खुशी होती थी उसे अपने वजूद पर मूक जानवरों की पीड़ा समझती थी वो स्नेह से दुलारती भी थी शायद लेकिन नहीं जानती थी वो, कि जानवर तो मूक होता है स्नेह की भाषा समझ जाता है लेकिन खतरनाक होता है वो जानवर जो बोलता है एक मानवीय भाषा पर, जो स्नेह नहीं, जिस्म समझता है जरा सोच कर देखो..... कितना दर्द सहा होगा उसने पहले आत्मा को रौंदा गया फिर शरीर को..... कहते है दर्द का एक मापदंड होता है जिसमे शायद दूसरे नम्बर पर प्रसव पीड़ा आती है जो सिर्फ स्त्री के हिस्से आती है स्त्री सहर्ष इसे सहती है सृष्टि रचती है लेकिन सुनो मैंने कही सुना है, कि पहले पायदान पर आता है देह को जीवित जला देने वाला दर्द ये दर्द नहीं था उसके हिस्से में फिर क्यो जली उसकी देह ? विघ्नहर्ता थे उसके गले में क्यो उसके विघ्न हर न सके ? डरते डरते बात करते हुए उसने फोन रख दिया क्यो डर हावी था उस पर ? अरे ! तब तो 12 भी नहीं बजे थे और न ही था उसके साथ कोई तथाकथित दोस्त जिसके आधार पर उसका कोई चरित्र निर्माण किया जा सके अब तो कोई लांछन भी नहीं लगाया जा सकता उस पर फिर क्यो वो तिल तिल मरी ?...
अपने मन के उतार चढ़ाव का हर लेखा मैं यहां लिखती हूँ। जो अनुभव करती हूँ वो शब्दों में पिरो देती हूँ । किसी खास मकसद से नहीं लिखती ....जब भीतर कुछ झकझोरता है तो शब्द बाहर आते है....इसीलिए इसे मन का एक कोना कहती हूँ क्योकि ये महज शब्द नहीं खालिस भाव है