शनिवार, 31 दिसंबर 2011

रिश्तों का गणित





जीवन की अनमोल निधि है रिश्तें .कुछ बनाये जाते है तो कुछ अपने आप बन जाते है .कुछ जन्म से हमारे साथ जुड़े होते है तो कुछ रिश्तों का दामन हम विवाहोपरांत थामते है .कुछ रिश्ते दिलों में बसे होते है तो कुछ दिमाक पर हावी होते है .कुछ होते है ऐसे भी रिश्ते जो वक़्त के साथ धुंधले हो जाते है, जबकि कुछेक वक़्त के साथ पनपते है .कुछ रिश्तों को फलने-फूलने के लिए स्नेह की खाद और आशीर्वाद की छाँव की जरुरत होती है ,जबकि कुछ रिश्ते संघर्षों और जज्बातों की कड़ी धुप में भी मुस्कुराते है .कुछ होते है ऐसे दृढ रिश्ते, जिनका कोई नाम नहीं होता, कोई परिभाषा नहीं होती,जबकि कुछ रिश्ते होते है सिर्फ नाम के ,संबोधन के ,जिनमे कोई अहसास नहीं होता .कुछ रिश्ते होते रक्त के तो कुछ होते अहसासों के जज्बातों के .कुछ रिश्तों के साथ जिंदगी का सफ़र होता सुहाना ,तो कुछ रिश्ते बोझ ढोते जिंदगी का .कोई रिश्ता हर पल तिल-तिल मरता तो कोई रिश्ता मर कर भी अमर हो उठता .किसी ने सच कहा है .."अगर देखना हो कि आप कितने अमीर हो तो अपनी दौलत को मत गिनना , अपनी आँख से आंसू गिरना ,और देखना कि कितने हाथ इसे समेटने के लिए आगे बढ़ते है ".
जितना बड़ा सामाजिक दायरा उतने ही ज्यादा हमारे रिश्ते ,जिसने रिश्तों का गणित समझ लिया उसे जिंदगी जीना आ गया .कुछ रिश्तों के साथ हमेशा कटु यादें जुडी होती है जबकि कुछेक के साथ अमृत के घूंट ........अब तक की अपनी जिंदगी में मैंने तक़रीबन हरेक प्रकार के रिश्ते का स्वाद चखा है और उसी आधार पर मेरा मानना है कि इंसान की जिंदगी में हर एक रिश्ता जरुरी होता है .....................क्योकि उसके आस-पास के रिश्तों से ही उसकी सोच निर्धारित होती है .सयुंक्त परिवार में तो ना जाने कितने संबोधनों वाले रिश्ते होते है अगर हर रिश्ते का बखान करने बैठ जाए तो पृष्ठ ही सिमट जायेंगे.
बस ,ऐसे ही खट्टे-मीठे रिश्तों का पिटारा है जिंदगी .आइये इस नए साल में हम प्रण ले कि अपने से जुड़े हर रिश्ते को हम मान देंगे और भूले-बिसूरे रिश्तों को फिर से स्नेह की गरमी देगे .तो जाइये फ़ोन लगाइए अपने बचपन के उस दोस्त को जिससे आपने पिछले १० वर्षो से बात नहीं की है,मनाइए किसी रूठे रिश्ते को या फिर आशीर्वाद लीजिये अपने गाँव के उस बुजुर्ग का ,जिसे आपने शहर में आकर कभी याद ही नहीं किया ..........नववर्ष की बधाईयाँ दीजिये अपने चचेरे,ममेरे ,फुफेरे भाई-बहनों को ................बुआ,दादी,ताई,चाची,नानी,मौसी और चाचा सभी को नया साल मुबारक कहे ...........क्योकि आज भी हमारे परिवार इतने एकल नहीं हुए है कि हम इन रिश्तों और इतने मीठे संबोधनों को ना पहचान सके और यकीं मानिये आपका मन एकदम हल्का हो जायेगा अपनों से अपनी बात करके और आपकी कुंजी भर जाएगी रिश्तो की अमूल्य निधि से ....................क्योकि जीवन की अनमोल निधि है रिश्ते .अंत में यही कहुगी
"रिश्ते पंछियों के सामान होते है
जोर से पकड़ो तो मर सकते है
धीरे से पकड़ो तो उड़ सकते है
लेकिन प्यार से पकड़ के रखो तो
जिंदगी भर साथ रहते है "

