सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

पश्चिम बंगाल और सिक्कीम की मेरी यात्रा


"घुम" की सर्दीली रात में एक गहरी नींद के पश्चात अलसुबह सूरज की पहली किरण मेरे कमरे की खिड़की से मुस्कूरा रही थी । मैंने भी खिड़की खोलकर खुली बाँहों से इन नन्ही किरणों का स्वागत किया और अपने सर्द कमरे में पसरने का मौका दिया ।
.....तभी दरवाजे पर दस्तक हुई, खोला तो सामने ज्योतिष को चाय की केटली के साथ खड़ा पाया । मैने चार चाय ली और और बच्चों को उठाया ।कड़क चाय की चुस्कियों के साथ मैं एक खुबसूरत दिन की शुरूआत करने वाली थी ।
आज हम पूरा दिन दार्जिलींग की वादियों में सैर करने वाले थे,हमने फटाफट अपना नाश्ता किया और भगवती भाई के साथ निकल पड़े । रास्ता बहुत मनभावन था और सर्द हवा का झोंका , हमारी शीशे चढ़ी गाड़ी में भी आकर हमारी सिहरन बढ़ा जाता था । मेरा मन इन वादियों में हिंडोले लेने लगा,हालांकि लेह की वादियाँ और यादें अभी भी मेरे मन मस्तिष्क पर अपना कब्जा जमाये थी ।
सबसे पहले हम चिड़ियाघर देखने गये । वहाँ पर हमने लाल पांडा देखा,जिसे हमने पहले कभी नहीं देखा था ।चिड़ियाघर के ही एक तरफ संग्रहालय था जहाँ पर हमे पर्वतारोहण से संबंधित चीजों की जानकारी दी गई । रौनक और शगुन बड़ी दिलचस्पी के साथ सब देख रहे थे । हमे माऊंट एवरेस्ट के बारे में कई रोचक किस्से जानने को मिले । अपने भारत के समृद्ध इतिहास को देख सुनकर मैं फुली नहीं समा रही थी ।हमारा गाइड भी हमे रोचक तरीके से सब समझा रहा था,बीच बीच में मैंने महसूस किया कि जब कभी भी भारत की उपलब्धियों की चर्चा होती तो गाइड की आँखों में एक चमक सी फैल जाती ,ना जाने क्यों वो चमक मेरी भी आँखों में आ जाती और मुझे गर्वित होने का मौका देती । वही पर एक महाविद्यालय भी था जो पर्वतारोहियों को ट्रेनिंग देता था और यहाँ विदेशों से भी छात्र पढ़ने आते है ।
वहां से हम लोग रिफ्युजी सेंटर गये । यह सेंटर देखते समय मेरी आँखों में मुझे कुछ पिघलता हुआ सा प्रतीत हुआ । बुजूर्गों द्वारा बनाये गये सामान को देखकर मेरी आँखे खुली की खुली रह गई , मैने थोड़ा कुछ सामान लिया और ललचाई नजरों से बाकी सब चीजों को देखने लगी, ऐसी चीजों के प्रति मेरी दीवानगी सुशील(पति) से छिपी नहीं थी...... अपने बजट के बिगड़ने के डर से वे बड़ी ही कलाकारी से मुझे वहाँ से निकाल लाये । खैर,........मैंने उन बुजूर्गों से उनकी उम्र पुछी,वे सब अस्सी वर्ष से उपर के थे,मैने बच्चों के साथ उनके फोटोग्राफ्स लिये और यकीन मानिये उन वृद्ध चेहरों की सिलवटें एक स्मित रेखा से खिल सी गयी । उनके आशिर्वाद देते हाथ मेरे बच्चों को भी खुश कर गये,उन काँपते हाथों के आशिष को अपने हृदय में समाये हम चल पड़े दार्जिलींग के प्रसिद्ध टी गार्डन की ओर ।
चाय के बागान देखकर हम विस्मित हो गये,मैं तो ईश्वर की प्राकृतिक छटाओं को देखने में ही व्यस्त थी तभी रौनक ने मुझसे कहा कि मम्मी आप ग्रीन कलर के शेड्स देखो । सच, हरे रंग की एक एक छटा अपने आप में अद्वितीय थी ।कही गहरा,कही हल्का,कही पीले के साथ घुला हुआ तो कही लाल के साथ तालमेल बिठाता हुआ,कही सूर्ख तो कही फीका सा .......अदभुत.....अनुपम ।हरी वादियाँ मेरे पांवों में बिछी थी ..... मखमल पर चलने सा अहसास था यह ।फिर से हमने खुब सारी फोटो खिंची । हरे बागानों के बीच खड़ी लाल जींस,पीला शर्ट पहने हरे पीले जुतों में अपनी बिटीया को देख मेरा कैमरा स्वतः ही क्लिक होने लगा,ईश्वरीय रचना की खुबसूरती के साथ मेरी अपनी कृति की सुंदरता को देखकर मुझे गुमान हुआ खुद पर भी और अपने अंश पर भी । मैं इस बार भी बहुत आगे तक चली गई कि तभी भगवती भाई ने आवाज दी ।मुझे याद आया कि मुझे यहाँ से चाय खरीदनी हैं,हमने अलग अलग तरह की चाय का स्वाद लिया और पिछले तीन दिनों से पी रही चाय का स्वाद मेरे मुंह में घुल आया । हमने छः किलों चाय खरीदी ,भगवती भाई चाय की इस खरीदारी पर मुस्कूरा रहे थे,मैंने उन्हे स्पष्ट किया कि ये सब मेरे प्रियजनों के लिये उपहार स्वरूप हैं ।
भगवती भाई और हम चारों हमारी गाड़ी में बैठ गये ।राह में आ रही हर चीज मुझे लुभा रही थी ।सबसे ज्यादा मुझे प्रभावित किया स्थानिय लोगो ने ........ पिछले दो दिनों से आते जाते मैं इन पर नजर डाल रही थी और बहुत कुछ अध्ययन भी कर रही थी जैसा कि मेरा स्वभाव है ।मैने पाया कि यहाँ की महिलायें की संरचना में ऊपरवाले ने कोई कोर कसर नहीं छोड़ी,बला की खुबसूरत लड़कियाँ.....आत्मविश्वास से लबालब.....जिन्हे देखते ही उनके सुशिक्षित होने का अंदाजा स्वतः ही लग जाये ।अत्याधुनिक कपड़ों से सजी इन लड़कियों की आँखों में कही कोई खौफ नहीं,कही पीछा करती आँखें नहीं ।एकदम सौम्य तरीके से संवरे सीधे बाल,आँखों पर सुघड़ रूप से लगा लाईनर और लापरवाही अंदाज में च्यूंई्गम चबाती ये लड़कियाँ मेरे मन में घर करती जा रही थी,सुशील की नजरों में भी इस खुबसूरती के लिये आ रहे भावों को मैने पहचान लिया । सबसे बड़ी बात,कि सब किसी ना किसी काम में व्यस्त थी और मुझे सड़क पर लड़कों से ज्यादा लड़कियों की तादात लगी,मैंने भगवती भाई से पूछा कि यहाँ लड़कियों की कौम अधिक पढ़ी लिखी लगती है ।तब ड्राईवर ने बताया कि यहाँ महिलाओं का अनुपात पुरूषों के मुकाबले अधिक है,कोई भी महिला घर पर बैठना पसंद नहीं करती और कुछ नहीं तो "मोमो" (सिक्कीम का विशेष खाद्य पदार्थ ) ही बेचने लगती है ।मैने स्वंय की ही पीठ थपथपाई क्योंकि मेरे सारे अनुमान सही थे,ड्राईवर की नजरों में भी अपने लिये प्रशंसा के भाव देखे ।
रास्ते में "राॅक क्लाईम्बिंग" करते हुए हम लंच के लिये होटल पंहुच गये ।रास्ते में हम टोय ट्रेन के पास से गुजरे और शाम को इसकी सवारी करने का निश्चय कर लिया ।मैं घुम स्टेशन की नैसर्गिक सुंदरता को निहारने में मग्न थी,बच्चें भी खुश होकर अपने मोबाईल में छायाचित्र ले रहे थे,मैं अचम्भित थी ,उनके स्वभाव से वाकिफ थी,वे प्राकृतिक छटाओं को कभी नहीं निहारते । थोड़ी ही देर में मुझे उनकी खुशी का असली कारण पता चल गया,वास्तव में इस स्टेशन और ट्रेन को रणवीर कपूर की अभिनीत फिल्म बरफी में दर्शाया गया है बस यही उनके उत्साह की असली वजह थी । भगवती भाई ने हमे बताया कि ट्रेन की बूकिंग फुल है,सुशील मायूस से हो गये,वे बच्चों को इसकी सवारी कराना चाहते थे ।
दोपहर के खाने के बाद हमने थोड़ा आराम किया।शाम को कुछ साथी यात्रियों को लेकर हम माॅल रोड़ गये,बच्चों को शाॅपिंग में कोई दिलचस्पी नहीं थी इसलिये वे दोनो होटल में ही ठहर गये ।माॅल रोड़ एक चहल पहल वाला क्षेत्र था,पर्यटक यहाँ की शोभा बढ़ा रहे थे ।हल्की बारिश की फुहार थी , सूरज दिन भर की भागादौड़ के बाद निढ़ाल सा हुआ जा रहा था और चहलकदमी करते हम.......कुल मिलाकर यह एक खुशनुमा शाम थी । टोय ट्रेन में सफर ना कर पाने की मेरे पति की मायुसी भी अब दूर हो गई । मुझे वहाँ खरीदारी लायक कुछ नहीं मिला अतः हम होटल वापस आ गये ।
रात के खाने के समय निश्चित हुआ कि सुबह ३:३० को सब लोग सूर्योदय देखने टाईगर हिल जायेगे । इस बात पर आंटी भगवती भाई से उलझ पड़ी ।बिटीया की नासाज़ तबीयत के चलते मेरा नहीं जाना तय था,इसलिये मामले में ज्यादा ना उलझते हुए हम अपने कमरों में आ गये,बहुत थक चुके थे सो ज्योतिष को दुध लाने से मना कर दिया , बिस्तर पर गिरते ही हम नींद के आगोश में चले गये................

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

गर्भगृह

मुझे अंधेरों से डर नहीं लगता मुझे सन्नाटों का भी खौफ़ नहीं उष्णता मुझे तरबतर नहीं करती आपदाओं से मैं घबराती नहीं काल कोठरी सी एक छोटी जगह जहाँ रोशनी की महीन किरण तक नहीं मुझे पर्याप्त है क्योकि मैं उसे समझ लेती हूँ माँ का गर्भगृह जहाँ कुछ समय मुझे रहना है जीवन पाकर बाहर आना है ईश्वर अभी भी रच रहा है मुझे उसकी रचना पर सवाल नहीं संदेह नहीं

पिता और चिनार

पिता चिनार के पेड़ की तरह होते है, विशाल....निर्भीक....अडिग समय के साथ ढलते हैं , बदलते हैं , गिरते हैं  पुनः उठ उठकर जीना सिखाते हैं , न जाने, ख़ुद कितने पतझड़ देखते हैं फिर भी बसंत गोद में गिरा जाते हैं, बताते हैं ,कि पतझड़ को आना होता है सब पत्तों को गिर जाना होता है, सूखा पत्ता गिरेगा ,तभी तो नया पत्ता खिलेगा, समय की गति को तुम मान देना, लेकिन जब बसंत आये  तो उसमे भी मत रम जाना क्योकि बसंत भी हमेशा न रहेगा बस यूँ ही  पतझड़ और बसंत को जीते हुए, हम सब को सीख देते हुए अडिग रहते हैं हमेशा  चिनार और पिता

खरे लोग

लगभग साल डेढ़ साल पहले की बात है, मैंने इंस्टा पर एक नया अकाउंट बनाया था । आत्मविश्वासी महिलाओं , क्रियेटिव ज्वैलरी और हैंडलूम साड़ीयों को यहाँ मैं फॉलो किया करती थी। रोज कुछ नया तलाशती रहती थी। ऐसे में एक दिन स्क्रॉल करते हुए नजरे ठहर गयी.....चाँदी की ज्वैलरी का एक बड़ा पेज । खुबसूरत शब्दों में ढ़ली ज्वैलरी और ज्वैलरी भी ऐसी कि हर पीस मन को भा जाये। मैंने तीन पीस सलेक्ट कर मंगाये।  उनके आने पर मैंने पिक क्लिक कर पोस्ट डाली....पिक में मेरे हाथ का टेटू था। ज्वैलरी के साथ टेटू की भी तारीफ हुई । फिर बात आयी गयी हुई ।              एक दो बार पेज की ऑनर दिव्या से थोड़ी बहुत बात हुई । एक उच्च स्तरीय व्यक्तित्व और एक माँ के रुप में वो मुझे बहुत पसंद आयी। पता नहीं क्यो, बच्चों की परवरिश के तौर तरीकों को देखते हुए मैं अक्सर उन माँओं से प्रभावित होती हूँ तो मदरहुड एंजोय करती है ....दिव्या उन्ही चुनिंदा लोगो में से एक है । खैर....हमारी बात थोड़ी और हुई, मेरी कला और शब्दों ने कही न कही दिव्या को छूआ। दिव्या को मेरा पेननेम "आत्ममुग्धा" बहुत पसंद आया और उसने कहा कि मै...