सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

जिजिविषा

पिछला महीना बहुत व्यस्तता वाला रहा और हाल इस नवजात महीने में भी वही है। सुकून के कुछ पल तलाश रही हूँ लेकिन वो मिल नहीं पा रहे इसलिये थोड़ा धीर धर कर बैठी हूँ। 
      यूँ तो व्यस्त रहना बहुत अच्छा है, इसके चलते हमे तनाव नहीं घेरते। इस महीने की शुरुआत में मैं लगभग दस दिनों तक घर के बाहर थी...घर बंद था । जब भी मैं यूँ घर बंद करके जाती हूँ, सबसे अधिक मुआवजा मेरे नन्हे पौधों को देना पड़ता है , लेकिन इस बार मैं उन्हे नीचे वॉचमेन की निगरानी में छोड़ गयी थी । दस दिन बाद जब लौटी तो सारे पौधें खिले खिले थे....नीचे पेड़ों के सामीप्य में वो भी फैलाव की कोशिश करने लगे लेकिन थे तो गमलों में ही ना ....बस, थोड़ा सा फैल कर रह गये । 
     एक दो दिन बाद मैं सभी पौधों को ऊपर लेकर आयी और थोड़ी काट छाट कर उन्हे फिर से खिड़की में सजाया। यूँ तो मुझे अपने सभी पौधें प्यारे है। पौधें ही नहीं बल्कि मुझे अपने सभी गमले भी प्यारे है क्योकि एक एक गमले को मैंने अपने हाथ से रंगा है । ऐसे ही अपने सबसे फेवरेट गमले में एक फूलों वाला पौधा भी था लेकिन न जाने क्यो वो थोड़ा सुस्त सा लगा। मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया लेकिन दो दिन के बाद उसकी सारी पत्तियां जैसे उदास होकर नीचे की ओर लटक गयी। मेरा मन दुखी हुआ पर मैं उसे रोज पानी देती रही, इसी उम्मीद में कि ये पत्तियां एक न एक दिन खिल उठेंगी। 
        पौधा वैसा का वैसा रहा बल्कि कुछ पत्तियां अब सूख कर पीली होने लगी थी । मैं न जाने किस आस में उसे रोज पानी देती रही, शायद मैं उसे उखाड़ना नहीं चाहती थी क्योकि छूटना मुझे हमेशा तकलीफ देता है । वो पौधा सूख रहा था पर उसका नाजुक सा तना अब भी सीधा था और शायद यही वो आस थी जो मुझे उससे जोड़े रख रही थी। अगर वो पौधा अपनी जड़े छोड़ देता तो शायद मैं भी उससे छूट जाती पर वो अब भी अपनी मिट्टी को पकड़े था। हालांकि उसकी पकड़ में पहले जैसी मजबूती नहीं थी फिर भी प्रयास उसका था मिट्टी से जूड़े रहने का । 
     आज मुझे लगभग एक महीना हो गया उसे पानी देते हुए । आज मैंने देखा कि सूखी झूकी लटकी हुई पत्तियों के बीच कुछ ताजा हरी पत्तियां उन्ही नन्ही शाखाओं पर आ रही है जिन शाखाओं को एकबारगी मैंने मृतप्रायः जान लिया था। 
       मैं खुशी से झूम गयी कि अब ये पौधा फिर हरिया जायेगा । मुझे खुशी इस बात कि नहीं थी कि मेरी मेहनत सफल हुई क्योकि मैंने तो कोई विशेष मेहनत ही नहीं की थी। मैं तो बाकी पौधों के साथ उसे भी पानी देती रही लेकिन हाँ, मैंने  उसकी जगह खाली नहीं की......उसे उसी जगह रखा रहने दिया जहाँ वो पहले से था.....सबसे आगे। वो भले सूख गया था लेकिन उसे रिप्लेस नहीं किया गया। हरे पौधों को आगे कर उसे पीछे नहीं किया । सच कहूँ तो इसके पीछे कुछ सोची समझी मनोदशा भी न थी । हो सकता है मेरा विश्वास इसलिए बना रहा हो क्योकि नन्हे तने को शायद ऐसे किसी विश्वास की जरूरत थी। ये जो नन्ही पत्तियां आज निकली है वो उसी नन्हे तने की अपने आपको बनाये रखने की जिजिविषा थी.....मेरा इसमे कतई कोई योगदान नहीं। 
        ये नन्हा सा पौधा और वो नन्ही पत्तियां मुझे सुबह सुबह ये पाठ पढ़ा गयी कि भले ही आप कितनी भी बुरी परिस्थिति में आ जाओ पर अपनी जंग जीत लेने की जिजिविषा को बनाये रखो......समय लगेगा पर आप मुकाम पा लेंगे। यही जिजिविषा एक्चुअली सुकून है जिसे मैं तलाश रही थी.....देखिये, अस्त व्यस्त पलों में भी ये मेरे साथ है ।