गुरुवार, 29 दिसंबर 2011

यादें

जिंदगी के चंद लम्हों का लेखा-जोखा है यादें 
तमाम खट्टे-मीठे संस्मरणों का एक चलचित्र है यादें 
यादें एक फूल है 
जिसकी खुशबू जीवन को महकाती है 
यादें एक मरहम है 
जो उभरे जख्मों को सहलाती है 
जीवन के सुख-दुःख का मिश्रण है यादें 
तन्हाई में किसी अपने का अहसास है यादें 
लेकिन कभी-कभी ;
अपनों के बीच से तन्हाई में ले जाती है यादें 
यादें एक टीस है 
जो जले पर नमक छिड़कती है 
यादें एक इतिहास है 
जो हर पल स्वयं को दोहराती है 
किसी अधूरे काम का आगाज़ है यादें 
आसुंओ को खिलखिलाहट में बदलती है यादें 
यादें एक कलम है 
जिससे जिंदगी परिभाषित होती है 
यादें अनुभवों की एक किताब है 
जिसके जरिये मंजिल हासिल होती है 
किसी अज़ीज़ का अहसास कराती है यादें 
सच्चे दोस्त की भांति साथ निभाती है यादें 
लेकिन कभी-कभी ;
कडवे अनुभवों के घूंट भी पिलाती है यादें 
यादें एक गीत है 
जो जीवन को मधुर बनाती है 
यादें एक बैशाखी है 
जो गिर-गिर के संभलना सिखाती है 
बचपन के मासूम संसार में ले जाती है यादें 
भूले-बिसूरे दिनों का स्मरण कराती है यादें 
लेकिन कभी-कभी ;
अपनों से दूर होने का गम भी दे जाती है यादें.......................

शुक्रवार, 23 दिसंबर 2011

भगवत गीता पर प्रतिबन्ध ?

भारत सदैव ही दुनियां का आध्यात्मिक गुरु रहा है , यहाँ के वेद-पुराण,पवित्र ग्रन्थ ,योग और देवी-देवता पुरातन काल से विश्व में चर्चा और शोध के विषय रहे है.वैसे तो सभी ग्रन्थ अपने-आप में पूर्ण है , लेकिन उन सबमे गीता का ज्ञान एक अलग ही दर्शन भारतीय संस्कृति को देता है.गीता धर्म का वो सरल स्वरुप है जो जीवन के वास्तविक दर्शन को सहज ही सिखा देता है ......ऐसे पवित्र ग्रन्थ पर प्रतिबन्ध लगाना वाकई चिंता का विषय है और इसे 'उग्रवादी ग्रन्थ ' करार देना तो तमाचा है हम भारतियों पर .
                    भगवत गीता हमारी अमूल्य धरोहर है ,सांस्कृतिक विरासत है ,अमर वाणी है सच्चाई की और सही मायनों में भारतियों की परिभाषा है .सम्पूर्ण मानव जाति के कल्याण का ग्रन्थ है गीता .गीता का ज्ञान उस वक़्त की कसौटी पर भी खरा था और आज के युग में भी उसके ज्ञान की सार्थकता पर कोई अंगुली नहीं उठा सकता ........ऐसे में उस पर प्रतिबन्ध लगाना और वो भी ऐसे देश और ऐसी संस्था द्वारा जो सदा से अपनी धार्मिक सहिष्णुता के लिए जाना जाता रहा है ,वाकई चिंता का विषय है .
                        गीता के अनुसार अन्याय करने वाला ही नहीं बल्कि अन्याय सहने वाला भी पाप का भागी होता है ,गीता जीवन के गूढ़ दर्शन को निहायत ही सरल शब्दों में प्रगट करती है ,तभी तो हम भारतीय गीता के इस मूल-मंत्र को गर्भ में पल रहे अंश-मात्र के कानो में भी डालते है ..........मुझे याद है अपनी गर्भावस्था में मैंने पुरे नौ महीने भगवत गीता का अध्ययन किया था ताकि गर्भ में पल रहे बच्चे पर इसका सकारात्मक प्रभाव पड़ सके.इसी बात से प्रमाणित हो जाता है कि हम भारतीय गीता का कितना सम्मान करते है .....इसके अलावा न्याय के लिए भी इसी पवित्र ग्रन्थ पर हाथ रखकर साक्ष्य लिया जाता है और सच बोलने को प्रेरित किया जाता है 
                                        माना कि इसका जन्मस्थान रणभूमि है ,हाथी की गर्जनाओं ,शंखनाद और ढाल-तलवारों की झंकारों के बीच जब यह गीता-ज्ञान अस्तित्व में आया तब युद्ध-भूमि के दोनों ओर लाखो की संख्या में सैनिक युद्ध को तैयार थे ........लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि यह 'उग्रवादी ग्रन्थ 'है बल्कि इसका उद्देश्य तो उग्रवाद का सही और निर्णायक अंत मात्र था ,भ्रमित बुद्धि को न्याय और सत्य का मार्ग दिखाना ही इस पवित्र ग्रन्थ का सार है .
                                      गीता-सार का अध्ययन या स्मरण मात्र मुझमे एक नई शक्ति का संचार कर देता है अब आप ही सोचिये जिसके सार तत्व में अथाह ज्ञान भण्डार है .....तो पूर्ण स्वरुप में तो विश्व का दर्शन और रहस्य समाया है . 

