रविवार, 29 जनवरी 2012

                   शुभ प्रभात 

बिटिया की जिद के चलते घर में फिर से एक नन्हे से जीव का प्रवेश हुआ है और पिछले दो दिनों से घर की धुरी मैं नहीं बल्कि कछुआ प्रजाति का यह नन्हा सा जीव बना हुआ है .इसे देखते ही सबसे पहले बचपन की वो कहानी याद आती है जिसे हमने ना जाने कितनी बार वार्षिक परीक्षा की उत्तर-पुस्तिका में लिखा था .......बचपन की वो बार-बार दोहराई हुई कहानी आज भी शायद हम सबके स्मृति-पटल पर अक्षरश: अंकित है. लेकिन आज भी इस कछुए को देखकर यही लगता है कि क्या वाकई इस धीमी चाल के कछुए ने फुर्तीले खरगोश को हरा दिया था या फिर ये हमारे पूर्वजो द्वारा गढ़ी गई एक कहानी मात्र है, बालमन को प्रेरित करने की.......हम तो इस कहानी से प्रेरणा ले लिया करते थे ,लेकिन आज मन में एक सवाल उठता है ,क्या आज की पीढ़ी के बच्चे ऐसी कहानियों से प्रेरित होते है ?
                      खैर.........................बेटी (शगुन) बहुत खुश है ,कभी उसे खाना देती है, कभी नहलाती है,दिन में दो बार उसका पानी बदलती है, कभी हथेली पर लेकर उसे सहलाती है और जब वो उसे फर्श पर छोड़ती है तो ये नन्हा जीव घबरा कर अपने-आप को खोल में समेट लेता है और जब उसे यह निश्चित हो जाता है कि आस-पास कोई नहीं है तो सिर और पैर खोल से बाहर निकाल कर धीमे-धीमे चलने लगता है .......इसे ऐसे चलता देखकर मुझे कबीर की ये पंक्तियाँ बरबस ही याद आ जाती है 
                              " धीरे धीरे रे मना ,धीरे सब कुछ होय
                                माली सींचे सौ घड़ा ऋतू आये फल होय "
      ....................बात सिर्फ धीरे-धीरे चलने की नहीं है ,बात है गतिशीलता की ,गंतव्य स्थान तक पहुँचने की.


     सच, यह नन्हा जीव मुझे कितना कुछ सिखा  रहा है,शायद इसीलिए लोग पालतू पशु-पक्षी रखते है ताकि उनसे कुछ सीख सके......जब वह अपने खोल में घुसता है तो लगता है कि जिंदगी का पाठ पढ़ा रहा है कि जब तुम्हारे आस-पास के वातावरण में नकारात्मक उर्जा का प्रभाव हो तो अपने-आप को समेट लेना चाहिए ताकि नकारात्मकता हमें नुकसान नहीं पहुंचा सके और जैसे ही मौका मिले,सकारात्मक माहौल मिले हमे आगे बढ़ना चाहिए ,धीरे ही सही लेकिन कदम बढ़ाना चाहिए .
                                

गुरुवार, 26 जनवरी 2012

मन की थाह

मन की थाह 

मन करता है कि
आसमां को माप लु 
समुंद्र की गहराइयों को छू लु 
चाँद की चांदनी को समेट लु 
सितारों को अपनी चुनरी में सजा लु 
छू लु किसी के अंतर्मन को 
और वेदना को कम कर जाऊ 
किसी के मन की तपिश को 
मेरे मन की शीतलता सुकून दे जाए 
और भी ना जाने 
क्या-क्या चाहता है मन मेरा 
बस कोई तो एक हो 
जो मेरे भी मन की थाह ले सके 

मंगलवार, 24 जनवरी 2012

पिछला पखवाडा बहुत व्यस्तता वाला रहा .....सूर्य देव के मकर राशी में प्रवेश के साथ ही मल-मास समाप्त हो गया और शुभ कार्यों का शुभारम्भ हो गया ........मकर सक्रांति का त्यौहार , माहि चौथ का व्रत , घर के प्रांगण में माता की चौकी और दैनिक जीवन में घटने वाली छोटी-छोटी घटनाएँ जो मन-मस्तिष्क पर अमिट प्रभाव छोड़ देती है ........इन्ही सब के बीच नए साल का पहला महिना विदा लेने को है और विदाई के साथ मेरी झोली में डाल जायेगा खट्टी-मीठी यादों की सौगात ......और हर बार की तरह मैं मीठी यादों को सहेज लूँगी अपनी ही यादों के बगीचे में और खट्टी यादों की पोटली बना फ़ेंक दूंगी पास के तालाब में ...........
                 
          यादों के गलियारों से निलकते हुए
          अतीत के झरोखों से झाकते हुए
          कभी-कभी जी लेती हु मैं भी
         वो पल ,
         जिन्हें सहेजा है मैंने अपनी ही यादों के पिछवाड़े में
         जहा आज भी सांसे भरती है खुशियाँ
         महसूस करती हु उन सांसों की गर्माहट
         आज भी
        एक ही क्षण में ,अपनी पूरी आत्मीयता से
        जी लेती हु वो पल
         और जी के उन पलो को
        तृप्त हो जाता मन
        न करता कोई गिला-शिकवा
       बस,मैं और मेरे ये पल
        जीती हु इन्हें हर दिन हर पल
         नहीं चाहती कि खो जाए ये
        इसीलिए छोड़ा है इन्हें
        खुशियाँ बिखरने को, पल्लवित होने को
        अपनी ही यादों के पिछवाड़े में .