सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

पथिक

पथिक तू चलता चल अपनी मंजिल की तरफ
कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र
फूलों के ख्वाबों को छोड़
काँटों की राह पकड़
संघर्षों से जूझता तू बढ़ता चल
अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ
कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र
राह में मिलेंगे बहुत से हमसफ़र
इस कारवें में भीड़ का हिस्सा बनना मत
न करना कोई शिकवा-शिकायत
बस चुपचाप , अपने बुलंद इरादों के साथ
भीड़ को चीर के बढ़ता चल
अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ
कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र
तनिक सी कामयाबी के जाम पीकर
उसके सुरूर में ना खोना
क्योकि ;
हो सकती है यह तुफां के पहले की ख़ामोशी
या फिर ;
किसी मृग-मरीचिका की मदहोशी
इसलिए ;
छलकते टकराते जाम को छोड़
आने वाले तुफां के लिए
खुदी को बुलंद कर , खुद को तैयार कर
तू चल अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ
पथिक तू बढ़ता चल
कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र 

4 टिप्‍पणियां:

  1. हौसला देती पंक्तियाँ..... सुंदर रचना

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  2. खुदी को बुलंद कर , खुद को तैयार कर
    तू चल अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ
    पथिक तू बढ़ता चल
    कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र
    ummid se bhari sabhi se kuchh kahti panktiyan
    rachana

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    1. rachanaji aap yaha aai aur comment kiya....badi baat hai mere liye,aage bhi aapse margdarshan chahugi

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