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कुछ क्षणिकाए

 
 जलना 
आग में और इर्ष्या में 
कारण है विनाश का सर्वनाश का !
                 


                                    
    चुप्पी
 चटकाती है दिल 
रिश्ते मरते तिल-तिल  !




सूरज 
तुम्हारे नाम का 
मेरे ललाट पे सज 
मान बढाता तुम्हारा और मेरा भी !









मैं आहत होती हु 
अपनों के रूखे व्यवहार से नहीं 
बल्कि चाशनी में लिपटी उनकी बातों से !







   
         अपनों का साथ 
     है खुशियों का तडका
        दुखो की दाल में !

   




धुँआ धुँआ 
है जिंदगी 
जब जल रहे हो 
रिश्ते आस पास 

टिप्पणियाँ

ANULATA RAJ NAIR ने कहा…
बहुत सुंदर क्षणिकाएँ...
अनु
आत्ममुग्धा ने कहा…
anuji,pratham prayaas tha aur us par aapki swikruti ki mohar lag gai.....aage bhi margdarshan chaungi...sdhanywaad!

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पिता और चिनार

पिता चिनार के पेड़ की तरह होते है, विशाल....निर्भीक....अडिग समय के साथ ढलते हैं , बदलते हैं , गिरते हैं  पुनः उठ उठकर जीना सिखाते हैं , न जाने, ख़ुद कितने पतझड़ देखते हैं फिर भी बसंत गोद में गिरा जाते हैं, बताते हैं ,कि पतझड़ को आना होता है सब पत्तों को गिर जाना होता है, सूखा पत्ता गिरेगा ,तभी तो नया पत्ता खिलेगा, समय की गति को तुम मान देना, लेकिन जब बसंत आये  तो उसमे भी मत रम जाना क्योकि बसंत भी हमेशा न रहेगा बस यूँ ही  पतझड़ और बसंत को जीते हुए, हम सब को सीख देते हुए अडिग रहते हैं हमेशा  चिनार और पिता

गर्भगृह

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