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पिता

पिता
सिर्फ पिता होते हैं
एक समय में
एक ही किरदार होते हैं
वे पूरी तरह से
सिर्फ पिता होते हैं
वे पिघल के
बरसते नहीं हैं
बहुत कुछ सहते हैं
लेकिन 
कभी कुछ भी 
कहते नहीं हैं
पिता
सिर्फ पिता होते हैं
उन्हे लोरी नहीं आती
सुलाने को
लेकिन
बातें सार्थक आती हैं
आँखें खोल
दुनियाँ दिखाने को
माँ मारती हैं
धरती को
जब ठोकर खाकर गिर जाते हैं
लेकिन 
पिता....
ठोकर खाकर सँभलना सीखाते हैं
वे मौन रहते हैं
हमारे सपने सजाते हैं
आँखों में अपनी
भविष्य हमारा 
बुनते हैं
पिता 
सिर्फ पिता होते हैं
जीवन भर
एक ही किरदार
में होते हैं
लेकिन 
जब हाथ छोड़ 
चली जाती हैं 'माँ'
तो 
ये पिता
माँ भी बन जाते हैं 

टिप्पणियाँ

Digvijay Agrawal ने कहा…
आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" रविवार 16 जून 2019 को साझा की गई है......... एक ही ब्लॉग से...मेरे मन का कोना पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
मन की वीणा ने कहा…
बहुत सुंदर।
आत्ममुग्धा ने कहा…
बेहद शुक्रिया
yashoda Agrawal ने कहा…
प्रिय सखी...
सादर अभिवादन...
आप आई..अच्छा लगा..
आभार आपको.. आते रहिएगा..
हर मंगलवार को हम एक विषय देते हैं..
उस विषय को आधार मानकर एक कविता लिखनी होती है
वे सब कविताएँ आनेवाले सोमवार को प्रकाशित की जाती है
आप आज का अंक देखिये.. विषय इन्सानियत पर कविताएँ प्रकाशित हुई है... शायद आपको हमारा ये प्रयास अच्छा लगे..
पुनः आभार..
सादर...

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उम्मीद

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मन का पौधा

मन एक छोटे से पौधें की तरह होता है वो उंमुक्तता से झुमता है बशर्ते कि उसे संयमित अनुपात में वो सब मिले जो जरुरी है  उसके विकास के लिये जड़े फैलाने से कही ज्यादा जरुरी है उसका हर पल खिलना, मुस्कुराना मेरे घर में ऐसा ही एक पौधा है जो बिल्कुल मन जैसा है मुट्ठी भर मिट्टी में भी खुद को सशक्त रखता है उसकी जड़े फैली नहीं है नाजुक होते हुए भी मजबूत है उसके आस पास खुशियों के दो चार अंकुरण और भी है ये मन का पौधा है इसके फैलाव  इसकी जड़ों से इसे मत आंको क्योकि मैंने देखा है बरगदों को धराशायी होते हुए  जड़ों से उखड़ते हुए 

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