शनिवार, 28 मई 2016

मन की करने दो ना

तुम चाहते क्या हो ?
मैं हमेशा खुश रहूँ ?
या खुश दिखूँ
तुम ही बताओ
जब अंदर पतझर हैं
तो बाहर
बसंत कैसे बिखेरू मैं ?
बरसना चाहती हैं आँखें
घुट जाता है गला मेरा
तो अपनी सिसकियों को
क्यो अंदर ही अंदर
समाहित करू मैं ?
जब उदास हैं मन
बैचैन हैं किसी
अपने की याद में
तो क्यो तुम्हारे
 साथ बैठकर
ठहाके लगाऊ मैं ?
माना कि
तुम मेरा ध्यान रखते हो
बस, यही गड़बड़ हैं
क्योकि मेरी परवाह
तुम्हारे दायरों तक
सीमित हैं
मुझे अपना ध्यान खुद रखने दो ना
मैं खुश रहुंगी
बस, अपने मन की करने दो ना