मंगलवार, 18 जून 2013

पश्चिम बंगाल और सिक्कीम की मेरी यात्रा


२२अप्रेल - 
              रोज की तरह आज भी यह एक खुशनुमा ताजगी भरी सुबह थी ,नाश्ता करने के बाद हमे पीलिंग के लिये निकलना था और रास्ते में "रीवर राफ्टींग" के लिये रूकना था,रौनक इस बात को लेकर बहुत उत्साहित था । मैं बहुत जल्दी उठ चुकी थी और बेसब्री से ज्योतिष के चाय लाने का इंतजार कर रही थी । मन थोड़ा उदास भी था क्योकि मैं सूर्योदय देखने "टाईगर हिल" नहीं जा सकी थी । मेरी नजर शगुन पर पड़ी, जो गहरी नींद में सोयी थी । अब उसकी तबियत थोड़ी ठीक लग रही थी मतलब मेरा आगे का दिन अच्छा जाने वाला था इसलिये मैंने एक झटके में अपने मायूस मन को दूर भगा दिया ।कड़क चाय की प्याली ने गजब का असर किया और मैं आनन फानन तैयार हो गयी...... नाश्ते में थोड़ा समय था । हम होटल के बाहर चहल कदमी कर रहे थे कि ज्योतिष ने बताया कि होटल के पीछे जाइये , पूरा कंचनजंघा आपको नजर आयेगा । लगे हाथ हम वहाँ पहुंच गये । मैं स्तब्ध थी और मन ही मन अफसोस कर रही थी कि पिछले दो दिनों में मैंने ये खुबसूरती क्यों नहीं देखी । सात बजे का समय था, मौसम एकदम साफ था इसलिये कंचनजंघा की खुबसूरती पूरे शबाब पर थी,सूरज की सुनहरी किरणें इसके दुधियाँ रुप को अलौकिकता से दमका रही थी । आसमान की ओर सिर उठाये यह किसी बेहतरीन ताज से कम प्रतीत नहीं हो रहा था । आवारा बादल इसे अपने आगोश में लेने की नाकाम कोशिश कर रहे थे, इसके इर्द गिर्द अठखेलियाँ कर रहे थे और यह उन आवारा बादलों के पीछे से ऐसे सज के निकलता था कि कोई भी बावरा हो जाये । निष्कलंकता से चमकता इसका निश्चल दुधियां रंग मेरी आँखों में हमेशा के लिये बस गया । मैं भी बादलों की तरह उसके पास जाना चाहती थी ,उसे स्पर्श करना चाहती थी जोकि असम्भव था.......खैर,जैसे ही बादल उस पर से अपना आवरण हटाते मेरा कैमरा अनियंत्रीत रूप से उसे संजोना शुरू कर देता......और जब मेरा मन उसकी खुबसूरती को अपने छायाचित्रों में सहेजने में कामयाब हो गया,तो पुरी संतुष्टी के साथ मैने एक तिरछी नजर उन बादलों पर डाली जो अभी भी उसको आलिंगनबद्ध करना चाहते थे ......मैं मुस्कुरायी,वो नाकाम थे और मैं उसे कैद कर पायी थी अपने चित्रों में और अपनी यादों में । यह मेरी जीत थी उन आवारा से बादलों पर ।
       हम नाश्ता करने डाईनिंग हाॅल में गये,हमारे बाकी के साथी सूर्योदय को देखकर आ चुके थे। उन्होने मुझे वहाँ के फोटोग्राफ्स दिखाये,संदेह नहीं कि वो अद्भुत थे ,मेरे मन को ललचाने के लिये पर्याप्त थे,फिर मैने भी उन्हे अपना खजाना दिखाया,जिसे कुछ समय पहले ही मैने अपने मन की तिजोरी में सहेजा था । वो सब भी इन नजारों को अपने कैमरे में कैद करने होटल के पिछवाड़े गये ,लेकिन तब तक उन आवारा बादलों ने उसे अपने आगोश में ले लिया था और किसी कीमत पर उसे छोड़ना नहीं चाहते थे ...... मौसम की इस बेईमानी को देखते हुए हम सब चुपचाप वहाँ से निकल लिये ।
                     हमने नाश्ता किया और अपनी अपनी गाड़ियों में पीलिंग के लिये निकल पड़े । अब हम पश्चिम बंगाल से सिक्कीम में प्रवेश करने वाले थे ।रास्ता बहुत सुंदर था,हरी भरी वादियां मानो हर राह पर हमारा स्वागत कर रही हो । उबड़ खाबड़ रास्ते अब थोड़े समतल होने लगे,किसी राजधानी की तरफ जाने का अहसास हमे स्वयं ही होने लगा,वरना अब तक तो हमने रास्तों के गड्ढ़ों को ही ज्यादा महसुस किया था । "दीदी" की खराब सड़कें हमे कतई पसंद नहीं आयी थी, लेकिन सिक्कीम की चिकनी चौड़ी सड़के देखकर एक सुखद अहसास हुआ क्योंकि अब तक हम बहुत झटकें सहन कर चुके थे ।
