शनिवार, 10 दिसंबर 2011

थोडा सा झूठ

चलो, खुशियाँ बांटें हम
किसी के उदास मन की परतें उतार
दबी मुस्कुराहट को ढूंढ़ लाये हम
आंसुओं को आँचल के मोती बना ले
हमदर्द बनकर
किसी के दुखों को बाँट ले हम
चलो, बांटते है खुशियाँ आज हम और तुम
जिंदगी की आप-धापी से बाहर निकले
दिमाक से नहीं,
थोडा दिल से सोचे
बेसिर-पैर की बातों को ऊपर से गुजर जाने दे
नासूर बने किसी के घावों को
स्नेह का मरहम लगाये हम
अपनों को पराये बनते देखकर भी
मुस्कुराएँ....................................
और हाथ बढ़ाये .....आओ
चलो, परायों को भी अपना बनायें हम
अपनी खुशियों को कुछ यूँ बिखराएँ
कि ;
फिजा की फितरत बदल जाए
हवा में खुशबू बिखर जाए
पतझर में बसंत आ जाए
खुशियों का इन्द्रधनुष खिल जाए
चलो, खुशियाँ बाँटते है हम
माना कि.....
झूठ बोलना पाप है
लेकिन ग़र,
चोट पहुंचाता है सच
छलनी कर देते है दिलों को सत्य वचन
तो ;
टूटे दिलों को जोड़ते है
चलो, थोडा सा झूठ बोल आते है हम और तुम

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