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देवीस्वरूपा

एक ताजातरीन मुद्दा इन दिनों मीडिया पर छाया है । सरकारें फिर से एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप लगा रही है। बुद्धिजीवी बहस कर रहे है । मजदूरों के पलायन से सभी का थोड़ा ध्यान भटका है और यह  मुद्दा है एक मादा हाथी और उसके अजन्मे बच्चे की मृत्यु या हत्या का । नि:संदेह संवेदनहीनता की पराकाष्ठा है यह । जघन्य अपराध है किसी मुक को यूँ उत्पीड़न देना । यह दर्द बाकी सभी लोगो की तरह मेरे भीतर भी दौड़ गया था । जैसाकि हर बार होता है कोई भी दर्द या खुशी मैं भीतर जमा करके नहीं रख सकती , उसे बाहर निकलना ही होता है कभी शब्दों में तो कभी चित्रों में। बहुत से लोग इस तरह से अपना रोष, खुशी, दुख जाहिर करते है। मैंने भी चित्र बनाया पर पता नहीं क्यो एक टीस सी मन में बाकी रह गयी। 
        हालांकि यह कृत्य क्षमायोग्य है ही नहीं लेकिन मेरा ध्यान इससे हटकर था। नहीं जानती कि अपने मन के भावों को समझा भी पाऊँगी कि नहीं । 
          बचपन से ही कहानियों में पढ़ा था कि अक्सर  राजा किसी  मुजरिम को सजा देने के लिये उसे पागल हाथी के साथ छोड़ देते थे । या फिर कभी कभी हाथी क्रोध में आपा खो देते थे और अपनी ही देखभाल करने वाले महावत को कुचल देते थे । 
       जिस तरह शिव का तीसरा नेत्र और उनका तांडव विनाश के प्रतिकात्मक है उसी तरह क्रोध या उन्माद की अवस्था को व्यक्त करने के लिये अक्सर हाथी ही जेहन में आता है । लेकिन इस मुद्दे में हालात बिल्कुल अलग है । सोचकर देखिये कि किसी के भी मुँह में बारुद फटे तो क्या हो ? कोई भी हो अंधाधुंध उत्पात ही मचायेगा,पर यह हथिनी आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गयी। इतनी गहन पीड़ा के बावजूद उसने कोई उत्पात नहीं मचाया बल्कि चुपचाप नदी में जाकर जल समाधिस्थ हो गयी। तीन दिनों तक वह अपना मुहँ पानी में डालकर खड़ी रही । कैसी मनस्थिति रही होगी ? कहाँ से आयी ऐसी असीम सहनशक्ति ? 
इतना नियंत्रण खुद के भावावेग पर , कैसे ? तीन दिन तक भुखा रहना, बच्चे को पेट में रखकर .....लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं.... चिरशांति में लीन हो जाना। क्या ये साधारण बात है ? 
    नहीं, बिल्कुल भी नहीं। ये एक असाधारण तथ्य है । ये तो एक गूढ़ रहस्य है जो वो हथिनी शायद जानती थी। मैं नमन करती हूँ उसकी असीम शक्ति को जो मुझे सीखा गयी कि अपनी पीड़ा को अपनी सहनशक्ति से पार मत जाने देना। मूक हो जाना ,ये तुम्हे बल देगा जबकि क्रोध तुम्हे निर्बल करेगा। कुछ पीड़ाओं को एकदम निजी रखना। नतमस्तक हूँ मैं उस देवीस्वरूपा के आगे । मेरी स्मृतियों में वो सदैव रहेगी। मुझे मार्ग दिखाने वाले चुनिंदा लोगों के रुप में।
              अपनी हंपी यात्रा के दौरान मैं एक मादा हाथी लक्ष्मी से मिली थी । वो बहुत समझदार थी या कह लीजिये कि अपने पालक द्वारा भलीभांति प्रशिक्षित थी । लेकिन फिर भी जब मैं उसके साथ फोटोग्राफ्स ले रही थी तो मुझे महसूस हुआ था कि उसकी बॉडी लेग्वेज, उसकी आँखे जैसे मुझसे बतिया रही थी। वो आईकॉंटेक्ट कर रही थी और मेरे साथ सेल्फी में बहुत खुश दिख रही थी । वो शायद प्रशिक्षित थी इस सब के लिये। लेकिन इस गर्भवती मादा हाथी को पीड़ा सहन करने का प्रशिक्षण किसने दिया? कहाँ से जुटाई उसने इतनी शक्ति ? शायद प्रकृति अपने आप सबको मजबूत कर देती है ....मैं लागातार इन्ही सवालों के घेरे में हूँ ।
           चलते चलते एक और बात बताना चाहूँगी कि श्रद्धांजलि के तौर पर अधिकांश चित्रों में उसे बड़े बड़े दाँतों और पेट में बच्चे के साथ  दिखाया गया है । जहाँ तक मैं जानती हूँ एशियाई मादा हाथी के दाँत या तो दिखते नहीं है या फिर ना के बराबर दिखते है। मुझे भी यह बात मेरी हंपी यात्रा के दौरान ही पता चली जब मैं लक्ष्मी से रुबरु हुई और महावत से पुछा कि हम कैसे जानेंगे कि ये हथिनी है तब उन्होने कहा कि इसके दिखाने वाले दाँत नहीं होते । 
           