सोमवार, 19 दिसंबर 2011

दूनियाँ वाले

हम इतने भी बुरे ना थे 
जितना लोगो ने हमे बना दिया 
हम तो चाहते थे दूनियाँ को प्यार से जीतना ,
नहीं मालूम था कि .
खुद को ही हार जायेगे !
आये थे हम तो प्यार बाँटने 
लेकिन खुद ही बँट कर रह गए 
सोचा था  बुराई को  अच्छाई बना देगे 
नहीं मालूम था कि ;
खुद ही बुरे बन जायेगे !
चाहते थे लोगो के दिलों को रोशन करना 
लेकिन खुद ही अंधेरो में खोकर रह गए 
तकलीफ में हर किसी को दिया सहारा 
लेकिन अपने ग़मों में ,
सर टिकाने  हमे किसी का कंधा ना मिला 
दूसरो के पोंछते थे आंसू हम
लेकिन हमारे ही समंदर को कोई किनारा ना मिला !
लोगो को दिया करते थे दिलासे हम 
लेकिन ;
हमारे ही सब्र का बाँध हमी से टूट गया 
सबकी खुशियाँ बांटी , दुखो: में शरीक हुए 
लेकिन हमारी खुशियाँ किसी से देखी ना गई 
और ;
हमारे दर्द-ए-दुःख में लोगो ने हम से किनारा कर लिया !
सबकी महफ़िलों की शमां बने हम 
लेकिन;
हमारी ही महफ़िल किसी को रास ना आई 

शनिवार, 17 दिसंबर 2011

खो गया बचपन

"ये दौलत भी ले लो, ये शौहरत भी ले लो
मगर मुझको लौटा दो मेरे बचपन का सावन
वो कागज की कश्ती वो बारिश का पानी "

