ही कोणी चाल,बा राखी नानीबाई कृष्णजी क बांध दी. इ तरिया नरसिजी कृष्ण भक्ति म रमगा और नानीबाई गृहस्थी म.
समय बितन क सागै नानीबाई की लाडली कुंवरी को ब्याव मांड दियो.सासरा हरला मायरा खातर भोत बड़ी-बड़ी फ़रमाइश कर दी और सोच्या क इतो बड़ो मायरो भरणे की नरसिजी की औकात कोणी और बे ब्याव म कोणी आवगा,पर नरसिजी तो मायरो भरणे की सारी जवाबदारी आपक सावरिया न सोप क नचिता होगा और कुहा दियो क मैं ब्याँ म जरुर आउंगो.नानीबाई की आंख्या म ख़ुशी का आंसू झरै लागा .
बठिण नरसिजी आपकै मोड़ा साथिया न लेक मायर खातर चाल पड़ा.रस्ता म गाड़ी को पहियों निकल्गो तो कृष्णजी खाती क रूप म आक पहियों ठीक कर दियो और बोल्या मैं भी सागै चालूगो.जद नरसिजी बाई क घरा गया तो सासु-सुसरा बाई स मिलन कोणी दिया और बोल्या की पैली मायर को जाबतो करो फैर ही मिलल्यो.नानीबाई खून का घूंट पीकै रहगी,रो-रोक जी भर लाई और बोलती भी तो के ...................? क्युकी राजस्थान की बेटी म तो ये संस्कार ही कोणी होवै.सासु कह्यो की तेरो मोड़ो बाप मायरो नहीं लावगो तो तनै भी बाकै सागै पाछी भेज देवांगा.नानीबाई सोच्यी की मैं मर जाउंगी पर पाछी कोणी जाउंगी और मरणे खातर कुंए प चलगी क्युकी बिन बैरो हो की भात भरण हारलो बीरों तो कदको ही स्वर्ग सिधारगो और बापूजी कनै तो कुछी कोणी.कुंए म गिरण हाली ही थी की कृष्ण आकै पकड़ ली और बोल्या की थारो राखी को फ़र्ज़ नीभान मैं आउंगो थारो मायरो लेक.कयांकी होगी बा घडी जद कृष्णजी भाई बनकर नानीबाई क सामने खड़ा हा ......मैं तो सोचकर ही रोमांचित होऊ हु .
नानीबाई का तो जैया पग ही धरती प कोणी पडे हा आखिर बीरां रूप म कृष्ण जो मिल्यो थो. चुनडी ओढ़न को सपनो संजो क नानीबाई को मन गावै लगो
बीरों भात भरणे आवगों
संग रुकमणी भोजाई न लावगो
बठिण,नरसिजी दुखी मन स नटवर नागर न बुलान खातर अरदास कर लागा.भगत की अरदास सुण क कृष्णजी आया और बोल्या की नानीबाई म्हारी बहन है मैं चलुंगो मायरो लेक
सुबह नानीबाई क द्वार नरसिजी और बांका नटवर नागर मायरो लेक आया. पूरै गाँव की आंख्या चार होगी की इयाकों मायरो न कदै आयो और न कदै आवगों , जुग-जुगा तक इ मायर की कहाणी कही जावगी. सासर हरला की जबान बंद होगी , गाँव वाला ठगा सा रहग्या और नानीबाई .............................बा तो मन्त्र-मुग्ध थी आपकै सांवरसा बीरां और रुकमनी भोजाई प . नरसिजी भी धन्य होगा कि सांवरो लाज रख दी ,जिंदगी भर कि भक्ति को फल दे दियो .नानीबाई बीरां-भोजाई क टीको काढो,आरतो करो और फेर आई बा घडी जद जगतकर्ता एक साधारण सो बीरों बनकर बहन न चुनडी ओढाई,पूरा ३६ करोड़ देवी-देवता अचंभित था सृष्टिकर्ता कि इ कृष्ण-लीला प .................विलक्षण थी बा घडी ....कल्पना मात्र स ही रोंगटा खड़ा होवै है. धन्य है नरसी भक्त और किस्मत वाली है नानीबाई और बहुत खूब घणो चोखो है ५६ करोड़ को मायरो भरण हारलो थारो,मेरो,और आपणै सबां को सवारियों ........अयाकां भगत और भगवान न मेरी घणी-घणी खम्बा घणी .

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