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संदेश

अध्यात्म

यूँ तो ईश्वर को लेकर मेरी कोई अवधारणा नहीं, पर वो है और मुझसे प्रेम करता है,मेरी हर कारगुज़ारी पर उसकी पैनी नजर रहती है,उसके सीसीटीवी में कैद मेरी हर गतिविधि होती है, यह जानते बूझते भी मैं सतर्क नहीं रहती क्योकि मुझे पता है, मेरा ईश्वर मुझसे प्रेम करता है और यह दावा मैं इसलिये कर सकती हूँ क्योकि मैने उसे पाने के कभी प्रयास ही नहीं किये, लेकिन फिर भी वो हर वक्त मेरे साथ उपस्थित  रहा।           मै नहीं जानती कि मैं आस्तिक हूँ या नास्तिक लेकिन हाँ, मैं आध्यात्मिक हूँ पर आश्चर्य की बात यह है कि मुझे अध्यात्म की गहराईयों का भी न पता.......न मुझे शास्त्रों का ज्ञान ना गूढ़ बातों की जानकारी लेकिन फिर भी मैं ईश्वरीय शक्ति को महसूस करती हूँ, हर पल,और शायद यही अध्यात्म  है और अगर यह अध्यात्म नहीं है तो शायद मै आध्यात्मिक भी नहीं हूँ। बहुत बार उत्सुकता होती है इसे जानने की, समझने की..... पर फिर डर लगता है कि ज्ञान आते ही कही मेरा ईश्वर मुझसे दूर न हो जाये क्योकि जो मुझे सहज उपलब्ध है, उसे और अधिक पाने का प्रयास क्यो ?ज्ञान की अवधारणाओं और तर्क वितर्क से परे मन ...

सहजता

                                                            'सहज' एक संस्कृत शब्द है,जिसका मतलब होता है 'प्राकृतिक' या फिर जो बिना प्रयास के किया जाये......तात्पर्य है कि जो अपने आप व्यक्त हो जाये वह सहजता है। इसे हम स्वाभाविकता भी कह सकते है....... स्व के भाव के अनुकूल जो, वो स्वाभाविक अर्थात सहज। सहजता एक नैसर्गिक गुण है जिसे हम मन के किसी कोने में दबा देते है........ कभी अधिक परिपक्व दिखने की चाह में तो कभी कुछ समझ ना पाने की वजह से........ और तब सब नाटकीय हो जाता है और बस, वही से जद्दोजहद शुरू हो जाती है खुद से खुद की।समझदार दिखने का लोभ हमे असहज बना देता है और चालाकियाँ स्वत: ही दस्तक देने लगती है।                  कभी देखा है किसी फुल को खिलने के लिये प्रयास करते हुए,वो सहज ही खिल जाता है,बिल्कुल इसी तरह नदी सहज ही बहती रहती है बिना किसी प्रयास,सुरज हर रोज सहज ही उदय अस्त होता रहता है,औ...

मिश्री की डली

मन की ज़मीं पर कुछ नमक की डलियाँ थी ना जाने  कब आई कहाँ से आई पता ही नहीं चला कब मैं इस  नमकीन से स्वाद को अपनी नियती  मान बैठी लेकिन अबकि, जब बरसा पानी जम के ये नमकीन सी डलियाँ क़तरा सा पिघली एक दिन  दो दिन तीन दिन हफ़्तों तक बरसता रहा पानी नमी पाकर नमक भी पिघल गया पूरा का पूरा और जब धुप निकली तो ना नमक था  ना कोई निशाँ ठंडी हवा ने मन को छुआ दिल खिल गया ना जाने कहाँ से ये हवा ले आई  एक बीज नन्हा सा और  गिरा दिया मन की ज़मीं पर अब नमकीन डलियों की जगह कुछ अंकुरित होगा मीठा सा.... बिल्कुल मिश्री की डली सा

