शनिवार, 25 फ़रवरी 2012

मन उदास है

  आज मन उदास है
  सब कुछ मेरे पास है
  कोई आरजू ना आस है
  जाने क्यों
  फिर भी मन उदास है
  शायद
  रूखे मौसम का तकाजा है
  या फिर
  बेरुखियों का तमाचा है
  भागे मन , दौड़े मन
  बंज़र रेगिस्तान में ये कैसी प्यास है 
  आज मन उदास है 
  खुशियाँ बिखरी आस-पास
  दुखों से मन मेरा अनजान
  बाहर है संगीत तो अन्दर निश्वास है
  जाने क्यों
  आज मन उदास है
  रोज सजते सपने जिन आँखों में
  आज टकटकी लगी वीरानो में
  अपनों का मेला है
सपनो का रेलम-पेला है
फिर भी मन मेरा अकेला है
क्या ये आने वाले वक़्त की
कुछ अनहोनी आहट है
या फिर
मन नहीं ,
आज का मौसम ही उदास है 

बुधवार, 22 फ़रवरी 2012

कोई नहीं चाहता

बिना आगाज़ के ही अंजाम चाहते है लोग
बिना प्रयास के ही सफलता पा लेना चाहते है लोग
जिंदगी की दौड़ में जीत चाहते है लोग
लेकिन जीत के लिए मेहनत
...........................................कोई नहीं चाहता
दूसरों की खुशियों को छीन लेना चाहते है लोग
लेकिन अपनी खुशियों को बांटना
...........................................कोई नहीं चाहता
सोने की तरह चमकना चाहते है लोग
लेकिन कुंदन की भांति आग में तपना
.........................................कोई नहीं चाहता
आसमां को बाँहों में लेना चाहते है लोग
लेकिन ज़मीं पर पैर जमाना
.........................................कोई नहीं चाहता
मंजिल तक पहुँच जाना चाहते है लोग
लेकिन संघर्षों का मुकाबला
.........................................कोई नहीं चाहता
सफलता पर बधाइयाँ देते है लोग
लेकिन दुःख में सांत्वना देना
.........................................कोई नहीं चाहता
दूसरों को बात बात पर टोकते है लोग
लेकिन अपनी स्वतंत्रता का हनन
.........................................कोई नहीं चाहता
अपने महलों में घी के दियें जलाते है लोग
लेकिन टूटे आशियाँ को तिनके देना
.........................................कोई नहीं चाहता
दूसरों पर कटाक्ष करते है लोग
लेकिन अपने गिरेबाँ में देखना
.........................................कोई नहीं चाहता
चाँद तारों को छूना चाहते है लोग
लेकिन परिस्थितियों से समझोते 
..........................................कोई नहीं चाहता 

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

एक और नन्हा सा प्रयास

शगुन के शब्दों ने इस बार मुझे वाकई खुश कर दिया .....सधे हुए शब्दों का सधा हुआ ताल-मेल .....अच्छी शुरुआत कर रही है मेरी बेटी ....मन खुश है 

  " भूल जाओ बीते पल 
     लेके आओ नई उमंग 
      सूर्य फिर से आएगा 
        लेकर उम्मीद की किरण 
          तब दिखा दो 
           तुम अपने रंग "
                                         शगुन 

शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2012

क्या है आज़ादी

वो तो नन्हे की आँख का तारा है
जो हम सब को बेहद प्यारा है
वो तो है एक मीठी सी शहजादी
जिसे कहते है हम आज़ादी
कई जंजीरों ने इसे जकड़ा है
तो कही
आडम्बरों ने इसे पकड़ा है
यूँ तो आज़ाद है हम
लेकिन अपने ही बनाये बन्धनों में घूमते है सभी
बस पिंजरे में नहीं है
लेकिन बेड़ियों में बंधे है सभी
आज़ाद दिखने की होड़ में
खो बैठे आज़ादी
ना जाने जिंदगी के किस मोड़ में
आँखे बन गई सूखा तालाब
पथरीली हो गई गालों की ज़मीं
होठ सूख कर मुरझा गए
खो गई सबकी हसीं
क्या यही है आज़ादी
मायने नहीं समझे आज़ादी के
दायरे बढा दिए बरबादी के 
आज़ादी से आसमां में उड़ने की चाह 
चल पड़े सफलता की वो अनजानी राह 
ज़मीं भी छूटी आसमां भी छूटा 
पंख तो मिले पर पावँ कटा आये 
भुला बैठे नियामत खुदा की 
जरुरत थी तो बस थोडा सा मुस्कुराने की 
लेकिन हम फंस गए अपनी ही बनाई परिभाषाओ में 
कभी ढूंढते शब्दकोष में 
तो कभी संविधान की धाराओ में 
अब समझ पाई हु आज़ादी के सही मायने 
ग़र मिल जाए वो निश्छल हंसी 
तो तालाब भर जायेगे समंदर की तरह 
पथरीली ज़मीं हरी हो जाएगी 
गुलाब की पंखुड़ी 
फ़ैल जायेगी दोनों गालो तक 
बेल की तरह इठलाती 
हाँ ,यही तो है आज़ादी 