मशहूर ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह की ये पंक्तियाँ जीवन के उस खुबसूरत मोड़ की याद दिलाती है,जो आज के दौर के बच्चों की जिंदगी में आता ही नहीं......और शायद इसीलिए आज के बच्चे इन पंक्तियों की पीड़ा भी नहीं समझ सकते .
जिंदगी के इन सुंदर लम्हों से महरूम आज के बच्चे,बच्चे ही नहीं रहे . उनका बचपन खो गया है,इस व्यस्त दुनियां में , जहाँ सब तेजी से आगे बढे जा रहे है , किसी को किसी के लिए समय नहीं.........बिलकुल इसी तरह बच्चों को भी जल्दी से जल्दी बड़ा होना है.उन्हें नहीं मालूम कि वे क्या चीज़ खो रहे है . आज उन्हें माँ के आँचल की नहीं बल्कि बाज़ार में आये नए gadgets की तलाश है .रात को सोने के लिए माँ की लौरी नहीं बल्कि कानफोडू संगीत की जरुरत महसूस होती है . माना की आज के बच्चे शातिर दिमाक होते है , कंप्यूटर से भी तेज चलता है इनका दिमाक.......दो टुक बातों से समस्या का हल कर देते है ........कानों में headphone लगाये ये आज की पीढ़ी बड़ों की नसीहतों को अपने पास भी नहीं फटकने देती.....हमे नाज़ है उनकी समझदारी पर ......लेकिन हम उनके बचपन का भोलापन चाहते है .......उनकी मासूम बातें चाहते है जिसपर हम मर मिटे.......चाहते है वो खुबसूरत क्षण जो हमने तो जिए लेकिन हमारे बच्चे महसूस भी नहीं कर पाए. उनके पास तो समय ही नहीं है , बचपन के लिए , गली में खेलने के लिए , पेड़ पर चढ़ने के लिए , पतंग उड़ाने के लिए , गर्मियों की दुपहरी में गोला खाने के लिए , मेले में जाने के लिए , रामलीला में भरत-मिलाप देखने के लिए........................और भी ना जाने ऐसे कितने ही अनमोल पल है जो पीढ़ी दर पीढ़ी हम खोते जा रहे है .
वैसे देखा जाए तो इसमें गलती हमारी ही है ................क्योंकी हम खुद भी भोला बचपन नहीं चाहते , हमे चाहिए तेज , शातिर और कंप्यूटर से भी तेज़ दिमाक वाली पीढ़ी

निदा फ़ाज़ली ने बिलकुल सही फ़रमाया है
"बचपन के नन्हें हाथों को
तुम चाँद-सितारें छूने दो,
दो-चार किताबें पढ़कर
ये भी हम जैसे हो जायेगे "

सोमवार, 12 दिसंबर 2011

शंका

मन के एक कोने में
दुबक के बैठी ,
सहमी सहमी सी अपना वजूद बनाती
शंका.............................निराधार शंका !
खुशियों पर प्रश्न चिन्ह लगाती
करने....न करने की आपा-धापी में
और उलझाती,
दुखों को और बढाती ,
सुखों को संशय में डालती
शंका..............................निराधार शंका !
अपनों पर संदेह करवाती
परायों को और पराया करती
तरसाती ,
हलकी सी मुस्कराहट को , और
दिल खोलकर हँसने की लालसा को
शंका..............................निराधार शंका !
हर विश्वास को अविश्वास में बदलती
रिश्तों के फंदों में फंसाती
जिंदगी के चक्रव्यूह को उलझाती
सहायता लेने को झिझकती
तो सहायता देने में भी सहमती
शंका.............................निराधार शंका !
लेकिन यही शंका , कभी-कभी
आधार भी देती ,
सच्चाई को सामने भी लाती
और निराधार ना कहलाती
यह शंका......................सब तोड़ देती
तो कभी कभी
कुछ शायद जोड़ भी देती

शनिवार, 10 दिसंबर 2011

थोडा सा झूठ

चलो, खुशियाँ बांटें हम
किसी के उदास मन की परतें उतार
दबी मुस्कुराहट को ढूंढ़ लाये हम
आंसुओं को आँचल के मोती बना ले
हमदर्द बनकर
किसी के दुखों को बाँट ले हम
चलो, बांटते है खुशियाँ आज हम और तुम
जिंदगी की आप-धापी से बाहर निकले
दिमाक से नहीं,
थोडा दिल से सोचे
बेसिर-पैर की बातों को ऊपर से गुजर जाने दे
नासूर बने किसी के घावों को
स्नेह का मरहम लगाये हम
अपनों को पराये बनते देखकर भी
मुस्कुराएँ....................................
और हाथ बढ़ाये .....आओ
चलो, परायों को भी अपना बनायें हम
अपनी खुशियों को कुछ यूँ बिखराएँ
कि ;
फिजा की फितरत बदल जाए
हवा में खुशबू बिखर जाए
पतझर में बसंत आ जाए
खुशियों का इन्द्रधनुष खिल जाए
चलो, खुशियाँ बाँटते है हम
माना कि.....
झूठ बोलना पाप है
लेकिन ग़र,
चोट पहुंचाता है सच
छलनी कर देते है दिलों को सत्य वचन
तो ;
टूटे दिलों को जोड़ते है
चलो, थोडा सा झूठ बोल आते है हम और तुम

