सोमवार, 12 दिसंबर 2011

शंका

मन के एक कोने में
दुबक के बैठी ,
सहमी सहमी सी अपना वजूद बनाती
शंका.............................निराधार शंका !
खुशियों पर प्रश्न चिन्ह लगाती
करने....न करने की आपा-धापी में
और उलझाती,
दुखों को और बढाती ,
सुखों को संशय में डालती
शंका..............................निराधार शंका !
अपनों पर संदेह करवाती
परायों को और पराया करती
तरसाती ,
हलकी सी मुस्कराहट को , और
दिल खोलकर हँसने की लालसा को
शंका..............................निराधार शंका !
हर विश्वास को अविश्वास में बदलती
रिश्तों के फंदों में फंसाती
जिंदगी के चक्रव्यूह को उलझाती
सहायता लेने को झिझकती
तो सहायता देने में भी सहमती
शंका.............................निराधार शंका !
लेकिन यही शंका , कभी-कभी
आधार भी देती ,
सच्चाई को सामने भी लाती
और निराधार ना कहलाती
यह शंका......................सब तोड़ देती
तो कभी कभी
कुछ शायद जोड़ भी देती

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें