कभी देखा है ध्यान से इन रिमझिम बरसती बुंदों को कभी महसूस किया है धरा के तृप्त मन को यूँ तो आसमाँ धरती से मिल नहीं सकता बस, एक भ्रम होता है उनके मिलन का दूर कही क्षितिज में लेकि...
अपने मन के उतार चढ़ाव का हर लेखा मैं यहां लिखती हूँ। जो अनुभव करती हूँ वो शब्दों में पिरो देती हूँ । किसी खास मकसद से नहीं लिखती ....जब भीतर कुछ झकझोरता है तो शब्द बाहर आते है....इसीलिए इसे मन का एक कोना कहती हूँ क्योकि ये महज शब्द नहीं खालिस भाव है