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कुछ क्षणिकाए

 
 जलना 
आग में और इर्ष्या में 
कारण है विनाश का सर्वनाश का !
                 


                                    
    चुप्पी
 चटकाती है दिल 
रिश्ते मरते तिल-तिल  !




सूरज 
तुम्हारे नाम का 
मेरे ललाट पे सज 
मान बढाता तुम्हारा और मेरा भी !









मैं आहत होती हु 
अपनों के रूखे व्यवहार से नहीं 
बल्कि चाशनी में लिपटी उनकी बातों से !







   
         अपनों का साथ 
     है खुशियों का तडका
        दुखो की दाल में !

   




धुँआ धुँआ 
है जिंदगी 
जब जल रहे हो 
रिश्ते आस पास 

टिप्पणियाँ

ANULATA RAJ NAIR ने कहा…
बहुत सुंदर क्षणिकाएँ...
अनु
आत्ममुग्धा ने कहा…
anuji,pratham prayaas tha aur us par aapki swikruti ki mohar lag gai.....aage bhi margdarshan chaungi...sdhanywaad!

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