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संदेश

हिंदी

आज विश्व हिंदी दिवस है ......हिंदी की बढ़ती लोकप्रियता हमे खुश कर देती है...सच में...दिल से खुश। पर एक बात कहूँ.....हमारे देश में ऐसे बहुतेरे नमुने अब भी है जो अंग्रेजी को इंटैलीजेंसी से तोलते है 🤦🤦🤦          हिंदी को लेकर मेरे पास कई किस्से है जो सच में हिंदी से मेरे प्रेम को बढ़ा देते है।एक दो किस्से आप लोगो से शेयर करना चाहूँगी..... 1. उस वक्त शायद मैं 10वीं कक्षा में थी....हिंदी मीडियम की लड़कियों की सरकारी स्कूल में पढ़ती थी । हम सब स्कुल की तरफ से समर ट्युर पर जाना चाहते थे क्योकि दूसरी एक और स्कुल अपनी छात्राओं को ऐसे ट्यूर कराती थी। सबने मिलकर तय किया कि प्रिंसिपल के पास जाकर बात की जाये और उन्हे प्रार्थनापत्र दिया जाये। प्रार्थनापत्र लिखा मैंने 😎😎 और मुझे मिलाकर चयनित पाँच छात्राएं प्रिंसिपल से बात करने गयी। हमने उन्हे सबसे पहले ऐप्लिकेशन थमा दी ( यहाँ बता दूँ कि उस सेशन की हमारी वो प्रिसिंपल बड़ी सख्त मिजाज थी ) और डरते हुए हम पाँचों उनके रियेक्शन देखने लगी। उन्होने उसे पढ़ा और नाक पर गिरे चश्मे से हमे घूरते हुए पूछा कि ऐप्लिकेशन किसने लिखी है?  ...

चल चले

हम साल के अंतिम दो दिनों में है......ये साल इतनी उहापोह लेकर आया कि हम कब से इसे अलविदा कहना चाह रहे थे , लेकिन हमारे चाहने से कहाँ कुछ होता है। सब कुछ नियत समय पर ही होना तय रहता है तो यह इस साल की सबसे बेहतरीन सीख रही कि वक्त की मार के आगे सब प्लानिंग फेल है। घुमक्कड़ी वाले दिन जैसे रफादफा हो गये , सब अपने ही घरों में सिमट गये हालांकि अब खौफ इतना नहीं रहा लेकिन बेवजह का घुमना अब गायब है और हमारी हँसी ये मुआ मास्क खा गया ।                 हर साल की तरह ये जाने वाला साल भी यही बता कर जा रहा है  कि हर वो चीज जो पा गये...क्षणिक रही, उसे पाने की खुशी क्षणिक रही....और जो न मिला वो हमेशा प्रिय रहा, स्थिर रहा, अलौकिक रहा,निरंतर रहा। गैरजरूरी चीजों को जरुरी समझने वाले हम सब उलझे रहे गैरजरूरी फंदों में और उधेड़ते रहे जिंदगी के लम्हों को....इस साल ने अहसास कराया कि वास्तव में जरुरी क्या है....इसने सीखाया लचीलापन,इसने सीखाया प्राप्य की अहमियत, इसने सीखाया कि बेसिक नीड आज भी हमारी रोटी कपड़ा और मकान ही है लेकिन हम और अधिक के पीछे भागते रहे...

साढ़े पांच मीटर

सुनो लड़कियों तुम अगर थोड़ी कम लंबी हो  तो मैं तुम्हे लंबा दिखा सकती हूँ थोड़ी ज्यादा ही लंबी हो तो संतुलन बना सकती हूँ अगर थोड़ी सी मोटी हो, तो चिंता न करो कतई मैं तुम्हे पूरी तहजीब से तराश दूँगी ग़र पतली हो कुछ ज्यादा ही तो तुम्हारी दिखती हड्डियों को  बड़ी ही कुशलता से छुपा दूँगी बाकी रंग की तुम फिक्र ना रहो गोरी हो चाहे काली तुम बेमिसाल हो लेकिन सुनो छोरियों बेमिसाल हूँ मैं भी मैं पहचान हूँ मैं पूरी की पूरी संस्कृति हूँ मैं जादू हूँ जो किसी को भी जादुई बना दे मै कशिश हूँ मैं नशा हूँ मैं कमसिन हूँ मैं खूबसूरत हूँ यूँ तो मैं साढ़े पाँच मीटर का  महज एक कपड़ा हूँ पर इस कपड़े मे समेट लेती हूँ इस पूरे देश की  हर प्रांत की हर घर की सारी बातें दादी नानी और माँ की खुशबू बसी है मुझमे और सुनो लड़को मुझमे है एक आँचल भी जिसकी छांव तले तुम सब सुस्ताए हो जानते हो कौन हूँ मैं मैं साड़ी हूँ फैशन के इस दौर में गर्व से खुद पर इतराती हाँ....मैं साड़ी हूँ 