गुरुवार, 8 दिसंबर 2011

नानी बाई को मायरो

' नानी बाई को मायरो ' राजस्थान की भोत ही प्रसिद घटना म स एक है.जूनागढ़ क नरसी भक्त की लाडली और बीरा ब्रह्मानंद की ' नानकी ' की कहाणी ह या.नरसी जी खूब धूमधाम स घणो दायजो देक आपरी चिड्कली न परणाई. पर, दिनमान कै बेरो के लिख राखी थी,नरसिजी आपकी ५६ करोड़ की संपदा दान देकै मोड़ा होगा. बठिण नानीबाई क गोद म कुलदिपिका आई.सासरा हारला न या बात चोखी कोणी लागी और बे नानीबाई न सतावै लागा.आश्रम म नर्सिजी को बेटो अकाल क चालता काल को ग्रास बनगो.नानीबाई बीरां क खातर राखी ली थी पर या बात सुणकर बाई को कालेजो फाटन लागगो......पर विधि क विधान क आगै कोई की ही कोणी चाल,बा राखी नानीबाई कृष्णजी क बांध दी. इ तरिया नरसिजी कृष्ण भक्ति म रमगा और नानीबाई गृहस्थी म.
समय बितन क सागै नानीबाई की लाडली कुंवरी को ब्याव मांड दियो.सासरा हरला मायरा खातर भोत बड़ी-बड़ी फ़रमाइश कर दी और सोच्या क इतो बड़ो मायरो भरणे की नरसिजी की औकात कोणी और बे ब्याव म कोणी आवगा,पर नरसिजी तो मायरो भरणे की सारी जवाबदारी आपक सावरिया न सोप क नचिता होगा और कुहा दियो क मैं ब्याँ म जरुर आउंगो.नानीबाई की आंख्या म ख़ुशी का आंसू झरै लागा .
बठिण नरसिजी आपकै मोड़ा साथिया न लेक मायर खातर चाल पड़ा.रस्ता म गाड़ी को पहियों निकल्गो तो कृष्णजी खाती क रूप म आक पहियों ठीक कर दियो और बोल्या मैं भी सागै चालूगो.जद नरसिजी बाई क घरा गया तो सासु-सुसरा बाई स मिलन कोणी दिया और बोल्या की पैली मायर को जाबतो करो फैर ही मिलल्यो.नानीबाई खून का घूंट पीकै रहगी,रो-रोक जी भर लाई और बोलती भी तो के ...................? क्युकी राजस्थान की बेटी म तो ये संस्कार ही कोणी होवै.सासु कह्यो की तेरो मोड़ो बाप मायरो नहीं लावगो तो तनै भी बाकै सागै पाछी भेज देवांगा.नानीबाई सोच्यी की मैं मर जाउंगी पर पाछी कोणी जाउंगी और मरणे खातर कुंए प चलगी क्युकी बिन बैरो हो की भात भरण हारलो बीरों तो कदको ही स्वर्ग सिधारगो और बापूजी कनै तो कुछी कोणी.कुंए म गिरण हाली ही थी की कृष्ण आकै पकड़ ली और बोल्या की थारो राखी को फ़र्ज़ नीभान मैं आउंगो थारो मायरो लेक.कयांकी होगी बा घडी जद कृष्णजी भाई बनकर नानीबाई क सामने खड़ा हा ......मैं तो सोचकर ही रोमांचित होऊ हु .
नानीबाई का तो जैया पग ही धरती प कोणी पडे हा आखिर बीरां रूप म कृष्ण जो मिल्यो थो. चुनडी ओढ़न को सपनो संजो क नानीबाई को मन गावै लगो
बीरों भात भरणे आवगों
संग रुकमणी भोजाई न लावगो
बठिण,नरसिजी दुखी मन स नटवर नागर न बुलान खातर अरदास कर लागा.भगत की अरदास सुण क कृष्णजी आया और बोल्या की नानीबाई म्हारी बहन है मैं चलुंगो मायरो लेक
सुबह नानीबाई क द्वार नरसिजी और बांका नटवर नागर मायरो लेक आया. पूरै गाँव की आंख्या चार होगी की इयाकों मायरो न कदै आयो और न कदै आवगों , जुग-जुगा तक इ मायर की कहाणी कही जावगी. सासर हरला की जबान बंद होगी , गाँव वाला ठगा सा रहग्या और नानीबाई .............................बा तो मन्त्र-मुग्ध थी आपकै सांवरसा बीरां और रुकमनी भोजाई प . नरसिजी भी धन्य होगा कि सांवरो लाज रख दी ,जिंदगी भर कि भक्ति को फल दे दियो .नानीबाई बीरां-भोजाई क टीको काढो,आरतो करो और फेर आई बा घडी जद जगतकर्ता एक साधारण सो बीरों बनकर बहन न चुनडी ओढाई,पूरा ३६ करोड़ देवी-देवता अचंभित था सृष्टिकर्ता कि इ कृष्ण-लीला प .................विलक्षण थी बा घडी ....कल्पना मात्र स ही रोंगटा खड़ा होवै है. धन्य है नरसी भक्त और किस्मत वाली है नानीबाई और बहुत खूब घणो चोखो है ५६ करोड़ को मायरो भरण हारलो थारो,मेरो,और आपणै सबां को सवारियों ........अयाकां भगत और भगवान न मेरी घणी-घणी खम्बा घणी .

