सोमवार, 20 जून 2016

हाँ,मैं रजस्वला हूँ

मैं वर्जित हूँ
क्योकि
मैं रजस्वला हूँ
यूँ तो
मै घर की धुरी हूँ
लेकिन 
'उन दिनों' मैं
घर से ही वंचित हूँ
वर्जनाओं 
के ताने बाने से बुने
उन दिनों में 
मैं सहमी सी रहती हूँ
लेकिन
कभी कभी
वर्जनाओं से पार 
जाकर भी देखा हैं मैंने
अचार कभी भी ख़राब नहीं हुआ
यक़ीन मानिये
मैंने हाथ लगाकर देखा हैं
मुझे याद हैं
वो शुरुआत के दिन
जब नासमझी में
मैंने मंदिर में
प्रवेश कर लिया था
यक़ीन मानिये 
भगवान बिल्कुल भी रूष्ट नहीं हुए थे
हाँ, घर के रूष्ट लोगो ने
वर्जनाएँ लाद दी थी मुझ पर
तब से लेकर आज तक
'उन दिनों' वर्जित हूँ मैं
हर जगह
किसने बनाया ये नियम ?
शायद पुरूषवाद ने !
लेकिन 
सुनो पुरूषवाद
ग़र तुम रजस्वला होते
तो क्या वर्जित रहते ? 
क़तई नहीं !
तुम कहते
कि हम पवित्र है
क्योकि हम
प्रत्येक माह
शुद्धीकरण की प्रक्रिया 
से जो गुज़रते हैं 








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