रावण मुस्कुराते हुए बोला, "राम, मैं सिर्फ महादेव के प्रति ही मित्रता के भाव से भरा हुआ हूँ । महादेव के अलावा किसी भी अन्य का मेरे मित्रभाव में प्रवेश निषिद्ध है, फिर वह भले ही महादेव को ही क्यो न प्रिय हो इसलिये तुम्हे कभी भी रावण की मित्रता नहीं मिलती। मेरे निदान के लिये महादेव ने तुम्हारा चयन किया है राम,क्योंकि महादेव अपने इस अतिप्रिय शिष्य को मृत्यु नहीं, मुक्ति प्रदान करना चाहते हैं।" ये पंक्तियां आशुतोष राणा सर की लिखित किताब "रामराज्य" से है। पिछले हफ्ते ही मैंने इस किताब को मंगाया है। सोचा था कि पूरी किताब पढ़ने के बाद कुछ लिखूँगी लेकिन पहला पृष्ठ पलटते ही उपरोक्त पंक्तियां पढ़ने मिली। रावण द्वारा कहे इन सुंदर शब्दों से मन विभोर हो गया। मित्रता की जो गहन गूढ़ बात यहां कही गयी है मैं उससे पूरी तरह सरोकार रखती हूँ। रावण कहते है कि उनके इष्ट महादेव के प्रति वे मित्रभाव रखते है और दूसरा कोई उसके समकक्ष आ भी नहीं सकता। ...
अपने मन के उतार चढ़ाव का हर लेखा मैं यहां लिखती हूँ। जो अनुभव करती हूँ वो शब्दों में पिरो देती हूँ । किसी खास मकसद से नहीं लिखती ....जब भीतर कुछ झकझोरता है तो शब्द बाहर आते है....इसीलिए इसे मन का एक कोना कहती हूँ क्योकि ये महज शब्द नहीं खालिस भाव है