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दिल वर्सेस दिमाग

उस रात वो बहुत रोयी थी
कोई ठोस कारण नहीं था रोने का
पर कभी कभी 
होता है ना
मन अचानक से भर आता है
आँखे जैसे बगावत कर जाती है
आपके सेंस ऑरगन 
आपकी मर्जी के बिना 
स्वतः ही संचालित होने लगते है
आप आँखों को झरने से रोकते है
बार बार अन्तर्मन में गुंजती एक आवाज
आपके न चाहने के बावजूद
आपके कानों में घुलती रहती है
आपकी उपरी परत 
एक अपनत्व से पुलकित होती रहती है
एक खुशबु आपकी पैरहन को
ताउम्र महकाती रहती है
हर वो चीज होती रहती है
जो आप नहीं चाहते
आपका मस्तिष्क भी नहीं चाहता 
क्या सच में दिल, दिमाग पर भारी होता है ?

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