बुधवार, 18 अप्रैल 2012

कुछ क्षणिकाए

 
 जलना 
आग में और इर्ष्या में 
कारण है विनाश का सर्वनाश का !
                 


                                    
    चुप्पी
 चटकाती है दिल 
रिश्ते मरते तिल-तिल  !




सूरज 
तुम्हारे नाम का 
मेरे ललाट पे सज 
मान बढाता तुम्हारा और मेरा भी !









मैं आहत होती हु 
अपनों के रूखे व्यवहार से नहीं 
बल्कि चाशनी में लिपटी उनकी बातों से !







   
         अपनों का साथ 
     है खुशियों का तडका
        दुखो की दाल में !

   




धुँआ धुँआ 
है जिंदगी 
जब जल रहे हो 
रिश्ते आस पास 

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर क्षणिकाएँ...
    अनु

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    1. anuji,pratham prayaas tha aur us par aapki swikruti ki mohar lag gai.....aage bhi margdarshan chaungi...sdhanywaad!

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