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हमारे राम

परसो 'हमारे राम' नाटक की प्रस्तुति देखने का सौभाग्य मिला। तीन घंटे का शानदार मंचन, अद्भुत अभिनय, बेजोड़ कलाकार, सधे हुए काव्यात्मक संवाद, बेहतरीन गीत और तालीयां बजाकर प्रशंसा करते दर्शक।
        मैंने पहली बार ऐसा शानदार नाट्य देखा। कलाकारों की बेजोड़ मेहनत साफ साफ दिख रही थी। संवाद अदायगी ऐसी थी कि दर्शक दीर्घा में बैठे दर्शक चुप्पी साधे शब्द शब्द को जैसे पी रहे हो। 
        हालांकि राम और रावण के अभिनय का तो कोई सानी नहीं लेकिन अब जब लिखने बैठ रही हूँ तो ऐसा लग रहा है कि अभिनय सबका ऊपरी दर्जे का था । छोटे से छोटा पात्र भी उतना ही मुखर था जितने कि मुख्य पात्र ।
       सबसे ज्यादा हतप्रभ थी मैं संवादो और हाव भाव को लेकर। संवाद इतने बड़े और इतनी शुद्ध हिंदी में थे कि कही भी जीभ फिसल सकती थी लेकिन मजाल जो कोई अटक भी जाये। मैं बार बार सोच रही थी कि फिल्मों में रिटेक होते है लेकिन यहाँ तो आपको जो भी करना है, एक ही बार में सामने सामने प्रस्तुत करना है और वो भी एकदम सधा हुआ ।  दूसरी बात थी बॉडी लैंग्वेज, सभी कलाकारों के हाव भाव , उनका मंच पर चलने का अंदाज, लक्ष्मण का हर बार सलीके से धनुष को ताने रखना, हनुमान का गदा को धारण करना, सूर्पंण्खा का लंका की कुलदेवी के समक्ष प्रार्थना की नृत्य प्रस्तुति और रावण की सभा में बेजोड़ संवाद अदायगी जो दर्शकों का मन मोह गयी, सबसे मनभावन मुझे लगा राम के चरित्र को चाल ढ़ाल से राम का चरित्र बना देना, विनम्रता उनके चलने के अंदाज से परिलक्षित हो रही थी जैसे, जिस तरह से वो मंच पर चल रहे थे, जिस तरह से उनके हाथ पूरी प्रस्तुति के दौरान सामने की ओर थोड़ा मुड़े रहे , वो सब अद्भुत था। रावण की चाल ढ़ाल उनके अंहकार को दिखा रही थी, उनके भी हाथ एकदम सीधे झूके हुए पूरी प्रस्तुति में नहीं थे।उनकी मदमस्त चाल में एक गर्व था, घमंड था लेकिन मुझे वो बहुत गरिमामय लगे शायद ऐसा इसलिये लगा हो क्योकि रावण की भुमिका निभा रहे आशुतोष राणा की मैं प्रशंसक हूँ।
            इसके बाद आश्चर्य की बात ये कि आधे घंटे बाद ही उनका दूसरा शो शुरू होने वाला था, मतलब वही बेजोड़ मेहनत फिर से । इसी आधे घंटे के बीच आशुतोष राणा सर से मैंने मुलाकात कर ली और जिस विनम्रता से वो मिले वो वाकई प्रशंसनीय है, उनके चेहरे पर ना कोई थकान थी और ना ही प्रशंशकों की भीड़ से खीझ जबकी दूसरी प्रस्तुति शुरू होने को ही थी।
         रामजी के साथ तो फोटो खिंचाना रह गया । जब रावण यानि आशुतोष राणा सर से मिलने जा रही थी तो हनुमान ने मेरा रास्ता रोका कि अभी दूसरी प्रस्तुति की तैयारी चालू है , आप आगे नहीं जा सकती लेकिन मन उछाल मार चला गया और मैंने आशुतोष सर को अपने हाथ से बनाया बुक मार्क दे ही दिया।
 

टिप्पणियाँ

कविता रावत ने कहा…
नाटकों की जीवंत प्रस्तुति देख्नते ही बनती हैं। मेरा भतीजा भी थिएटर एक्टर है इसलिए जब भी उसके नाटक होते हैं देखने जरूर जाती हूँ,, बहुत ही अच्छा लगता है।

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