मैं पुकारती हूँ तुम्हे
पर वो पुकारना शुन्य में विलिन हो जाता है
जब भी दर्द में होती हूँ
किसी को न दिखने वाले मेरे आँसू
छलकना चाहते है तेरे आगोश में
पर वो जज्ब नहीं हो पाते तेरे आँचल में
और भटकते रहते है मुझमें ही
तलाशते रहते है एक कोना अंधेरा सा
एक काँधा अपना सा,
लेकिन बेबस हो बह जाते है अंदर की ओर ही
सिमट जाते है मन के एक रिक्त कोने में
कभी कभी वो कोना स्पर्श चाहता है तुम्हारा
नमी चाहता है अपनेपन की
बारिश चाहता है प्यार की
धुप चाहता है खिली खिली सी
पर जानती हूँ मैं....तुम नहीं हो यहाँ
रिक्त ही रहेगा वो कोना अब हमेशा
अब मेरे सिर पर नहीं है वो दो हाथ
जो मुझे बेफिक्री का अहसास कराते थे
जबसे तुम गई हो ..... माँ
पिछले पाँच सालों में भुरभुरी सी हो गई हूँ
बिना जमीं का एक पौधा रह गई हूँ
पर माँ मैं बरगद बनना चाहती हूँ
अपनी जड़ों को भुरभुरी सी मिट्टी में
गहरे तक फैला देना चाहती हूँ मजबूती से
ताकि कोई भी तुफान
अब मुझे हिला न सके
तेरा न होना भी कभी कभी
मुझमे रक्त संचार सा करता है
अब तेरे सच की राह मुझे आसान लगती है
अक्सर तू मुझ में समाहित हुई सी लगती है
हर रोज सुबह की सैर मुझे पूरे दिन के लिये शारीरिक मानसिक रूप से तरोताजा करती है। सैर के बाद हम एक भैयाजी के पास गाजर, बीट, हल्दी, आंवला ,अदरक और पोदीने का जूस पीते है, जिसकी मिक्सिंग हमारे अनुसार होती है। हम उनके सबसे पहले वाले ग्राहक होते है , कभी कभी हम इतना जल्दी पहूंच जाते है कि उन्होने सिर्फ अपना सब सामान सैट किया होता है लेकिन जूस तैयार करने में उन्हे पंद्रह मिनिट लग जाते है, जल्दबाजी में नही होती हूँ तो मैं जूस पीकर ही आती हूँ, वैसे आना भी चाहू तो वो आने नहीं देते , दो मिनिट में हो जायेगा कहकर, बहला फुसला कर पिलाकर ही भेजते है। उनकी अफरा तफरी और खुशी दोनो देखने लायक होती है। आज सुबह भी कुछ ऐसा ही था, हम जल्दी पहूंच गये और उन्होने जस्ट सब सैट ही किया था , मैं भी जल्दबाजी में थी क्योकि घर आकर शगुन का नाश्ता टीफिन दोनों बनाना था। हमने कहां कि आज तो लेट हो जायेगा आपको, हम कल आते है लेकिन भैयाजी कहाँ मानने वाले थे । उन्होने कहा कि नयी मशीन लाये है , आपको आज तो पीकर ही जाना होगा, अभी बनाकर देते है। मुझे सच में देर हो रही थी लेकिन फिर भी उनके आग्रह को मना न कर स...
टिप्पणियाँ
बहुत सुन्दर रचना ... दिल को छूती हुयी ...