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भाषा

नहीं जरुरत है हमे किसी भाषा की
या फिर किसी लिपि की
मत ईजाद करो कुछ तौर तरीके
किसी के दिल में घर करने को
आँखों को पढ़ने के लिये
तुम्हे कुछ सीखना नहीं पड़ेगा
नहीं जरुरत गहन विश्लेषण की
नहीं जरुरत भाषाई सुंदरता की
समझो....... कि हम मे से कोई भी
मोहताज नहीं है शब्दों के
संवेदनशील है हम मुक रहकर
मौन को जी कर
सच कहती हूँ.....
जरुरत नहीं है हमे किसी भाषा की
किसी लिपि की
तुम बस मुस्कुराया करो
खिलखिलाया करो
और कभी मन करे....तो
दो आँसु बहाया करो
इनकी कोई लिपि नहीं होती....फिर भी
हर भाषाई जानकार समझ जाता है इन्हे
ये मानवता की भाषा है
तुम बस इसे समझना सीखो
और हाँ.....
तुम चित्र बनाना सीखो
नृत्य सीखों, घूंघरुओं को बजाओ
या सीखो कोई ऐसी कला
जो नहीं बँधी हो भाषा के दायरों में
यह एक अनुभूति है
जो भाषाओं की दुनिया में
भाषाओं से परे
भाषाओं से कही उपर है
उन अनुभूतियों में हम सब एक है
एकांत है

टिप्पणियाँ

kuldeep thakur ने कहा…

जय मां हाटेशवरी.......
आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
आप की इस रचना का लिंक भी......
01/09/2019 रविवार को......
पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
शामिल किया गया है.....
आप भी इस हलचल में......
सादर आमंत्रित है......

अधिक जानकारी के लिये ब्लौग का लिंक:
http s://www.halchalwith5links.blogspot.com
धन्यवाद
आत्ममुग्धा ने कहा…
जी शुक्रिया आपका
जी नमस्ते,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (01-09-2019) को " जी डी पी और पी पी पी में कितने पी बस गिने " (चर्चा अंक- 3445) पर भी होगी।


चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
आप भी सादर आमंत्रित है
….
अनीता सैनी
Alaknanda Singh ने कहा…
भावों के ल‍िए भाषा की बाध्यता हो ही नहीं सकती... बहुत खूब ल‍िखा है आपने ...
आत्ममुग्धा ने कहा…
शुक्रिया आपका
आत्ममुग्धा ने कहा…
सराहना के लिये धन्यवाद
कविता रावत ने कहा…

सीखना ही है तो मानवता की भाषा सीखो ...
सच आज इसी की तो भारी कमी है दुनिया में
बहुत सुन्दर

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