आज हनुमान जयंती है, हनुमानजी से मेरा नाता जन्म से रहा है। जब से होश संभाला,उन्हे आस पास ही पाया,हर दिन चाहे वो खास हो या आम हो, उन्हे पूजा जाता था । हाँ, खास अवसरों पर बड़ा भोग या सवामणी उन्हे अर्पित की जाती थी। उस वक्त सवामणी हमारे लिये सालासर जाने का अवसर होती थी और सालासर हम बच्चों के लिये पिकनिक जैसा होता था। शायद कोई गिनती नहीं कि हम कितनी बार सालासर गये होंगे और कितनी ही सवामणियों में प्रसाद खाया होगा। हनुमान जयंती एक बड़े उत्सव जैसा होता था, उत्सव के मायने उस वक्त आज जैसे नहीं थे । हाँ, मंदिरों में रतजगा, भोग और श्रृंगार जरुर बड़े स्तर का होता था लेकिन जहाँ तक घर की बात है, मुझे याद है , माँ (दादी) रसोईघर में एक कोयले को गरम करके उस पर घी डालती थी और जब उससे लपटे निकलती तो माँ हम बहन भाईयों को हाथ जुड़वाती और कहती " बाबा आ गये, प्रणाम करो" हम बच्चा बुद्धि कभी समझ नहीं पाये कि कौनसे बाबा, कहाँ से आ गये लेकिन श्रद्धा से हाथ जोड़ते तो माँ जो पीठ थपथपाती थी उस थपथपाहट की आज मैं मोहताज हूँ। धीरे धीरे थोड़े बड़े होने...
अपने मन के उतार चढ़ाव का हर लेखा मैं यहां लिखती हूँ। जो अनुभव करती हूँ वो शब्दों में पिरो देती हूँ । किसी खास मकसद से नहीं लिखती ....जब भीतर कुछ झकझोरता है तो शब्द बाहर आते है....इसीलिए इसे मन का एक कोना कहती हूँ क्योकि ये महज शब्द नहीं खालिस भाव है