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

यात्रा

मैंने अपने जीवन में बहुत सी यात्राये की है,कई मनोहारी दृश्यों को अपने कैमरे में ही नहीं बल्कि अपने दिल में भी उतारा है.उनकी स्मृतिया आज भी मेरे मानस पटल पर अंकित है,लेकिन जो यात्रा मुझे सबसे अधिक आनंदित करती है वो है मेरे पैतृक स्थान 'राजस्थान' की यात्रा.
हर साल राजस्थान की यात्रा होती है ,फिर भी मालुम नहीं क्या है वहां की मिटटी में जो मेरी हर यात्रा को भीनी खुशबू से भर देती है.मेरा पैतृक स्थान है झुंझुनू ,जो सिर्फ पर्यटन की दृष्टि से ही नहीं बल्कि देश के कई होनहार-विरवानो की जन्मभूमि है.मुंबई में रहने के बावजूद अपने पैतृक स्थान की यात्रा करने के किसी भी मौके का मै लोभ-संवरण नहीं कर पाती .मेरी लोभ-पिपासा ही है की हर साल भयंकर गर्मी में राजस्थान पहुँच जाती हूँ.तब लगता है की सूर्य देवता ने अपनी सारी किरणों को इसी राज्य में भेज दिया हो और ओजोन परत का छेद भी यही है.लेकिन लू के थपेड़े भी हमें रोक नहीं पाते.
पुरे साल इस यात्रा का इंतज़ार रहता है और यात्रा पूरी होने पर अगली यात्रा की तैयारी.मुंबई जैसे शर की आधुनिकता ,बनावटीपन और औपचरिकताओ के बीच मेरा गावं एक बरगद की छावं है .सच है
शीतल बयार
ठंडी छाया
निश्छल प्यार
कितना कुछ पाया
मैंने मेरे गाँव में .
मेरी यात्रा की शुरुआत होती है 'गणगौर एक्सप्रेस 'से .मुंबई सेंट्रल पर हम इस रेलगाड़ी में बैठते है.महसूस होता है कि पूरा राजस्थान कई पहियों पर चल रहा हो .अपने लोग,अपनी भाषा और अपने खाने का स्वाद नथुनों में भर जाता है.सभ्य लोगो कि तरह हंसने के लिए मुश्किल से खुलने वाले होंठो कि जगह खुल के लगाने वाले ठाहाको ,माहौल में अपनापन भर देते है ,कोई औपचारिकता नहीं ,कोई नपा-तुला व्यवहार नहीं,बस सिर्फ ख़ुशी अपने पैतृक स्थान को देखने की.हम सब अपने अनुभवों को बांटने लगते है ,कोई सालासर बालाजी जा रहा है तो कोई श्याम बाबा के चरणों में धौक देने ,किसी को रानिसती दादी का बुलावा आया है तो किसी के पीहर में भतीजा हुआ है,किसी के भाई को सेहरा बंधेगा तो किसी की बहन डोली में बैठेगी ,हजारो बहाने है हम मारवाड़ियों के पास ,अपनों को अपने गाँव बुलाने के
छुक-छुक गाड़ी सरहदे पार करती है ,महारास्ट्र,मध्यप्रदेश और फिर राजस्थान .खिड़की के बाहर के दृश्य बताने लगते है की हमारा राजस्थान आ गया और स्वत:ही 'पधारो म्हारे देश'के शब्द कानो में गूंजने लगते है .पास के केबिन से आते मारवाड़ी गाने मानो अमृत घोल देते है.३५ की होने के बावजूद मेरा मन बच्चो की तरह झुमने लगता है ,खिड़की के पास वाली सीट पर पूर्णतया अपना कब्ज़ा जमा कर बैठ जाती हूँ .चमकीली तेज़ धुप ,रंग-बिरंगे परिधान ,सूखे पेड़ ,छोटे-छोटे घर ,रेल के पीछे हाथ हिलाते बच्चे ,चारो तरफ रंग ही रंग .