                यह रास्ता मोहक तो था ही और इस पर नदी तिस्ता भी हमारे साथ हो ली,बस फिर क्या था,मन गुनगुनाने लगा । हवा के मंद झोंकें अब लेह की यादों को मेरे मन से धकेलने लगे थे ।लग रहा था जैसे तिस्ता नदी ने हमारा दामन पकड़ लिया हो ।एक पल को वह ओझल हो जाती तो दुसरे ही पल फिर से अपनी मस्ती के साथ हमसे मिलने आ जाती । कही कही उसकी लहरें उग्र रुप से खतरनाक थी तो कही शांत पर थोड़ी सी चचंल,लेकिन जैसे जैसे हम आगे बढ़ते गये यह गंभीर होती गयी और फिर आगे चलकर यह आश्चर्यजनक रुप से शांत हो गयी । मेरी उत्सुकता बढ़ गयी । मैंने ड्राईवर से इस बारे में पुछा तो उसने बताया कि यहाँ पर बाँध बनाया गया है इसलिये यह यहाँ रुक गयी है । एक बारगी मुझे लगा जैसे किसी चचंल से बच्चें के हाथ ही बांध दिये गये हो ।निःसंदेह मुझे तिस्ता की चचंल लहरों की कमी खल रही थी और उसकी स्वतंत्रता का हनन मुझे कदापि पसंद नहीं आया ।
   अब हम उस स्थान पर पहुंच गये जहाँ से हमे रीवर राफ्टींग प्रारम्भ करनी थी ।मुझे थोड़ा डर लग रहा था ,लेकिन दोनो बच्चें और सुशील तीनों राफ्टींग करने वाले थे तो बाद में मैं भी इनके साथ हो ली,और यह मेरा अब तक का सबसे रोमांचक अनुभव रहा ।बोट में हम छः लोग सवार थे और दो लोग बोट के साथ थे । हमे आपात स्थितीयों के बारे में बताया गया,मुझे थोड़ा डर सा लगा ,तब सुशील ने कहा कि यह सब हवाईजहाज में भी बताया जाता है लेकिन कभी कोई एरोप्लेन क्रैश हुआ है । उनका तात्पर्य यही था कि ये सब औपचारिकतायें है । हम सब बोट में बैठ गये,रौनक और सुशील ने चप्पु संभाल लिया , उन्हे बोट वालों के कहे अनुसार चप्पु चलाना था । शगुन एकदम आगे थी,उसे भी पानी की धारा के हिसाब से बोट के अगले हिस्से वाले किनारे पर झुक जाना था । सारे नियम समझने के बाद हम चल पड़े ।पानी के बहाव के साथ बोट तेजी से आगे जा रही थी । हल्की लहरें इसे उपर नीचे कर रही थी और मैं इन आनंददायी झुलों का आनंद ले रही थी । तभी हमारा सहायक तेज आवाज में बोला , "शगुन लीन डाउन " । शगुन ने अपना पूरा वजन आगे के किनारों पर डाल दिया । मैंने देखा कि हमारी बोट तीव्र लहरों के बीच जाने को थी,हम सब खुशी के मारे चिल्लाये और उसी क्षण हमारी बोट तेजी से उपर की ओर उठ कर इस तरह से नीचे को गयी जैसे कि पानी में समा गयी हो । ठंडे पानी ने हमे पूरी तरह से भीगो दिया था । उस समय मैं अंदर से  शुन्य सी हो गयी थी ,यह रोमांचक अहसास मुझमे एक नयी उर्जा का संचार करने को था । तिस्ता की इन्ही लहरों से बतियाते हम किनारे की ओर आने लगे । हमारी बोट का सहायक जो कि १४-१५ साल का लड़का ही था,पानी में कुद पड़ा और लहरों के बहाव के साथ अपने शरीर को भी बहने छोड़ दिया,बिना हाथ पावं मारे ।उसने हमे भी पानी में उतरने बोला कि पानी का बहाव आपको किनारे ले जायेगा । शगुन कुदने को तैयार हो गयी (जबकि उसे स्विमिंग नहीं आती) ।स्वभावतः वह बहुत निडर लड़की है । हमने उसे मना कर दिया कि तभी रौनक पानी में कुद गया , उसे तैरना आता था इसलिये हम निश्चित थे ।अत्यधिक ठंडे पानी की वजह से वह वापस बोट में आ गया ।शगुन अब भी पानी में उतरने की जिद्द कर रही थी । किनारे पर भगवती भाई खड़े थे और हमारे चेहरे देखकर हमारी प्रतिक्रिया जानने की कोशिश कर रहे थे,हम सब खुशी से चिल्ला उठे ।
                             अब तक का यह मेरा सबसे रोमांचक क्षण था और मेरा ही नहीं समुह के सब लोग रोमांचित थे । खासकर सभी बच्चें बड़े खुश थे । तिस्ता नदी की किलोल करती लहरें और पहाड़ों को लगकर गुजरती ठंडी हवा अब भी मुझमे एक सिहरन पैदा कर रही थी । 
                 पास ही में एक छोटे से ढ़ाबे पर हमारे खाने की व्यवस्था थी । हमने कपड़े बदली किये और खाना खाया हालांकि खाना ज्यादा स्वादिष्ठ नहीं था लेकिन फिर भी सब खुश थे क्योकि रीवर राफ्टींग का रोमांच सभी पर हावी था ।
            अब फिर से हम पीलिंग की राह पर थे । रात करीबन आठ बजे हम वहां पहुंचे । हम होटल के अपने कमरों में गये । कमरे बहुत सुकून भरे और साफ सुथरे थे । रात का खाना खाकर हम जल्दी ही बिस्तरों में घुस गये ...........

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