सुबह का जश्न

वो स्याह अंधेरा था फिर उसमे हल्की सी एक रेखा बनी ज्यादा चमकीली नहीं बस, धुंधली सी स्याह रात जो अब बैंगनी होने लगी उस बैंगनी में छुपा था चटख सिंदूरी जो हल्के नीले के ऊपर बिछा था वो बैंगनी,सिंदूरी को चुमता हुआ अलविदा कह गया रह गया पीछे से थोड़ा सा गुलाबी गहरी लाल नारंगी धारीयों के साथ इठलाता हुआ स्याह रात बैंगनी के साथ गुलाबी भी ले गयी अब रह गया सिंदूरी सिंदूरी आसमान .......अलौकिक, अद्भुत सुरज की अगवाई में सजा सा लंबी धारीयों के रुप में तोरण सा सजा हुआ नन्हे पक्षीयों के कलरव के साथ नीला रंग सिंदूरी के साथ ताल मिलाने लगा दोनो रंग , एक दूजे में रंगे दूर तक फैल गये सामने वाले पहाड़ की चोटी के थोड़ी बांयी ओर से सूरज ने ताका झांकी की जब आश्वस्त हुआ अपनी सज्जा, अगुवाई देखकर तो आहिस्ता से पूरा ऊपर आया आसमान जैसे नहाया सिंदूरी से पक्षी खुशी मनाने लगे पेड़ों के पत्ते गहरे हो गये पहाड़ मुसकाने लगे पता है.... प्रकृति हर रोज  ऐसा ही जश्न मनाती है हमे लगता है कि  सूरज तो हर रोज उगता है  लेकिन हम नहीं जानते हर सुबह कितनी मिन्नतों के बाद  उम्मीदें लिये आती है तुम कभी किसी पहाड़ के पीछे से ...

हमारा दिन

कल पुरुष दिवस था....बिल्कुल चुपचाप शांती से गुजर गया। न कोई हंगामा , न कोई बिग डील, न पार्टी शार्टी, न दनदनाती पोस्ट और न ही डिस्काउंट की बौछारें ।          कभी गौर करके देखियेगा अपने आस पास के पुरुषों को ,वे आज भी व्यस्त ही होंगे और कल भी व्यस्त ही थे , खुशी से उठायी हुई जिम्मेदारियों को पूरी करने में। उन्हे तो पता भी नहीं रहता कि महिलाओं की तरह उनका भी दिन मनाया जाता है । भुले भटके अगर कोई उन्हे विश कर भी दे तो शायद भीतर ही भीतर लजा जायेगे वो भी एक स्त्री की तरह।            हर पुरुष में एक स्त्री अंश होता है और हर स्त्री में एक पुरुष अंश.....और ये दोनो एक दूसरे के साथ ही संपूर्ण होते है । दोनो ही ईश्वर की बेहतरीन कृति है । न कोई कम है न कोई ज्यादा... दोनो एक दूसरे के पूरक है। हमे बिल्कुल ऐसी ही व्यवस्था की जरुरत है....जहाँ सद्भाव हो समभाव हो, एक दूसरे के प्रति सम्मान हो। एक दूसरे से ऊपर जाने की जद्दोजहद में हम पूरी व्यवस्था ही बिगाड़ देंगे ।      महिला दिवस पर अपने ही मेल साथियों से उपहार प्राप्त करने वाली हम महिलाएं...

विकल्प

विकल्प हमेशा ऐसा ही होता है जब चाहो  साथ रखो जब चाहो  नजरअंदाज करो प्रश्नपत्र में जब देखती थी ऐसा तो उस प्रश्न का औचित्य कभी समझ नहीं पायी जो सरल होता था उसका चयन कर लिया जाता था और दूसरे को  कठिन समझकर नजरअंदाज अब भी जब अपने आइपेड की डिजिटल की पैलेट में  रंगों के सैकड़ों विकल्प देखती हूँ मैं उलझ जाती हूँ उनमे और अधिक.... और बेहतर.... और खूबसूरत.... जबकि कागज पर  अपनी रंगों की छोटी सी पैलेट में भी सिर्फ तीन या चार रंगों के समायोजन से मै दुनिया रंग देती हूँ फिर अक्सर सोचती हूँ विकल्प ही ना हो तो ?  वो कहावत है न कम सामान सफ़र आसान बिल्कुल ऐसा ही है ज्यादा विकल्प ज्यादा उलझन  बस..... अब मैं विकल्पों को नहीं तलाशती क्योकि.... जो प्राप्त है वही पर्याप्त है 

दो सितारें

मेरे आसमां में दो सितारें रहते है जो , हर पल मुझ पर नजर रखते है जब खुश होती हूँ तो वो भी , कुछ अधिक चमकीले होकर टिमटिमाते है जब कुछ उदास होती हूँ तो अपनी छावं तले मुझे सहलाते है मेरे दर्द को मरहम का लेप लगाते है वो सितारें हर क्षण मेरे साथ रहते है मैं बेफ़िक्री को जीती हूँ वो हरदम मेरी परवाह में रहते है मेरा आसमान रोशन है इन दो तारों से अब चाँद न भी हो तो  कोई गम नहीं...... ये दोनो मेरे सूरज चाँद से कम नहीं  ये घनघोर अंधेरी राहो पर  झिलमिलाती उम्मीद का वो छोर है जो सदा मेरे साथ है ये छोर हमेशा जुड़ा रहेगा, जोड़ता रहेगा ये बुनता है विश्वास को  अटूट साथ को जो न होकर भी होने में है ये दोनो सितारे मेरी माँ है