रेलयात्रा ख़त्म होती है,हम जयपुर पहुँच जाते है .सफ़र में साथी यात्रियों से विदा लेते है .मुझे स्टेशन का नज़ारा खुबसूरत लगता है ,हालाँकि बच्चो को यह बेसिर-पैर के लोगो की भीड़ लगती है,लेकिन
आजकल के बच्चे क्या जाने अपनी मिटटी की परिभाषा ............
लेकिन मेरा पड़ाव गुलाबी नगरी नहीं,मुझे एक और रेल पकड़नी है.हम जल्दी से गाड़ी में बैठते है और में पुनः सीट के पास बैठ जाती हूँ .बच्चे ढेर सारी शिकायते करने लगता है कि ऐ सी नहीं है taxi में चलेगे,यह तो रेलगाड़ी नहीं बैलगाड़ी है और में मुस्कुरा कर कहती हूँ 'adjust करो'.वो गुस्से में बैठ जाते है और मेरा मन उन्मुक्त उडान भरने लगता है .हाथ हिलाते बच्चे ,धुल उड़ाती आंधी,भागते हुए कीकर के पेड़ ,मुझे मेरे बचपन की यात्रा करा लाते है .चार घंटे के सफ़र में मै मेरा बचपन जी लेती हूँ .शाम को करीब ६ बजे हम झुंझुनू पहुचंते है.गोधुली बेला की चमकती हुई बालू रेत मुझे गर्वित होने का मौका देती है और मेरी आँखे भी चमक उठती है .पापा हमें लेने आते है ,नानाजी को देखकर बच्चे भी खिल उठते है .में खुश होती हूँ क्याकि में १५ दिन की छुट्टी पर हूँ पहले यह छुट्टीया १ महीने की हुआ करती थी.इन १०-१५ दिनों में में बच्चो को गाँव की पृष्ठभूमि से अवगत करना चाहती हूँ पर बच्चो की कोई दिलचस्पी नहीं .हम विश्व प्रसिद रानिसती का मंदिर देखने जाते है,जो अपनी बेजोड़ स्थापत्य कला का नमूना है ,तीन चार चौक की हवेलिया देखते है ,जिनमे से कुछ अभी सांस्कृतिक धरोहर है ,बावड़ियाँ कुएं ,किले और एसे ही कई एतिहासिक स्मारक अपनी मूक गाथा कहते प्रतीत होते है .मुझे अभिमान महसूस होता है इन्हे देखकर .
१५ दिन पंख लगाकर निकल जाते है और हम अपनी मुंबई यात्रा पर .मुझे लगता है कि मेरा बचपन ,मेरा वजूद मुठी में से रेत कि तरह निकल गया.नाम आँखों से १५ दिनों की यादें सहेज कर मै लौट आती हूँ अपनी गृहस्थी में.सुकून के पलों मै जी लेती वो लम्हे जिन्हें मैंने सहेजा है अपनी ही यादों के पिछवाड़े में .पक्षियों को उड़ाते देखती हूँ तो मेरा मन कहता है
अबके लाना तो मेरे शहर की मिटटी लाना
इससे बेहतर कोई तोहफा कोई सौगात नहीं.
ब्लॉग पर पहली पोस्ट को लेकर बहुत रोमांचित हु.......