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जून, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

तृप्त धरा

कभी देखा है ध्यान से इन रिमझिम बरसती बुंदों को कभी महसूस किया है धरा के तृप्त मन को यूँ तो आसमाँ धरती से मिल नहीं सकता बस, एक भ्रम होता है उनके मिलन का दूर कही क्षितिज में लेकि...

दरख़्त

मेरे घर के सामने एक दरख्त है सालों से देख रही हूँ एक मौसम आता है जब उसके सारे पत्ते उसका साथ छोड़ जाते है श्रृंगारविहिन सा वो पेड़ फिर भी खड़ा रहता है बदलते मौसमों के सफर में भी न...

कोमलांगिनी

कहने को तो वह कोमलांगिनी है नाजुक सी देह की स्वामिनी है भावों की अश्रु धार है क्षतविक्षत ह्रदय की रफु की हुई कामायिनी है लेकिन सोचा है कभी कैसे कर जाती है वो प्यार, स्नेह, दु...

नहीं आसान होता किसी को भुल जाना

नहीं आसान होता किसी को भुल जाना रोजमर्रा में सुरज के साथ जलते हुए पृथ्वी के साथ परिक्रमा करते हुए चाँद को सिरहाने रखते हुए रातों को टुटते तारों को देख उदास होते हुए नहीं आस...