शुक्रवार, 28 फ़रवरी 2014

माँ

संदेह के बादलों से
भय की हो रही है बारिश
चू रही है छत
सील रहा है सब कुछ
बन रही है
चिन्ता की रेखायें
मेरे ललाट के आस पास
लेकिन
मन के एक कोने में
दूर कही
सुनहरी धूप खिलने को है
जो हटा देगी घने बादलों को
रोक देगी बरसते पानी को
क्योकि
एक नया इंद्रधनुष बनने को है
फिर भी
ना जाने क्यो
अनजाना सा लग रहा है क़यास
कभी बिखर तो कभी बंध रही है मेरी आस
मन ही नहीं
अब तो
मेरी चौखट भी रहने लगी है उदास
क्योकि
पल पल कर रहा है छलनी मुझे
मेरी माँ को खोने का अहसास

8 टिप्‍पणियां:

  1. एक अच्छी प्रस्तुति ....सुन्दर रचना ..माँ पर कुछ भी लिखो कम ही लगता है

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. धन्यवाद संजयजी,आपने बिल्कुल सच कहा,माँ पर जितना लिखो कम लगता है ।

      हटाएं
  2. उत्तर
    1. माफ़ कीजियेगा राजीवजी,सराहने के लिये आपका आभार लेकिन माँ को खोने का अहसास कदापि सुंदर नहीं हो सकता यह बहुत पीड़ादायक क्षण होता है।

      हटाएं
  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    इस पोस्ट की चर्चा, शनिवार, दिनांक :- 01/03/2014 को "सवालों से गुजरना जानते हैं" : चर्चा मंच : चर्चा अंक : 1538 पर.

    उत्तर देंहटाएं
  4. किसी के लिए उसकी माँ की अनुपस्थिति बहुत पीड़ादायक होती है. माँ की बातें, नसीहतें, प्यार को भुलाया जाना असंभव है. माँ हमेशा आसपास ही होती है.

    उत्तर देंहटाएं
  5. मार्मिक ... माँ को खोने का एहसास उदासीन कर देता है हर पल को ... माँ के यादें नमी सी ले आती हैं ...

    उत्तर देंहटाएं