सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

संदेश

वो बच्ची

वो बच्ची.... दद्दू उसे बुलाती रही गलत उसकी नजरों को भांपती रही ताड़ती थी निगाहे उसे तार तार वो होती रही कातर नजरे गुहार लगाती रही शर्मसार इंसानियत रपटे लिखाती रही धृतराष्ट्र...

हिमा

तुम उड़ान भरो पंखों में अपनी जमीनी खुशबू लेकर उड़ो सातवें आसमान के भी पार उड़ो तुम उड़ो पाँवों में बाँध कर घूंघरूँ अपनी कामयाबियों के और उड़ती रहो.....लागातर...बिना थके...अनवरत तुम भा...

स्नेह की आँच

लगभग दो ढ़ाई महिने पहले मिल कर आई थी माँ (दादी) से। बहुत कमजोर लग रही थी और इस बार जैसे हिम्मत भी हार गई हो....बिल्कुल टुटी हुई। मेरी आँखे तब भी भर आई थी और अपने घर आने के बाद भी, उन्हे ...

आर्टिकल 15

कल आर्टिकल 15 देखी....मनोरंजक फिल्मों से बहुत अलहदा, यथार्थवादी फिल्म। पूरी फिल्म झंझोड़ कर रख देती है...फिल्म के संवाद तमाचे से मारते है....कितने ही दृश्यों में मुझे अपनी आँखों मे...

तृप्त धरा

कभी देखा है ध्यान से इन रिमझिम बरसती बुंदों को कभी महसूस किया है धरा के तृप्त मन को यूँ तो आसमाँ धरती से मिल नहीं सकता बस, एक भ्रम होता है उनके मिलन का दूर कही क्षितिज में लेकि...

दरख़्त

मेरे घर के सामने एक दरख्त है सालों से देख रही हूँ एक मौसम आता है जब उसके सारे पत्ते उसका साथ छोड़ जाते है श्रृंगारविहिन सा वो पेड़ फिर भी खड़ा रहता है बदलते मौसमों के सफर में भी न...