आप सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं ।
       

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

उम्मीद

लाख उजड़ा हो चमन एक कली को तुम्हारा इंतजार होगा खो जायेगी जब सब राहे उम्मीद की किरण से सजा एक रास्ता तुम्हे तकेगा तुम्हे पता भी न होगा  अंधेरों के बीच  कब कैसे  एक नया चिराग रोशन होगा सूख जाये चाहे कितना मन का उपवन एक कोना हमेशा बसंत होगा 

पलाश

एक पेड़  जब रुबरू होता है पतझड़ से  तो झर देता है अपनी सारी पत्तियों को अपने यौवन को अपनी ऊर्जा को  लेकिन उम्मीद की एक किरण भीतर रखता है  और इसी उम्मीद पर एक नया यौवन नये श्रृंगार.... बल्कि अद्भुत श्रृंगार के साथ पदार्पण करता है ऊर्जा की एक धधकती लौ फूटती है  और तब आगमन होता है शोख चटख रंग के फूल पलाश का  पेड़ अब भी पत्तियों को झर रहा है जितनी पत्तीयां झरती जाती है उतने ही फूल खिलते जाते है  एक दिन ये पेड़  लाल फूलों से लदाफदा होता है  तब हम सब जानते है कि  ये फाग के दिन है बसंत के दिन है  ये फूल उत्सव के प्रतीक है ये सिखाता है उदासी के दिन सदा न रहेंगे  एक धधकती ज्वाला ऊर्जा की आयेगी  उदासी को उत्सव में बदल देखी बस....उम्मीद की लौ कायम रखना 

जिंदगी विथ ऋचा

दो एक दिन पहले "ऋचा विथ जिंदगी" का एक ऐपिसोड देखा , जिसमे वो पंकज त्रिपाठी से मुख़ातिब है । मुझे ऋचा अपनी सौम्यता के लिये हमेशा से पसंद रही है , इसी वजह से उनका ये कार्यक्रम देखती हूँ और हर बार पहले से अधिक उनकी प्रशंसक हो जाती हूँ। इसके अलावा सोने पर सुहागा ये होता है कि जिस किसी भी व्यक्तित्व को वे इस कार्यक्रम में लेकर आती है , वो इतने बेहतरीन होते है कि मैं अवाक् रह जाती हूँ।      ऋचा, आपके हर ऐपिसोड से मैं कुछ न कुछ जरुर सिखती हूँ।      अब आते है अभिनेता पंकज त्रिपाठी पर, जिनके बारे में मैं बस इतना ही जानती थी कि वो एक मंजे हुए कलाकार है और गाँव की पृष्ठभूमि से है। ऋचा की ही तरह मैंने भी उनकी अधिक फिल्मे नहीं देखी। लेकिन इस ऐपिसोड के संवाद को जब सुना तो मजा आ गया। जीवन को सरलतम रुप में देखने और जीने वाले पंकज त्रिपाठी इतनी सहजता से कह देते है कि जीवन में इंस्टेंट कुछ नहीं मिलता , धैर्य रखे और चलते रहे ...इस बात को खत्म करते है वो इन दो लाइनों के साथ, जो मुझे लाजवाब कर गयी..... कम आँच पर पकाईये, लंबे समय तक, जीवन हो या भोजन ❤️ इसी एपिसोड में वो आगे कहते है कि मेरा अपमान कर