टिप्पणियाँ

Vasudha ने कहा…
एक मानव वो थे और एक मानवीय संवेदना की समझ ये भी है, बहुत सही बात बोली है कि हर पीड़ा प्रदर्शन के लिए नहीं होती ,कुछ पीड़ाएँ बल देती हैं औऱ हर वस्तु या व्यक्ति एक सीख देता है।
बहुत अच्छा लिखा औऱ सोचा, हमेशा की तरह।
बहुत सा प्यार ��
Meena Bhardwaj ने कहा…
सादर नमस्कार,
आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा मंगलवार (09-06-2020) को
"राख में दबी हुई, हमारे दिल की आग है।।" (चर्चा अंक-3727)
पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

"मीना भारद्वाज"


Albatross ने कहा…
नहीं, बिल्कुल भी नहीं। ये एक असाधारण तथ्य है । ये तो एक गूढ़ रहस्य है जो वो हथिनी शायद जानती थी। मैं नमन करती हूँ उसकी असीम शक्ति को जो मुझे सीखा गयी कि अपनी पीड़ा को अपनी सहनशक्ति से पार मत जाने देना। मूक हो जाना ,ये तुम्हे बल देगा जबकि क्रोध तुम्हे निर्बल करेगा। कुछ पीड़ाओं को एकदम निजी रखना। नतमस्तक हूँ मैं उस देवीस्वरूपा के आगे । मेरी स्मृतियों में वो सदैव रहेगी। मुझे मार्ग दिखाने वाले चुनिंदा लोगों के रुप में।

मार्मिक प्रस्तुति -हाथी एक बुद्धिमान प्राणी है यह सिखाता है बल बुद्धि विवेक का इस्तेमाल। जब तक हाथी पे हमला नहीं किया जाता यह हमलावार नहीं बनता। आत्म रक्षा में ही ऐसा करता है मानवीय संवेदना और सरोकारों को गणेश भगवान् से ज्यादा कौन बूझता है। हमारे पर्यावरण के ये पहरुवे अपनी गोबर से नव पौध अंकुरित करते चलते हैं बीज का यह अंतरण करते है। केरल की घटना रक्तरँगी नास्तिक लेफ्टीयों की निगरानी में घट सकती है ,घटती रहीं हैं वाहन ये प्रायोजित हत्याएं। हथनी के दांत दिखाऊ नहीं होते। एक गज समूह का नेतृत्व हथनी के हाथों में रहता है।

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आत्ममुग्धा ने कहा…
शुक्रिया वसुधा
सुन्दर व अलग विचार, उत्तम विचार

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