रविवार, 12 फ़रवरी 2012

बात दो-चार दिन पहले की है ,सुबह जब नारियल के तेल की शीशी को हथेली पर उंडेला तो उसमे से तेल नहीं निकला ,मुझे आश्चर्य हुआ कि अभी हफ्ते भर पहले तो ख़रीदा ही था ,इतनी जल्दी ख़त्म कैसे हुआ ? लेकिन शीशी खाली नहीं थी ....थोडा दबाया तो कुछ निकलता हुआ सा महसूस हुआ ........'ये तो तेल ही है जो ठण्ड कि वजह से जम गया था .मेरा आश्चर्य अब एक सुखद अहसास में बदल गया क्योकि मुंबई के मौसम में और वो भी फरवरी के महीने में तेल का जमना आम बात नहीं है
              पुरे साल भर एक ही जैसे मौसम की मार सहने वाले हम मुम्बईकर तरसते है ऐसे मौसम को ...........इस बार की गुलाबी ठंड वाकई मौसमी मज़ा दे रही है .सुबह की धुप कुछ ज्यादा ही प्यारी लगने लगी है और जब सुबह की यह धुप मेरी खिड़की से लटकी कांच की लटकनो पर पड़ती है तो लगता है कि कई नन्हे सूरज मानो जैसे मेरी खिड़की पर आ गए हो , जब उनकी चमक परावर्तित होकर मेरे आँगन में बिखरती है तो उन पर चलने का मिठास मैं बयाँ नहीं कर सकती
       यहाँ ठिठुरन तो नहीं है लेकिन सिहरन जरुर है ,दांत तो नहीं बजते लेकिन कानो से ठंडी हवा का प्रवाह चाय की चुस्की मारने को उकसाता है ,हाथो में दस्ताने तो नहीं है लेकिन मैंने पावों में मौजे जरुर पहन लिए है ,रजाई ना सही लेकिन कम्बल की गर्माहट अब हमें भी सुहाती है ,बच्चे मुहं से भाप तो नहीं निकालते जैसा कि हम अपने बचपन में अकसर किया करते थे, हाँ लेकिन सुबह की पाली के स्कूली  बच्चे मैरून रंग की स्वेटर में जरुर दिखने लगे है ,अल-सुबह की नींद में सपने ज्यादा आने लगे है ,हाथ अलाव तो नहीं सेंक रहे लेकिन हाथों में किसी अपने का गर्माहट भरा हाथ सुहाने लगा है चाय की चुस्कियां मीठी ज्यादा लगने लगी है ,पकोड़ों ओर तरह-तरह के पराठों की महक पुरे घर में फैलने लगी है ,स्नानघर की खिड़की से आने वाली ठंडी हवा की सिरहन ने पुरे स्नानघर पर अपना कब्ज़ा जमा रखा है और स्वय को मेरे घर का सबसे ठंडा क्षेत्र घोषित कर रहा है .......स्नानघर की यह ठिठुरन मुझे लगातार मेरे मायके की याद दिला रही है ,घर के सबसे नन्हे जीव को भी मेरी बेटी  छोटे से रुमाल में ढक कर सुला रही है .......ऐसे ही ना जाने कितने अनगिनत अहसास है जो जी रहे है हम इन दो-चार दिनों की गुलाबी ठण्ड में ............
        कल से पारा उछल के सीधे चार डिग्री ऊपर  आ गया और मौसम में मुम्बैया असर दिखने लगा .....कही मेरी यादें भी मौसम की तरह लुप्त ना हो  जाए ..................

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2012

कल शाम का खुशगवार मौसम न जाने क्यों बहुत कुछ लिखने को प्रेरित कर रहा था .हाथ में लेखनी को पकड़ा ही था कि मेरी १२ वर्षीया बेटी ने कहा  'मम्मा मैं भी कुछ लिखू '
मैं मुस्कुरा दी और लिखने में व्यस्त हो गई ,तभी उसने कुछ दो-चार लाइने लिख कर पकड़ा दी ,उसकी टूटी-फूटी हिंदी ,साथ में मुम्बईया भाषा का तड़का और उसकी मन:स्थिति ....सब था इन लाइनों में 
प्रस्तुत कर रही हूँ उसके प्रथम प्रयास को प्रोत्साहन के लिए आपके समक्ष 

कितनी करती किताबे बोर 
स्कूल ले जाती मैं बस्ते का बोझ 
आती जब किताबे आँखों के सामने 
क्यों सो जाते हम बच्चे लोग 
पर क्या करे .....................
पढना ही पड़ता हर रोज
कभी हिंदी की मात्राओं में खोती 
तो कभी 
गणित के फार्मूलों में उलझती 
उफ़ ये मराठी 
मेरे सर के ऊपर से चली जाती 
विज्ञान के चमत्कार तो समझ ही ना पाती 
सच,कितना करती मुझे बोर ये किताबे 

सोमवार, 6 फ़रवरी 2012

पथिक

पथिक तू चलता चल अपनी मंजिल की तरफ
कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र
फूलों के ख्वाबों को छोड़
काँटों की राह पकड़
संघर्षों से जूझता तू बढ़ता चल
अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ
कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र
राह में मिलेंगे बहुत से हमसफ़र
इस कारवें में भीड़ का हिस्सा बनना मत
न करना कोई शिकवा-शिकायत
बस चुपचाप , अपने बुलंद इरादों के साथ
भीड़ को चीर के बढ़ता चल
अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ
कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र
तनिक सी कामयाबी के जाम पीकर
उसके सुरूर में ना खोना
क्योकि ;
हो सकती है यह तुफां के पहले की ख़ामोशी
या फिर ;
किसी मृग-मरीचिका की मदहोशी
इसलिए ;
छलकते टकराते जाम को छोड़
आने वाले तुफां के लिए
खुदी को बुलंद कर , खुद को तैयार कर
तू चल अपनी ही धुन में अपनी मंजिल की तरफ
पथिक तू बढ़ता चल
कदम दर कदम , सफ़र दर सफ़र