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न कदापि खंडित:

न कदापि खंडित
ऐसा नहीं है कि , मैं
कभी टूटती नहीं
इंसान हूँ फौलाद नहीं
खंड खंड बिखरती हूँ
लेकिन फिर
कण कण निखरती हूँ
और कहती हूँ खुद से
न कदापि खंडित
क्योकि 
खंडित तो ईश्वर भी नहीं पूजे जाते
निष्कासित कर दिये जाते है
अपने ही घर से
प्रवाहित कर दिये जाते है बहती धार में
फिर मैं तो इंसान हूँ 
जीवन की मझधार में
हर बार अपने वजूद के प्रवाह के पहले
मुझे जुड़ना होता है
खुद पतवार बनना होता है 
ये सच है कि, मैं खंडित होती हूँ
कुछ बातों से, जज्बातों से
आपदाओं से, विपदाओं से
लेकिन ठीक उसी वक्त
मुझे ईश्वर की खंडित प्रतिमा
किसी मंदिर के आँगन में
एक कोने में रखी मिलती है
या फिर दिखती है
नदी के साथ
सागर समागम को जाती हुई
मुझे न अपना निष्कासन चाहिये
ना ही मंजूर मुझे अपना विसर्जन
बस....
अपने टुकड़ों को समेटती हूँ
पहले से मजबूत जुड़ती हूँ
और कहती हूँ
जब तक प्राणों में सांस है
न कदापि खंडित:

टिप्पणियाँ

Ravindra Singh Yadav ने कहा…
नमस्ते,

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में मंगलवार 18 अगस्त 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!



बहुत सुन्द्र आत्म विश्लेषण।
Kamini Sinha ने कहा…
सादर नमस्कार ,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (18 -8 -2020 ) को "बस एक मुठ्ठी आसमां "(चर्चा अंक-3797) पर भी होगी,आप भी सादर आमंत्रित हैं।
---
कामिनी सिन्हा
Ananta Sinha ने कहा…
आदरणीया मैम,
बहुत ही सुंदर और सशक्त कविता। आपकी रचना सुदृढ़ आत्मबल और जीवन को हर कठिन परिस्थिति में डटे रहने का बहुत ही सुंदर सन्देश देती है। न कदापि खंडित। हृदय से आभार।
Punam ने कहा…
ख़ूब हैं आप
आत्ममुग्धा ने कहा…
इतने सुंंदर शब्दों से मेरा उत्साहवर्धन करने के लिये दिल से शुक्रिया
आत्ममुग्धा ने कहा…
शुक्रिया पूनम
मन की वीणा ने कहा…
वाह!
मुग्ध कर गईं आपकी ये अभिव्यक्ति आत्म मुग्धा जी सच खुद का कतरा कतरा बटोर के बढ़ना ही जिंदगी है ,वर्ना विसर्जन निश्चित है।
अद्भुत।

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