परवरिश

                मैं राह ही देख रही थी कि पौने दस के करीब डोरबेल बजी..... मेरा अनुमान सही था,वो दुर्गा ही थी। मैंने देर से आने का कारण पुछा तो वही रोज की वजह.......माँ-बाप का झगड़ा और गंदी परवरिश से पिसते बच्चें।                      दुर्गा........ सोलह सत्रह साल की गोरी जवान और खुबसूरत सी लड़की, जो पिछले कुछ दिनों से मेरे घर काम करने आ रही थी। छ: बहन भाईयों में दुर्गा दुसरे नम्बर पर थी,पहले नम्बर पर एक आवारा भाई था जो तकरीबन पूरी तरह से बिगड़ चुका था। तीसरे नम्बर की बहन का नाम शारदा था जो की सातवीं कक्षा में पढ़ती थी, चौथे नम्बर का भाई छठी में था और दो छोटी बहनें जो अभी स्कुल नहीं जाती थी।            एक बार दुर्गाष्टमी के दिन मैंने उसकी दोनो छोटी बहनों को खाने पर बुलाया था,वो दोनो इतनी सुंदर बच्चियाँ थी कि मैं मंत्र मुग्ध सी हो गयी....... भगवान ने चारों बहनों को रूप रंग देने में कोई कोर कसर ना रखी थी।  दुर्गा ने दसवीं तक पढ़ाई की थी और अक्सर मुझसे कहती थी...

हाँ,मैं रजस्वला हूँ

मैं वर्जित हूँ क्योकि मैं रजस्वला हूँ यूँ तो मै घर की धुरी हूँ लेकिन  'उन दिनों' मैं घर से ही वंचित हूँ वर्जनाओं  के ताने बाने से बुने उन दिनों में  मैं सहमी सी रहती हूँ लेकिन कभी कभी वर्जनाओं से पार  जाकर भी देखा हैं मैंने अचार कभी भी ख़राब नहीं हुआ यक़ीन मानिये मैंने हाथ लगाकर देखा हैं मुझे याद हैं वो शुरुआत के दिन जब नासमझी में मैंने मंदिर में प्रवेश कर लिया था यक़ीन मानिये  भगवान बिल्कुल भी रूष्ट नहीं हुए थे हाँ, घर के रूष्ट लोगो ने वर्जनाएँ लाद दी थी मुझ पर तब से लेकर आज तक 'उन दिनों' वर्जित हूँ मैं हर जगह किसने बनाया ये नियम ? शायद पुरूषवाद ने ! लेकिन  सुनो पुरूषवाद ग़र तुम रजस्वला होते तो क्या वर्जित रहते ?  क़तई नहीं ! तुम कहते कि हम पवित्र है क्योकि हम प्रत्येक माह शुद्धीकरण की प्रक्रिया  से जो गुज़रते हैं 

पिता

पिता सिर्फ पिता होते हैं एक समय में एक ही किरदार होते हैं वे पूरी तरह से सिर्फ पिता होते हैं वे पिघल के बरसते नहीं हैं बहुत कुछ सहते हैं लेकिन  कभी कुछ भी  कहते नहीं हैं पिता सिर्फ पिता होते हैं उन्हे लोरी नहीं आती सुलाने को लेकिन बातें सार्थक आती हैं आँखें खोल दुनियाँ दिखाने को माँ मारती हैं धरती को जब ठोकर खाकर गिर जाते हैं लेकिन  पिता.... ठोकर खाकर सँभलना सीखाते हैं वे मौन रहते हैं हमारे सपने सजाते हैं आँखों में अपनी भविष्य हमारा  बुनते हैं पिता  सिर्फ पिता होते हैं जीवन भर एक ही किरदार में होते हैं लेकिन  जब हाथ छोड़  चली जाती हैं 'माँ' तो  ये पिता माँ भी बन जाते हैं 

कौसानी

घुमावदार रास्तें स्वागत करते लम्बें पेड़ अपनी ओर बुलाते पहाड़ लगातार बोलते झिंगुर चहचहाते पक्षी क्या कोई इसका सानी हैं जी हाँ, शहर ये कौसानी है  दूर से छुप छुप लुभाता हिम गरजते बादल कड़कती बिजली  जम के बरसने को आतुर  मौसम ये रोमानी हैं  जी हाँ, शहर ये कौसानी हैं शांत,नीरव, मनभावन हवा में कैसा जादू हैं भीगे मन,भीगे तन पत्ते पत्ते में संगीत हैं सुबह है सुंदर तो रैना भी दीवानी हैं जी हाँ, शहर ये कौसानी हैं अलसुबह की किरणें हिम पे जा गिरती भुला देती सुध बुध लेकिन  उड़ते आवारा ये बादल ढ़क देते इसकी सुनहरी छँटा  ये बात कितनी बेमानी हैं जी हाँ, शहर ये कौसानी हैं।