और किताब पढ़कर खत्म हुई.....एक महान और सच्चे कलाकार की दास्तां..... थियो जैसे भाई की अमिट छाप मुझ पर पड़ी है...अभिभूत हूँ ऐसे प्यार को महसूस करके 😍 इतने बेहतरीन अनुवाद के लिये अनेकानेक धन्यवाद अशोक पांडे सर का इसी किताब के गलियारों से गुजरते एक कविता ने जन्म लिया..... रंग उसका जीवन थे वो सदैव रंगों से सराबोर रहा उसकी विशलिस्ट में पहले नम्बर से लेकर सबसे आख़िर तक सिर्फ़ और सिर्फ़ रंग थे उसके कैनवास दुनिया की बेशकीमती पेंटिंगों में शुमार है, लेकिन, जब तक उसके हाथ उन्हें रंगते रहे, तब तक उनकी कीमत किसी ने न पहचानी, सिवाय थियो के बाकी लोगो ने उसे पागल कहा सनकी कहा क्योंकि रंगों से इतर उसने कुछ नहीं देखा मूलभूत ज़रूरतों तक को नज़रंदाज़ किया वो जरा से प्यार से खुश हो जाता था। वो हमेशा प्यार मांगता रहा वो दुख की नसों पर पकड़ रखता था, वो पीले रंग से बेइंतहा प्यार करता था वो हमेशा , जल्दबाज़ी करता था। तपती धूप में वो सोने सा दमकता था, उसकी लाल, छितरी दाढ़ी , निश्छल आँखे और एक सह्रदय मन, उसे सबसे अलग बनाता था वो आत्ममुग्धित होकर...
अपने मन के उतार चढ़ाव का हर लेखा मैं यहां लिखती हूँ। जो अनुभव करती हूँ वो शब्दों में पिरो देती हूँ । किसी खास मकसद से नहीं लिखती ....जब भीतर कुछ झकझोरता है तो शब्द बाहर आते है....इसीलिए इसे मन का एक कोना कहती हूँ क्योकि ये महज शब्द नहीं खालिस भाव है